GI tags : जोहार. आज है 19 जून. आदिवासी समाज अपनी अलग पहचान के लिए जानी जाती है. उनके जीवन, विश्वास और प्रकृति से रिश्ते में अनेक बातें छिपी हैं. जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर दें. भारत स्वयं कई परतों में बसा हुआ एक देश है. इसकी तारीख, संस्कृति और लोकज्ञान, लंबे अनुभव की दास्तां बयां करता है. इन मूल्यों को सबसे अधिक बचाकर रखने का काम यहां के आदिवासियों ने किया.
मनुष्य ने खुद के होने का पहला सबूत्त शब्दों से नहीं, बल्कि चित्रों से दिया था. उसने गुफाओं की दीवारों पर अपने हाथों के निशान बनाए. शिकार के दृश्य उकेरे. पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और कुदरत से जुड़े प्रतीकों को गढ़ा. जिनसे उसने अपने अनुभवों और विश्वासों को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया.
समय के साथ इन परम्पराओं का लोककलाओं के रूप में विकास हुआ। भारत की लोककलाएँ केवल सजावट का माध्यम नहीं हैं। वे समाज की स्मृतियों, मान्यताओं और जीवन-दर्शन के पहिये हैं। ऐसी ही एक लोककला है संथाल आदिवासियों की जादोपाटिया चित्रकला.
जादोपाटिया चित्रकला एक अनूठी लोक परंपरा है, जिसने सदियों से कला, कथा और आध्यात्मिकता को एक सूत्र में बाँधकर रखा है. आज जब आधुनिकता और बाजारवाद के दबाव में अनेक पारंपरिक कलाएँ संघर्ष कर रही हैं, तब झारखण्ड के जादोपाटिया को मिला भौगोलिक संकेतक अर्थात् जी.आई. (Geographical Indication) टैग इस विरासत के लिए नई उम्मीद लेकर आया है.
जादोपाटिया: चित्रों में जीवित लोककथाओं की दुनिया
जादोपाटिया झारखंड की प्राचीन स्क्रोल चित्रकला है, जिसका संबंध मुख्य रूप से संथाल समुदाय से माना जाता है. ‘जादो’ और ‘पाटिया’ शब्दों से मिलकर बने इस नाम का अर्थ ही चित्रों के माध्यम से कथा कहने की परंपरा से जुड़ा है. यह कला लंबे कागज या कपड़े के स्क्रोल पर बनाई जाती है और इसके माध्यम से कलाकार विभिन्न कथाओं, धार्मिक विश्वासों और सामाजिक घटनाओं को चित्रों के जरिए प्रस्तुत करते हैं.
जादोपाटिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि सुनने और समझने की भी कला है. चित्रकार जब अपने स्क्रोल खोलते थे, तब वे गीतों और कथाओं के माध्यम से उनमें अंकित दृश्यों का अर्थ भी समझाते थे. इस प्रकार यह चित्रकला दृश्य और श्रव्य, दोनों माध्यमों का अद्भुत संगम बन जाती थी.
प्रकृति से प्राप्त रंग, धरती से जुड़ी पहचान
जादोपाटिया चित्रकला का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका प्रकृति के साथ गहरा संबंध है. इस कला में प्रयुक्त रंग कृत्रिम नहीं होते, बल्कि उन्हें पेड़ों की छाल, पत्तियों, फूलों, पत्थरों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से तैयार किया जाता है. लाल, पीला, हरा, काला और सफेद जैसे रंग प्रकृति की गोद से प्राप्त किए जाते हैं.
यही कारण है कि जादोपाटिया केवल एक कलात्मक परंपरा नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ मनुष्य के सामंजस्य का भी प्रतीक है. इसमें प्रयुक्त प्रत्येक रंग जंगलों, नदियों और मिट्टी से जुड़ा हुआ है. इस दृष्टि से यह कला हमें उस समय की याद दिलाती है, जब मनुष्य प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व का अभिन्न अंग मानता था.
