कौन थे चोल साम्राज्य के शासक राजेंद्र चोल, जिनके जयंती समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी?

Gangaikonda Cholapuram : राजेंद्र चोल प्रथम, चोल साम्राज्य के ऐसे शासक जिन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार समुद्र के पार तक किया. वे एक बेहतरीन शासक और योद्धा थे. उन्होंने तमिल संस्कृति के विस्तार में अहम भूमिका निभाई और यह कोशिश की कि दक्षिण भारत और उत्तर भारत को एक साम्राज्य में शामिल किया जाए. राजेंद्र चोल को सम्मान देकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है. उन्होंने अपने इस प्रयास के जरिए हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति को मजबूत करने की कोशिश की है.

Gangaikonda Cholapuram : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु के दौरे पर गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर पहुंचे और उन्होंने वहां पूजा अर्चना की. वे यहां के प्राचीन तिरुवथिरई महोत्सव में भाग ले रहे थे.यह महोत्सव तमिलनाडु के प्रसिद्ध चोल साम्राज्य के सम्राट राजेंद्र चोल की जयंती का समारोह है.प्रधानमंत्री के इस अवसर पर वहां पहुंचने से लोगों का ध्यान उस ओर गया है और सबकी रुचि यह जानने में है कि प्रधानमंत्री राजेंद्र चोल में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं.

कौन थे राजेंद्र चोल जिनके जयंती समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी

राजेंद्र चोल प्रथम, चोल साम्राज्य के सबसे प्रतापी शासक थे. उन्होंने 1014 से 1044 ईस्वी तक शासन किया था. वे 1012 में ही अपने पिता राजराजा के साथ सहशासक बन गए थे. उनकी मृत्यु के बाद वे 1014 में राजा बने. राजेंद्र चोल प्रथम ने अपने साम्राज्य का काफी विस्तार किया और वे भारत के पहले सम्राट थे जिन्होंने समुद्र पार सैन्य अभियान चलाया और विजयी हुए. राजेंद्र चोल ने अपना साम्राज्य श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार और इंडोनेशिया तक फैलाया था. साथ ही राजेंद्र चोल ने दक्षिण भारत से निकलकर अपने साम्राज्य का विस्तार गंगा के मैदानी इलाकों तक करने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश कुछ विजय तक ही सीमित रही, वे स्थायी रूप से यहां अपना शासन नहीं जमा पाए थे. बावजूद इसके चोल राजा के इस अभियान को बहुत खास माना जाता है क्योंकि यह दक्षिण से उत्तर तक को एक साम्राज्य में लाने के कोशिश थी.

प्रधानमंत्री मोदी

राजेंद्र चोल प्रथम के प्रमुख कार्य

राजेंद्र चोल प्रथम ने तमिल संस्कृति का विस्तार तो किया, लेकिन उन्होंने पूरे भारत को एकछत्र के नीचे लाने की कोशिश की थी. राजेंद्र चोल ने अपनी एक नई राजधानी बनाई और उसे नाम दिया गंगईकोंडा चोलपुरम. चोलों की यह राजधानी बहुत खूबसूरत है. राजेंद्र चोल ने यहां कई बेहतरीन मंदिर भी बनवाए. साथ ही उन्होंने जल प्रबंधन और तमिल संस्कृति के प्रसार का भी कार्य किया. राजेंद्र चोल शैव थे, इसलिए उन्होंने शिव मंदिरों का निर्माण कराया, लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म का भी स्वागत किया. यह उनकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक है. चोल साम्राज्य के राजा प्रजातांत्रिक मूल्यों में विश्वास करते थे और उन्होंने इसे अपने शासन का आधार बनाया था.

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पीएम मोदी राजेंद्र चोल के जयंती समारोह में क्यों हुए शामिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रयास में हैं कि पूरे देश को एकसूत्र में बांधा जाए. तमिलनाडु में जिन राजनीतिक दलों का प्रभाव है, वह हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांत का विरोध करती है. वे तमिल संस्कृति के पक्षधर हैं. पीएम मोदी यह चाहते हैं कि वे राजेंद्र चोल को सम्मान देकर तमिल की राजनीति में एंट्री करें और तमिल गौरव और राष्ट्रीय गौरव को एक साथ लेकर आएं. इसके साथ ही पीएम मोदी इस कोशिश में भी हैं कि देश के उन महान सपूतों को हाईलाइट किया जाए, जो मुगलों की गौरव गाथा के नीचे दबकर रह गए हैं, जबकि उनका योगदान महत्वपूर्ण है.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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