क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया रोक सकती है लॉ ग्रैजुएट्स का नामांकन ? जानिए कानून क्या कहता है

NALSAR के 2026 बैच के एनरोलमेंट पर BCI के आदेश वाला विवाद कानूनी बहस का विषय बन गया है. BCI ने पहले पूरे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाई और कुछ ही घंटों बाद अपना फैसला वापस ले लिया. इस पूरे विवाद से सवाल उठा है कि क्या BCI के पास किसी पूरे बैच के लॉ ग्रैजुएट्स का एनरोलमेंट रोकने की शक्ति है?

नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों के एनरोलमेंट को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया के फैसले और फिर कुछ ही घंटों में लिए गए यू-टर्न ने कानूनी बहस छेड़ दी है. सोशल मीडिया से लेकर लीगल सर्कल तक इस मामले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं.

सवाल यह है कि क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास किसी पूरे बैच के लॉ ग्रैजुएट्स को एडवोकेट के तौर पर एनरोल होने से रोकने का अधिकार है? इस एक्सप्लेनर में हम अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के आधार पर इसी सवाल का जवाब समझेंगे.

पहले समझते हैं, नालसार मामले में हुआ क्या?

  • हैदराबाद स्थित नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के करीब 450 छात्रों ने 2026 के कन्वोकेशन में चीफ गेस्ट के तौर पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी. छात्रों ने इसको लेकर अपनी बात रखी और विरोध दर्ज कराया.
  • इसके बाद 13 अगस्त को बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI ने स्टेट बार काउंसिल्स को एक निर्देश जारी किया. इसमें नालसार के 2026 बैच के लॉ ग्रैजुएट्स का एडवोकेट के तौर पर एनरोलमेंट अगले आदेश तक रोकने को कहा गया था. BCI ने इस मामले में जांच की बात भी कही थी.
  • हालांकि, कुछ ही घंटों बाद BCI ने अपना फैसला वापस ले लिया. BCI ने कहा कि उसे यह भरोसा हो गया है कि पूरे बैच के छात्रों की इस मामले में कोई भूमिका नहीं थी और किसी तरह की गड़बड़ी या आंदोलन के लिए सभी छात्रों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसके बाद मामले की कार्यवाही बंद कर दी गई.
  • यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा. सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने BCI की कार्रवाई पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि छात्रों को विरोध करने का अधिकार है और इस मामले में BCI का हस्तक्षेप जरूरी नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने BCI से इस मामले में जवाब भी मांगा.

हालांकि, BCI का आदेश अब वापस लिया जा चुका है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत BCI के पास लॉ ग्रैजुएट्स के एनरोलमेंट को रोकने की कितनी शक्ति है? और क्या वह किसी पूरे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने का निर्देश दे सकती है?

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लॉ ग्रैजुएट्स का एनरोलमेंट कौन करता है?

इस सवाल का जवाब एडवोकेट्स एक्ट, 1961 में मिलता है. एक्ट की धारा 6 के मुताबिक, स्टेट बार काउंसिल के प्रमुख कामों में योग्य लोगों को अपने रोल पर एडवोकेट के तौर पर एनरोल करना शामिल है. यानी किसी लॉ ग्रैजुएट को एडवोकेट के तौर पर एनरोल करने की मुख्य जिम्मेदारी स्टेट बार काउंसिल की है.

धारा 17 के तहत स्टेट बार काउंसिल एडवोकेट्स का रोल तैयार करती है और उसे बनाए रखती है. वहीं, धारा 22 के मुताबिक, रोल में नाम दर्ज होने के बाद एनरोलमेंट का सर्टिफिकेट भी स्टेट बार काउंसिल ही जारी करती है.

इससे एक बात साफ होती है कि BCI सामान्य प्रक्रिया में सीधे किसी लॉ ग्रैजुएट को एडवोकेट के तौर पर एनरोल नहीं करती.

फिर BCI की भूमिका क्या है?

इसका मतलब यह नहीं है कि एनरोलमेंट की पूरी प्रक्रिया में BCI की कोई भूमिका नहीं है.