कलाकार से बढ़कर समाज के कथावाचक
संथाल समाज में जादोपाटिया बनाने वाले कलाकारों को केवल चित्रकार नहीं माना जाता था. उन्हें समुदाय का कथावाचक, संस्कारों का संरक्षक और लोकस्मृति का वाहक समझा जाता था. वे गाँव-गाँव घूमकर अपने चित्रों के माध्यम से लोगों को धार्मिक कथाएँ, सामाजिक संदेश और जीवन के विभिन्न प्रसंगों से परिचित कराते थे.
लोककथाओं के अनुसार, जब पृथ्वी पर पहले मनुष्य के पुत्र की मृत्यु हुई, तब संथालों के सर्वोच्च देवता मरांग बुरु ने अपने माथे की मिट्टी से पहले चित्रीकार का निर्माण किया. इस कथा से स्पष्ट होता है कि इस समुदाय में कलाकार की भूमिका केवल मनोरंजन करने वाले व्यक्ति की नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़ी हुई थी.
जीवन से मृत्यु तक, हर संस्कार से जुड़ी रही यह कला
जादोपाटिया चित्रकला केवल त्योहारों और धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं थी. इसका संबंध जीवन और मृत्यु से जुड़े संस्कारों से भी था. विशेष रूप से ‘चोखोदन’ की परंपरा इससे जुड़ी हुई मानी जाती है.
मान्यता थी कि मृत व्यक्ति के चित्र में आँखें अधूरी छोड़ दी जाती थीं. बाद में जब परिवार की ओर से दान दिया जाता, तब चित्रीकार चित्र की आँखों को पूर्ण करता था. इसे मृतक को अगली यात्रा के लिए दृष्टि प्रदान करने का प्रतीक माना जाता था. यह परंपरा बताती है कि उस समय कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह आध्यात्मिक जीवन का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी.
चित्र बनाने के लिए प्रयुक्त ब्रश भी प्राकृतिक साधनों से तैयार किए जाते थे. बकरी के बालों से बने ब्रश और वनस्पतियों से प्राप्त रंग इस कला को पूरी तरह प्रकृति से जोड़ते थे.
जी.आई. टैग: पहचान बचाने की शुरुआत
ऐसे समय में जादोपाटिया चित्रकला को मिला जी.आई. टैग बहुत बड़ी उपलब्धि है. सोहराई कलाकार जयश्री इंदवार बताती है की कैसे उन्हें इसका फायदा मिला. सोहराई पेंटिंग को 2019 में यह टैग मिला था. जयश्री ने तब से आये बदलाव के सफर को बयां किया. विश्व पटल पर पहचान मिलने से बाहरी देशों में सोहराई की माँग बढ़ गयी है. लोग इसके प्राकृतिक रंगों और पैटर्न पर मुँहमाँगा रकम लुटाते है. राज्य सरकार हो या केंद्र, सबका सहयोग मिला है.
एक दूसरी सोहराई और मधुबनी पेंटिंग करने वाली कलाकार डेज़ी सिन्हा ने इसे सिर्फ एक औपचारिक सम्मान नहीं बताया. बल्कि इसमें झारखण्ड की असली तस्वीर दिखाई. किसी भी कला का असली सार लोगों में ही बसता है. अगर वे खुद को पेश कर पाएं, तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके बारे में दुनिया अभी तक नहीं जानती. बहार के लोग यहाँ आते है. दुस्का का वीडियो वायरल किये, लाल चींटी वाला चटनी को वायरल किये, और फिर अपने देश में किसी और नाम से बेचने लगेंगे. हमको-आपको पता भी नहीं चलेगा. इसीलिए जी.आई टैग जरूरी है.
जी.आई. टैग मिलने से जादोपाटिया की पहचान देश-विदेश स्तर पर मजबूत होगी. इससे कलाकारों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर बाजार मिलेंगे. और साथ ही उचित मूल्य और ब्रांडिंग के नए अवसर प्राप्त होंगे. और सबसे जरूरी बात, इस पहचान के कारण पारंपरिक तकनीकों और प्राकृतिक रंगों के उपयोग को प्रोत्साहन बढ़ेगा. जिससे कला की मूल आत्मा को बचाने में सहायता मिलेगी.
