जम्मू-कश्मीर में पहली बार अलगाववादियों के प्रभाव से मुक्त होंगे विधानसभा चुनाव, ये है बीजेपी की रणनीति

Jammu Kashmir Election 2024 : जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव तीन चरणों में होने वाले हैं और 8 अक्टूबर को मतगणना होगी. इस चुनाव पर पूरे देश की नजर है चूंकि यह चुनाव आर्टिकल 370 हटाए जाने और परिसीमन के बाद हो रहा है. इस चुनाव में लद्दाख के लोग भाग नहीं लेंगे. पहले लद्दाख को मिलाकर 87 सीटें थी अब उसे हटाकर 90 सीटों पर मतदान होगा. इस चुनाव को जीतने के लिए बीजेपी ने क्या रणनीति बनाई है और इस चुनाव में क्या होगा खास?

Jammu Kashmir Election 2024 : जम्मू-कश्मीर का विधानसभा चुनाव इस बार बहुत खास होने जा रहा है, यही वजह है कि पूरा देश इस चुनाव के बारे में जानने को उत्सुक है. पार्टियों की रणनीति क्या है, कौन से मुद्दे इस चुनाव में हावी रहेंगे हो रहे हैं, पिछले चुनाव से यह चुनाव अलग कैसे है, इत्यादि. 12 सितंबर को नामांकन का अंतिम दिन था, यहां तीन चरणों में मतदान होना है. चुनावी मैदान में मुख्य रूप से तीन पार्टियां आमने-सामने हैं, बीजेपी, पीडीपी, नेशनल काॅन्फ्रेंस और कांग्रेस का गठबंधन. बीजेपी और पीडीपी अपने-अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरी हैं, जबकि नेशनल काॅफ्रेंस और कांग्रेस ने गठबंधन किया है. 

आर्टिकल 370 का मुद्दा पूरे जम्मू-कश्मीर चुनाव पर छाया रहने वाला है. एक ओर तो बीजेपी आर्टिकल 370 के मुद्दे को लेकर अपने वोटर्स के पास जाने वाली है, वहीं पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस 370 को बहाल करने का वादा अपने वोटर्स से कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में आर्टिकल 370 को बहाल करने से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 30 सितंबर तक चुनाव कराने को कहा था, उसी आदेश पर चुनाव कराए जा रहे हैं.

जम्मू-कश्मीर में कितनी सीट है?

परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की 114 सीटें हैं, जिनमें से 24 सीटें पीओके के लिए हैं. फिलवक्त 90 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, जिनमें से 47 सीटें कश्मीर में और 43 सीटें जम्मू में हैं. परिसीमन से पहले जम्मू-कश्मीर में 111 सीटें थी, जिसमें से 46 सीट कश्मीर में, 37 सीट जम्मू में और चार सीट लद्दाख में थी, 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए थी. 2024 में जो चुनाव हो रहा है उसमें लद्दाख की चार सीटें शामिल नहीं हैं, क्योंकि 2019 में जब जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाया गया, तो जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर दिया गया था और इसे अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था. अगर लद्दाख की चार सीटों को हटा दिया जाए तो परिसीमन के पहले की स्थिति में जम्मू-कश्मीर में सिर्फ 107 सीटें रहतीं, लेकिन परिसीमन की वजह से यह 114 है. परिसीमन के जरिए जम्मू में छह सीटों को बढ़ाया गया और यह 37 से 43 हो गया, जबकि कश्मीर में इसे 46 से 47 किया गया.

जम्मू-कश्मीर चुनाव में बीजेपी की क्या होगी रणनीति?

जम्मू-कश्मीर के चुनाव में बीजेपी का फोकस जम्मू पर है, क्योंकि यहां विधानसभा की 43 सीटें हैं. बहुमत के लिए सरकार को 46 सीटों की जरूरत होगी. कश्मीर में बीजेपी का एक भी उम्मीदवार आज तक चुनाव नहीं जीता है, इस बात को बीजेपी भी जानती है कि वह कश्मीर में बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है, यही वजह है कि बीजेपी ने महज 19 उम्मीदवार यहां से उतारे हैं. 28 सीटों पर बीजेपी ने अपना कोई उम्मीदवार नहीं दिया है. 

