Pakistan state armed influenconomy : एक ठंडी रात, कुपवाड़ा के जंगलों में सुरक्षा बलों ने एक संदिग्ध युवक को पकड़ लिया. उम्र मुश्किल से पच्चीस साल. पूछताछ कक्ष में अधिकारी ने पूछा, “नाम?”
कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उसकी आवाज़ काँपी – “मेरा नाम इमरान है… लेकिन मैं दुश्मन नहीं हूं, साहब.”
“फिर यहां क्यों आए?”
युवक की आंखे भर आईं.
“उन्होंने कहा था कि हम एक हैं… हमारी पहचान, हमारी बोली, हमारा दर्द एक है. पहले दोस्ती की, फिर भरोसा जीता, और फिर हमें यक़ीन दिलाया कि हम किसी बड़े मक़सद का हिस्सा हैं.”
उसने सिर झुका कर कहा. “मैं अकेला नहीं हूं. मेरे जैसे सैकड़ों लड़के हैं. किसी को पैसों से, किसी को गुस्से से, और सबसे ज़्यादा हमें कौम के नाम पर फंसाया जाता है.”
कमरे में सन्नाटा छा गया.
और उस रात, सुरक्षा बलों के सामने केवल एक पकड़ा गया युवक नहीं, बल्कि एक ऐसे गुप्त युद्ध की कहानी बैठी थी, जिसमें हथियारों से ज़्यादा इस्तेमाल भावनाओं और पहचान का होता है.
कश्मीर को दक्षिण एशिया का गाजा बनाने की थी तयारी?
जोहार. आज है 20 जून. 1980 के दशक के आखिर में भारत के खिलाफ ‘ऑपरेशन टूपाक‘ चलाया गया. जनरल ज़िया-उल-हक की एक सोची-समझी योजना. एक प्रक्रिया जिसने घुसपैठ और स्थानीय स्तर पर विद्रोहियों का आधार तैयार किया. और रफ्ता-रफ्ता देश में कट्टरपंथ, भर्ती, ट्रेनिंग और हिंसा के विशाल तंत्र में बदल गई. जिसने कश्मीर के लिए तो, वापसी का रास्ता ही बंद कर दिया. हज़ारों कश्मीरी युवा बन्दूक से लैस अलगाववाद की ओर खिंचे चले आए. उन्होंने इस संघर्ष को अपनाया और शहादत के मज़हबी रवायत से जोड़ा. तथा इसे लगातार चलने वाले लंबे प्रॉक्सी वॉर में बदल दिया.
हिज़्बुल मुजाहिदीन से लेकर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद की बुनियाद. यह सब 1965 में ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ की विफलता के बाद पाकिस्तान की उम्मीदों से कहीं बढ़कर था. 1990 के दशक तक, इस गहरे पैठ बना चुके उग्रवादी ढांचे के नतीजे भयानक रूप से सामने आने लगे थे. हिंसा में तेज़ी, टारगेटेड किलिंग (चुनिंदा लोगों की हत्या) और कश्मीरी पंडितों व अन्य समुदायों का दुखद पलायन. ‘ऑपरेशन टूपाक’ कश्मीर को “दक्षिण एशिया का गाजा” लगभग बना चूका था.
शुरुआत: एक सोची-समझी योजना, न कि कोई स्वाभाविक प्रतिरोध
1989 में जब कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिदीन (HM) उभरा, तो ऐसा लगा कि यह स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ विद्रोही आंदोलन है. लेकिन डॉ. अभिनव पांड्या के पुस्तक The Jihad Game: Inside Pakistan’s Dark War के अनुसार, यह कोई अचानक हुआ विद्रोह नहीं था. HM को जान-बूझकर बनाया गया और पाला-पोसा गया. फिर भारत के खिलाफ पाकिस्तान के ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर‘ (असममित युद्ध) के पहले हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया.
इस समूह ने देवबंदी विचारधारा और जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव को अपनाया. इसने ऐसे लोकल कश्मीरी कैडरों को भर्ती किया, जो वही बोली बोलते थे और वही खाना खाते थे. उनकी जड़ें भी उन्हीं वादियों से जुड़ी थीं. पाकिस्तानी हैंडलर, रिश्तेदार और धार्मिक भाइयों के तौर पर आते-जाते रहे थे. यह कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी.
ध्यान देने वाली बात है की यहां पाकिस्तान एक अहम बात समझ गया था. पारंपरिक सैन्य तरीकों से भारत के खिलाफ युद्ध नहीं जीता जा सकता. भारत की अर्थव्यवस्था, आबादी और सैन्य ताकत पाकिस्तान के मुकाबले कहीं ज़्यादा बड़ी है. लेकिन पाकिस्तान ने एक अलग हथियार खोज निकाला, एक जैसी पहचान.
