दुनिया के लिए चिंता सिर्फ युद्ध की नहीं है, बल्कि अब डर इस बात का है कि इन युद्धों का असर आने वाले दिनों में और कितना बड़ा होगा. वजह यह है कि इन संघर्षों की आंच उस ऊर्जा नेटवर्क तक पहुंच चुकी है, जिस पर वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्भर है.
एक तरफ अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण हॉर्मूज जलडमरूमध्य में तेल और गैस की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है तो दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध और उससे जुड़े प्रतिबंधों ने पहले से ही वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना रखा है. हॉर्मूज में जारी संकट से तेल की सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है, जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध भी ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनाए हुए है.
यानी दुनिया इस वक्त दो युद्धों के बीच फंसी तेल-गैस सप्लाई चेन का असर झेल रही है. ऐसे में सवाल ये है कि अगर ये संकट लंबा चला तो इसकी कीमत दुनिया और आम लोगों को कितनी चुकानी पड़ेगी?
हॉर्मूज संकट का असर, हर दिन 14 मिलियन बैरल कम हो रहा तेल उत्पादन
- सबसे बड़ी चिंता इस समय हॉर्मूज जलडमरूमध्य को लेकर है. यह दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस समुद्री रास्तों में से एक है. Reuters के एक रिपोर्ट के मुताबिक 4 सितंबर को हॉर्मूज से सिर्फ चार कारोबारी जहाज गुजरे. पिछले 10 दिनों में रोजाना औसतन करीब 15 जहाज इस रास्ते से गुजर रहे है. जबकि युद्ध से पहले यहां हर दिन करीब 125 कारोबारी जहाजों की आवाजाही होती थी.
- जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट का सीधा असर तेल की सप्लाई पर पड़ रहा है. IEA के मुताबिक अगर हॉर्मूज में लंबे समय तक रुकावट रही तो दुनिया के उर्जा बाजार में तेल की कमी हो सकती है. रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 तक खाड़ी देशों की तेल सप्लाई में कुल नुकसान एक अरब बैरल से ज्यादा दर्ज किया गया था और 14 मिलियन बैरल प्रतिदिन से ज्यादा तेल उत्पादन बंद था.
- इधर 5 सितंबर को अमेरिका और ईरान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ है. इसके बाद से हॉर्मूज से जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता और बढ़ गई. इसका असर तेल की कीमतों पर भी दिखा और ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया.
- दूसरी बड़ी चिंता तेल के भंडार को लेकर है. IEA के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद दुनिया के तेल भंडार में करीब 410 मिलियन बैरल की कमी आई है. जुलाई के अंत तक वैश्विक तेल भंडार 7.9 अरब बैरल से नीचे आ गया था. यानी फिलहाल दुनिया के पास स्टॉक तो है, लेकिन यह लगातार कम हो रहा है.
सिर्फ तेल नहीं, गैस पर भी खतरा
- हॉर्मूज संकट की चिंता सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है. इस रास्ते से LNG यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस भी बड़ी मात्रा में दुनिया के बाजारों तक पहुंचती है.
- IEA के मुताबिक, हॉर्मूज में संकट के कारण कतर और संयुक्त अरब अमीरात से LNG की सप्लाई में रोजाना 300 मिलियन घन मीटर से ज्यादा की कमी आई है.
- इसका मतलब है कि संकट अगर लंबे समय तक चलता है तो असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक नहीं रहेगा. बिजली बनाने, कारखाने चलाने, उर्वरक बनाने और परिवहन की लागत भी बढ़ सकती है.
यानी हॉर्मूज में शुरू हुआ संकट धीरे-धीरे दुनिया के बाकी हिस्सों और आखिर में आम लोगों की जेब तक पहुंच रहा है.
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दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध से बढ़ रहा दबाव
- दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी तेल और ईंधन की सप्लाई को प्रभावित किया है.
- Reuters के मुताबिक रूस ने 2026 के लिए अपने तेल उत्पादन का अनुमान घटाकर करीब 9.88 मिलियन बैरल प्रतिदिन कर दिया है. यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस की कुछ रिफाइनरियों और ईंधन उत्पादन पर भी असर पड़ा है.