  • BCI को एडवोकेट्स एक्ट के तहत स्टेट बार काउंसिल्स की निगरानी करने और उनके कामकाज से जुड़े कुछ मामलों में निर्देश देने की शक्ति मिली है.
  • धारा 7 के तहत BCI के पास प्रोफेशनल कंडक्ट और एथिक्स के स्टैंडर्ड तय करने, लीगल एजुकेशन को बढ़ावा देने और लॉ डिग्री देने वाली यूनिवर्सिटीज की मान्यता से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार हैं.
  • इसके अलावा, धारा 48B BCI को स्टेट बार काउंसिल को उसके कामकाज के उचित और प्रभावी संचालन के लिए निर्देश देने की शक्ति देती है.
  • यही प्रावधान नालसार मामले में BCI की कार्रवाई के पक्ष में इस्तेमाल किया जाने वाला एक संभावित कानूनी आधार हो सकता है. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है.
  • स्टेट बार काउंसिल के कामकाज को लेकर निर्देश देना और किसी यूनिवर्सिटी के पूरे बैच के लॉ ग्रैजुएट्स का एनरोलमेंट रोक देना एक जैसी बात नहीं है. एनरोलमेंट से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण प्रावधान धारा 26 है.

धारा 26 में BCI की क्या भूमिका है?

  • धारा 26 के तहत अगर स्टेट बार काउंसिल की एनरोलमेंट कमेटी किसी व्यक्ति के एनरोलमेंट एप्लिकेशन को रिजेक्ट करने का प्रस्ताव करती है, तो मामले को BCI की राय के लिए भेजा जाता है.
  • इसके बाद स्टेट बार काउंसिल को उस एप्लिकेशन पर BCI की राय के मुताबिक फैसला करना होता है.
  • यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धारा 26 की प्रक्रिया किसी व्यक्ति के एनरोलमेंट एप्लिकेशन से जुड़ी है. यानी पहले किसी व्यक्ति का एप्लिकेशन सामने आता है, फिर स्टेट बार काउंसिल की ओर से उसे रिजेक्ट करने का प्रस्ताव होता है और उसके बाद BCI की भूमिका आती है.
  • इसलिए धारा 26 को आधार बनाकर बिना अलग-अलग छात्रों के एनरोलमेंट एप्लिकेशन पर विचार किए, पूरे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने की शक्ति सीधे तौर पर दिखाई नहीं देती.

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तो क्या लॉ ग्रैजुएट का एनरोलमेंट रोका जा सकता है?

हां. एडवोकेट्स एक्ट में एनरोलमेंट के लिए योग्यता और अयोग्यता, दोनों के प्रावधान हैं.

  • धारा 24 में एडवोकेट के तौर पर एनरोलमेंट की बुनियादी योग्यता बताई गई है. वहीं, धारा 24A कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को एनरोलमेंट के लिए अयोग्य ठहराने का प्रावधान करती है. इसमें कुछ खास अपराधों में दोषसिद्धि जैसी परिस्थितियां शामिल हैं.
  • दूसरी तरफ, प्रोफेशनल मिसकंडक्ट से जुड़ी डिसिप्लिनरी कार्रवाई का ढांचा मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है जो पहले से एडवोकेट के तौर पर एनरोल हो चुके हैं. एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35 इसी तरह की कार्रवाई की प्रक्रिया से जुड़ी है.
  • इसलिए किसी लॉ स्टूडेंट के विरोध या यूनिवर्सिटी से जुड़े किसी विवाद को सीधे प्रोफेशनल मिसकंडक्ट के मामले से जोड़ना अलग कानूनी सवाल है.

तो क्या BCI पूरे बैच का एनरोलमेंट रोक सकती है?

एडवोकेट्स एक्ट, 1961 में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नजर नहीं आता जो BCI को किसी छात्र आंदोलन या विरोध के आधार पर किसी पूरे बैच के एनरोलमेंट पर सीधे रोक लगाने की शक्ति देता हो.

  • स्टेट बार काउंसिल ही एडवोकेट्स के एनरोलमेंट की मुख्य अथॉरिटी है. BCI के पास स्टेट बार काउंसिल्स की निगरानी, निर्देश और कानून में बताए गए कुछ खास मामलों में हस्तक्षेप की शक्तियां जरूर हैं. लेकिन इन शक्तियों को पूरे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने की शक्ति के बराबर मानना अपने आप में एक अलग कानूनी सवाल है.
  • यही नालसार मामले की सबसे अहम बात है. विवाद सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि छात्रों ने CJI को लेकर विरोध क्यों किया. असली सवाल यह भी है कि किसी रेगुलेटरी बॉडी की निगरानी और अनुशासन की शक्ति की सीमा कहां खत्म होती है और किसी लॉ ग्रैजुएट के प्रोफेशन में प्रवेश के अधिकार पर उसका असर कहां से शुरू होता है.
  • BCI ने अपना आदेश वापस ले लिया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एडवोकेट्स के एनरोलमेंट को लेकर BCI और स्टेट बार काउंसिल्स के अधिकारों की सीमा पर एक महत्वपूर्ण बहस जरूर शुरू कर दी है.

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By गौतम कुमार

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