कई ग्रुप वाला इकोसिस्टम: सिर्फ़ एक संगठन क्यों?
1990 के दशक की शुरुआत तक, पाकिस्तान की रणनीति में ज़बरदस्त बदलाव आया. किसी एक चरमपंथी संगठन पर निर्भर रहने के बजाय, ISI ने अलग-अलग विचारधारा, काम करने के तरीके और भर्ती के स्रोतों वाले कई ग्रुप बनाने शुरू कर दिए. यह एक सोची-समझी योजना थी.
1990 में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) सामने आया. यह अहले-हदीस (सलाफ़ी) विचारधारा पर आधारित था. इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिहाद करना था. यह HM के स्थानीय फोकस के उलट था. LeT कश्मीर को भारत के ख़िलाफ़, एक बड़े इस्लामी युद्ध का सिर्फ़ एक मोर्चा मानता था. इसके कैडर में सिर्फ़ कश्मीरी ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल थे. फिर भी, वे एक ही बोली बोलते थे, एक जैसा खाना खाते थे और एक जैसी धार्मिक सोच रखते थे.
1999 में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) आया. यह पाकिस्तानी मदरसों के नेटवर्क से जुड़ी कट्टरपंथी देवबंदी जिहादी परंपराओं से निकला. हर ग्रुप का एक अलग रणनीतिक मकसद था. HM स्थानीय अलगाववाद के लिए, LeT अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑपरेशन के लिए, और JeM ग्लोबल जिहादी नैरेटिव के लिए.
फिर अंसार ग़ज़वत-उल-हिंद आया, जो अल-कायदा से जुड़ा ग्रुप था और जिसने कश्मीर के संघर्ष को एक व्यापक इस्लामी नज़रिए से जोड़ा. चार बड़े खिलाड़ी, चार अलग-अलग विचारधाराएं, और एक मास्टर प्लानर.
यहां पर पांड्या का विश्लेषण एक अहम बात बताता है. पाकिस्तान ने ये ग्रुप इसलिए नहीं बनाए कि कश्मीरी प्रतिरोध में स्वाभाविक रूप से विविधता आई थी, बल्कि इसलिए बनाए क्योंकि ऑपरेशन में लचीलापन आये. जो की पाकिस्तान के लक्ष्यों के लिए फ़ायदेमंद था. कई ग्रुप होने का मतलब था भर्ती के कई स्रोत, फ़ंडिंग के कई तरीके, और अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचने की क्षमता. क्योंकि ऐसी स्थिति में वे बारी-बारी से किसी एक संगठन को ज़्यादा सामने ला सकते थे.
वैचारिक हथियार: साझी पहचान का फ़ायदा उठाना
इस मुहिम का सबसे खतरनाक पहलू भी था. पाकिस्तान द्वारा उन रिश्तों का फ़ायदा उठाना जिनसे शांति को बढ़ावा मिलती. भारत-पाकिस्तान में कई चीज़ें एक जैसी हैं. जैसे;
यह कोई इत्तेफ़ाक से हुई समानता नहीं थी. यह पहचान को हथियार बनाने की कोशिश थी. पाकिस्तान के सैन्य तंत्र को समझ आ गया था कि वे इन साझी चीज़ों का इस्तेमाल करके भरोसे के नेटवर्क, घुसपैठ के रास्ते और भर्ती के ज़रिया बना सकते हैं, जो भारतीय सुरक्षा बलों की नज़र में नहीं आएँगे.
जिहादी कॉम्प्लेक्स: सेना, ISI और कट्टरपंथी
आईये अब इसे समझते है. पाकिस्तान की कश्मीर रणनीति तीन ताकतों से चलती है: पाकिस्तानी सेना, ISI और जिहादी कॉम्प्लेक्स, जो कट्टरपंथी संगठनों, मदरसों और धार्मिक नेताओं का एक नेटवर्क है.
- ये तीनों मिलकर एक ही इकोसिस्टम की तरह काम करते हैं। जब 2008 के मुंबई हमलों के बाद LeT पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा, तो ISI ने अपना ध्यान JeM पर केंद्रित कर लिया.
- जब HM की स्थानीय कश्मीरी पहचान उजागर हो गई, तो उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समूहों को आगे कर दिया. ये समूह एक ही सरकारी नीति के तहत इस्तेमाल होने वाले साधन थे.
- ये संगठन स्वतंत्र संस्थाएं नहीं थीं जो अपनी मर्ज़ी से काम करती थीं. उन्हें पाकिस्तानी सरकार की सोची-समझी रणनीति के तहत “बनाया, पाला-पोसा और तैनात” किया गया था.