राजनीतिक विश्लेषक उमेश चतुर्वेदी ने कहा कि इस बार के चुनाव में बीजेपी ने जम्मू में क्लीन स्वीप करने का सोचा है इसलिए उसने यहां के 43 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं. बीजेपी जम्मू के इलाके में यह बता रही है कि आर्टिकल 370 हटाने के बाद प्रदेश में क्या बदला है और इससे हिंदू आबादी को कितना लाभ मिला है. साथ ही बीजेपी यह भी बता रही है कि किस तरह आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद अलगाववादी और आतंकियों पर लगाम कसी गई है. स्कूल खुले हैं चुनाव प्रचार हो रहे हैं, स्वतंत्र माहौल में चुनाव हो रहे हैं. 

घाटी में बीजेपी मजबूत नहीं है और उसे बहुत काम करने की जरूरत है, यही वजह है कि इन इलाकों में बीजेपी निर्दलीय उम्मीदवारों के पक्ष में खड़ी और और उसकी कोशिश यह है कि वो निर्दलीयों को साथ लेकर आए और अपनी सरकार बनाए. आजादी के बाद से अबतक जम्मू-कश्मीर में जिस तरह के हालात रहे हैं, वहां के लोग पूरी तरह मुख्यधारा में नहीं आ सके हैं और ना देश की हर चीज को समझ सकें, वे अब इन चीजों को देख और समझ रहे हैं, संभव है कि चुनाव के बाद बीजेपी को इसका फायदा मिले और वह सरकार गठन के कुछ नए फाॅर्मूले लेकर आए. 

बीजेपी को खलनायक बनाना चाहती है पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस

राजनीतिक विश्लेषक अवधेश कुमार ने कहा कि बीजेपी इस चुनाव में खुद को नायक बनाना चाहती है जबकि उसकी विरोधी पार्टियां उसे खलनायक बनाने में जुटी हैं. बीजेपी जिस रणनीति के साथ इस चुनावी मैदान में उतरी है, वह साफ है. बीजेपी ने जम्मू पर फोकस किया है और यह बता रही है कि वह किस तरह प्रदेश में अमन और शांति लेकर आई है. विकास के कितने कार्य हुए हैं. बीजेपी वोटर्स को यह समझा रही है कि आप विकास से महरूम थे, उन्होंने विकास योजनाओं की जानकारी दी. सवा लाख करोड़ रुपए निवेश की बात बताई है. बीजेपी ने यहां एससी और एसटी को आरक्षण दिया है. 

अवधेश कुमार बताते हैं कि कश्मीर घाटी में बीजेपी कमजोर है, इसलिए वह कोशिश में है कि निर्दलीयों को सपोर्ट करके पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस गठबंधन को हराए, ताकि उनकी सरकार प्रदेश में बन जाए. जिस प्रकार होम टूरिस्ट जम्मू-कश्मीर में बढ़े हैं और पार्टियां चुनाव प्रचार शांति से कर पा रही है, बीजेपी उसका भी श्रेय ले रही है. 

पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस जिसका कांग्रेस के साथ गठबंधन है इन पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में यह साफ किया है कि वे सरकार बनने पर आर्टिकल 370 को बहाल करेगी. साथ ही उन्होंने उन तमाम बातों का जिक्र घोषणा पत्र में कर चुके हैं, जो प्रदेश के विशेषाधिकार से जुड़े हैं.

2024 में जम्मू-कश्मीर चुनाव की खासियत

  • पहला चुनाव है जब जम्मू-कश्मीर में एक आम राज्य की तरह चुनाव होंगे, यानी कोई विशेषाधिकार नहीं होगा.
  • चुनाव में पहली बार जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी 18 साल के युवा मतदान का प्रयोग करेंगे
  • हुर्रियत काॅन्फ्रेंस और अलगाववादी नेताओं के प्रभाव से मुक्त चुनाव
  • पाकिस्तान का झंडा नहीं लहराएगा
  • पहला चुनाव जिसमें वोट बहिष्कार की घोषणा नहीं हुई

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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