- इस युद्ध ने पिछले कुछ सालों में दुनिया के ऊर्जा कारोबार का तरीका भी बदल दिया है. रूस पर लगे प्रतिबंधों के बाद उसके तेल के पुराने खरीदार और रास्ते बदले. यानी तेल अब पहले की तरह सीधे यूरोप नहीं जा रहा, बल्कि दूसरे बाजारों तक पहुंचाने के लिए लंबी दूरी और अलग-अलग समुद्री रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है.
- इसका मतलब यह है कि रूस से तेल की सप्लाई पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन उसे दुनिया के बाजारों तक पहुंचाने की लागत और जोखिम बढ़ गए हैं. शिपिंग, बीमा और प्रतिबंधों से जुड़ी पाबंदियां भी इस कारोबार को पहले से ज्यादा जटिल बनाती हैं.
- उदाहरण के लिए भारत जैसे बड़े तेल खरीदारों पर भी इसका असर पड़ता है. रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत के लिए अहम विकल्प बना हुआ है, लेकिन अगर रूस की सप्लाई, जहाजों की उपलब्धता या बीमा की लागत पर दबाव बढ़ता है, तो इस तेल का फायदा भी कम हो सकता है.
- यानी दुनिया के सामने इस समय दो तरफ से ऊर्जा संकट का खतरा है, एक तरफ रूस से जुड़ी तेल सप्लाई, प्रतिबंध और बदले हुए व्यापारिक रास्ते, तो दूसरी तरफ मध्य-पूर्व में हॉर्मूज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ता तनाव.
दुनिया चुका रही कीमत,भारत के लिए क्यों है ये खतरे का संकेत ?
- इस संकट की कीमत सिर्फ कच्चे तेल के महंगे होने तक सीमित नहीं है. अगर हॉर्मूज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही कम रहती है और उन्हें लंबे रास्तों से जाना पड़ता है, तो ईंधन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा. इसका असर तेल और गैस से आगे बढ़कर परिवहन, बिजली और उद्योगों तक पहुंच सकता है.
- क्योंकि आखिर में कंपनियों की लागत बढ़ेगी और इसका बोझ सामान की कीमतों के जरिए आम लोगों तक पहुंचेगा.
- भारत इस संकट से अलग नहीं रह सकता. भारत अपने तेल आयात का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा मिडिल ईस्ट से ले रहा था. ऐसे में हॉर्मूज के रास्ते में लंबे समय तक रुकावट रहती है तो भारत के लिए तेल की सप्लाई और उसे लाने की लागत, दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
- दूसरी तरफ भारत ने रूसी तेल की खरीद भी काफी बढ़ाई है. जुलाई 2026 में भारत के कुल क्रूड आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 50.83 फीसदी तक पहुंच गई थी.
- यानी भारत के सामने इस समय दोहरी चुनौती है. एक तरफ मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल की सप्लाई और उसकी लागत का सवाल है, तो दूसरी तरफ रूस से मिलने वाले तेल की सप्लाई, शिपिंग और प्रतिबंधों से जुड़ा जोखिम है.
- अगर दोनों मोर्चों पर दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत के लिए तेल का आयात महंगा हो सकता है, इसका असर आगे पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई, उद्योगों की लागत और महंगाई पर पड़ सकता है.
कितने दिन और रहेगा ये संकट ?
- सवाल यह है कि तेल-गैस की सप्लाई कितने समय तक प्रभावित रहती है और मौजूदा भंडार इस दबाव को कितने दिन संभाल पाते हैं.
- IEA के मुताबिक, 2026 में वैश्विक तेल सप्लाई करीब 4.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन घट सकती है और तीसरी तिमाही में सप्लाई घाटे का खतरा बना हुआ है.
- अगर हॉर्मूज संकट लंबा खींचता है और रूस की सप्लाई पर भी दबाव रहता है, तो सिर्फ तेल ही नहीं, शिपिंग, बीमा और माल ढुलाई भी महंगी होगी. यानी आखिरकार दुनिया को महंगे ईंधन और पूरी सप्लाई चेन की बढ़ी लागत की कीमत चुकानी पड़ सकती है.
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