रणनीतिक बदलाव: स्थानीय विरोध से अंतरराष्ट्रीय जिहाद तक
कश्मीर को साउथ एशिया का गाजा बनाने के लिए पाकिस्तान ने बहुत हांथ-पैर मारे है. जिन्हें अलग-अलग चरण में समझा जा सकता है.
- पहला चरण (1989–1994): हिज़्बुल मुजाहिदीन (HM) का दबदबा रहा. जिसने कश्मीरी कैडरों के साथ लोकल अलगाववाद पर ध्यान लगाया. इसका संदेश “कश्मीर की आज़ादी” था. भरोसा बनाने के लिए साझी पहचान का इस्तेमाल किया गया.
- दूसरा चरण (1994–2001): LeT और JeM सामने आए और अंतरराष्ट्रीय जिहाद की ओर बढ़े. संदेश “भारत के खिलाफ़ इस्लाम” हो गया. कश्मीर को ग्लोबल इस्लामी नैरेटिव से जोड़ा गया. साथ ही साझी सांस्कृतिक पहचान का भी फायदा उठाया गया.
- तीसरा चरण (2001-2019): कई संगठन एक साथ सक्रिय रहे. भारतीय सुरक्षा बलों के लिए ऑपरेशनल यानि धरपकड़ की चुनौतियां और अफरातफरी पैदा हुई. ISI ने अलग-अलग संगठनों के हमलों में तालमेल बिठाया. अलग-अलग वर्गों से लोगों को भर्ती कराया. उनकी पहचान और मज़हबी झुकाओ का इस्तेमाल किया.
- चौथा चरण (2019–अब तक): अनुच्छेद 370 हटने के बाद, पाकिस्तान ने ज़्यादा गुप्त ऑपरेशन शुरू किए. दबाव के लिए, LeT से निकले संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) का इस्तेमाल किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी संगठन के तौर पर पहचाने बचाने की कवायत.
हर चरण में उसी साझी पहचान का फायदा उठाया गया. लेकिन रणनीतिक तौर-तरीके अलग-अलग थे. इसमें हमेशा इस बात का लाभ उठाया गया कि बोली, खान-पान, रूप-रंग या धार्मिक रीति-रिवाजों के आधार पर कश्मीरियों और पाकिस्तानियों के बीच फर्क नहीं किया जा सकता था.
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भारत को इसका मुकाबला करने में मुश्किल क्यों होती है?
इस कैंपेन का मुकाबला करने में भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है. आप ऐसे दुश्मन से कैसे लड़ेंगे जो आपकी तरह दिखता हो, आपकी तरह बोलता हो, आपकी तरह खाता हो और जिसका इतिहास भी आपके जैसा हो? बॉलीवुड भी तो ऐसा ही दिखाता है ना…
बॉर्डर की बाड़ को पार किया जा सकता है. गुप्त सुचना तंत्र में सेंध लगाई जा सकती है. लेकिन आपसी पहचान को बाड़ से नहीं रोका जा सकता. वह कश्मीरी भाषा बोलेगा. वज़वान खायेगा. और तो और, लोकल कश्मीरियों की तरह ही मस्जिदों में नमाज़ पढ़ेगा. ऐसे पाकिस्तानी उग्रवादी को सालों से चल रहे सुरक्षा तरीकों से पकड़ा नहीं जा सकता.
और शायद इसलिए ही पाकिस्तान की रणनीति इतनी असरदार रही है. उन्होंने सिर्फ़ उग्रवादी ही नहीं भेजे, उन्होंने ऐसे लोगों को भेजा जो बगल के समाज में घुल-मिलकर गायब हो सकते थे. हालांकि, इस सोच के उलट, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे.एस. सोढ़ी ने पाकिस्तान के बारे में एक दिलचस्प बात बताई. “अपनी शुरुआत (यानी 1947) से ही, पाकिस्तान ने लगातार भारत से अपने सांस्कृतिक संबंध तोड़ने की कोशिश की है। इस प्रक्रिया में, वह पूरी तरह से भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बन गया है। पाकिस्तान ने अपनी असली सोच को बाकी दुनिया से छिपाकर रखा है।”
भविष्य: ‘शैडो वॉर’ (छद्म युद्ध) के बाद क्या होगा?
एक्सपर्ट्स मानते है की भारत-पाकिस्तान संबंधों में आए बदलावों, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ और आर्टिकल 370 को हटाए जाने के बाद, पाकिस्तान को अपनी रणनीतियां बदलने पर मजबूर होना पड़ा है. चरमपंथी समूहों को मिलने वाला खुला समर्थन अब छिपकर दिया जाने लगा है. लेकिन उनका पूरा नेटवर्क (इकोसिस्टम) अभी भी कायम है. अब सवाल यह है कि भारत इसका कैसे जवाब देगा. इस समस्या की जड़ पर कब और कैसे प्रहार करेगा.