केवल सम्मान नहीं, बचाने की जरूरत
हालांकि, सिर्फ जी.आई टैग मिलना ही काफ़ी नहीं है; आने वाली पीढ़ियों के लिए इस कला को ज़िंदा रखने के लिए कई तरह के प्रयासों की ज़रूरत है. इस मामले पर अपने विचार रखते हुए, रानेन्द्र (पूर्व आईएएस अधिकारी और TRI-रांची के पूर्व निदेशक) ने सावधानी बरतने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि अभी फ़ायदे सिर्फ़ उन्हीं लोगों को मिल रहे हैं जिनके नाम केंद्रीय मंत्रालय को भेजे गए हैं. इसलिए, इस सूची में ज़्यादा कलाकारों को शामिल करना ज़रूरी है ताकि पूरे समुदाय को इसका फ़ायदा मिल सके. उन्होंने इस पहल को TRI-रांची के मुख्य मिशन को आगे बढ़ाने वाला कदम माना और झारखंड कैडर की IAS अधिकारी सुश्री हिमानी पांडे के योगदान को सराहा.
वहीं, जाने-माने और राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर आदिवासी फ़िल्म निर्देशक बीजू टोप्पो का नज़रिया और भी गहरा है; उनके विचार निश्चित रूप से आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे. बीजू का मानना है कि झारखंड के स्थानीय मोटे अनाज (मिलेट्स) और पत्तेदार साग-सब्जियों की अपनी एक खास भौगोलिक पहचान है. कुडुख समुदाय द्वारा खाए जाने वाले मोटे अनाजों, जैसे गुर्लू (गोदली), कोड़ाई (मड़ुआ), और मडागी (महुआ), के साथ-साथ चकोर और बेंग जैसी स्थानीय साग-सब्जियों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. उनके अनुसार, इसके दोहरे असर हैं: पहला, आदिवासी समुदायों में चावल और गेहूं के मुकाबले मोटे अनाजों की खपत कम हो गई है; दूसरा, इनकी खेती में रसायनों का इस्तेमाल, और उनके इस्तेमाल का तरीका, दोनों समस्या पैदा करने वाला है. इन दोनों वजहों से गाँव के स्तर पर आदिवासियों के खान-पान की आदतें बदल गई हैं. अब जब मोदी सरकार मोटे अनाजों को बढ़ावा दे रही है, तो इस पहल में झारखंड की स्थानीय किस्मों को भी शामिल किया जाना चाहिए.
जी.आई टैग: ये दिल मांगे और!
जादोपाटिया जैसे कला सिर्फ चित्रों का संग्रह नहीं है. यह झारखंड की मिट्टी, जंगल, लोकविश्वास और सामुदायिक स्मृति का जीवित दस्तावेज है. जी.आई. टैग ने इस विरासत को नई पहचान और सम्मान दिया है. लेकिन इसकी असली सफलता तभी होगी, जब समाज, सरकार, बाजार और नई पीढ़ी मिलकर इसके संरक्षण का दायित्व निभाएँगे.
जादोपाटिया के माध्यम से यह भी स्पष्ट होता है कि झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा तक सीमित नहीं है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी सांस्कृतिक और आदिवासी विरासत है. राज्य में अनेक ऐसी लोककलाएँ, हस्तशिल्प, पारंपरिक खाद्य पदार्थ और वन उत्पाद हैं, जिनमें जी.आई. टैग प्राप्त करने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं.
यदि इन धरोहरों को पहचान, संरक्षण और बाजार से जोड़ा जाए, तो वे न केवल हजारों परिवारों की आजीविका को मजबूत कर सकती हैं. बल्कि झारखंड को देश और दुनिया में एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान भी दिला सकती हैं. जादोपाटिया और इसके जैसे अन्य 11 उत्पादों की सफलता इसी दिशा में एक जरूरी शुरुआत है.
