यूरोप में मेगाफायर, भारत में वाइल्डफायर, जानिए क्यों भड़क रही है जंगलों की आग

यूरोप और भारत दोनों में जंगल की आग का खतरा बढ़ रहा है, लेकिन इसके कारण और स्वरूप अलग हैं. यूरोप में जलवायु परिवर्तन और मेगाफायर बड़ी चुनौती हैं, जबकि भारत में अधिकांश आग मानवीय गतिविधियों से जुड़ी होती है. जानिए दोनों के बीच क्या है प्रमुख अंतर

यूरोप के कई देश इस समय जंगल की आग की चपेट में हैं. ग्रीस, स्पेन, फ्रांस और पुर्तगाल में आग ने हजारों हेक्टेयर जंगल को राख में बदल दिया है, हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा हैं., भारत में भी हर साल जंगलों में आग लगती है, लेकिन यहां इसकी वजह और स्थिति यूरोप से काफी अलग हैं. जहां यूरोप में जलवायु परिवर्तन, भीषण हीटवेव और 'फायर क्लाउड' (Fire Clouds) जैसी घटनाएं आग को और अधिक खतरनाक बना रही हैं, वहीं भारत में अधिकांश जंगल की आग मानवीय गतिविधियों (Human Activities) से जुड़ी होती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दोनों जगहों पर जंगल की आग का संकट एक जैसा है? अगर नहीं, तो इसके कारण, फैलने का तरीका और इसके समाधान के तरीके कितनी अलग है? इस लेख में हम जानेंगे कि यूरोप और भारत में जंगल की आग के बीच क्या बड़े अंतर हैं, दोनों क्षेत्रों में आग लगने की प्रमुख वजहें क्या हैं और इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए किन उपायों की जरूरत है.

यूरोप में जंगल की आग बन रही है मेगा फायर

यूरोप के जंगल में आग को लेकर वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल गर्मी या सूखे का नतीजा नहीं है. जलवायु परिवर्तन, लगातार बढ़ती हीटवेव, मौसम में अचानक बदलाव और जंगलों में बढ़ता सूखा बायोमास मिलकर ऐसी स्थिति बना रहे हैं, जिसमें आग तेजी से फैलती है और उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाता है. इस तबाही के पीछे की 5 बड़ी वजहें हैं

जलवायु परिवर्तन बना सबसे बड़ा कारण

  • विशेषज्ञों के अनुसार, यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है. यहां तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है.
  • जिसका असर हो रहा कि जंगलों में आग लगने का मौसम अब पहले से काफी लंबा हो गया है. जहां पहले आग की घटनाएं मुख्य रूप से जुलाई और अगस्त तक सीमित रहती थीं, वहीं अब मई से ही आग शुरू होकर अक्टूबर तक जारी रहती है.

हीटवेव और सूखे कारण बारूद का ढेर बन रहा यूरोप

  • लगातार पड़ रही भीषण गर्मी और लंबे सूखे के कारण जंगलों की मिट्टी और पेड़-पौधों की नमी लगभग खत्म हो जाती है.
  • जब तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है, तो सूखी घास, पत्तियां और पेड़ मामूली चिंगारी से भी तेजी से आग पकड़ लेते हैं. ऐसे में एक छोटी सी लापरवाही भी कुछ ही घंटों में हजारों हेक्टेयर जंगल को अपनी चपेट में ले लेती है.

क्लाइमेट व्हिप्लैश बढ़ रहा खतरा

  • वैज्ञानिकों ने हाल के वर्षों में एक नई स्थिति की पहचान की है, जिसे 'क्लाइमेट व्हिप्लैश' कहा जाता है.
  • इसमें पहले भारी बारिश होती है, जिससे जंगलों में घास और झाड़ियां तेजी से उग जाती हैं. इसके तुरंत बाद जब भीषण गर्मी और सूखा पड़ता है, तो यही वनस्पति सूखकर आग के लिए ईंधन बन जाती है. परिणामस्वरूप आग पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी और तीव्रता से फैलती है.

आग खुद बना रही है अपना मौसम

  • जब जंगल की आग बहुत बड़े क्षेत्र में फैल जाती है, तो उससे निकलने वाली गर्म हवा, धुआं और नमी मिलकर विशाल पायरोक्युलोनिमस (Pyrocumulonimbus) बादल बना सकते हैं.
  • ये बादल सूखी बिजली (Dry Lightning) और तेज, अनियंत्रित हवाएं पैदा करते हैं, जिससे कई किलोमीटर दूर नए स्थानों पर भी आग लग जाती है. यही कारण है कि कई बार आग बुझाने वाली टीमें भी अचानक बदलते हालात में फंस जाती हैं.

गांव खाली होने से बढ़ा जंगलों में ईंधन

  • यूरोप के कई ग्रामीण इलाकों से पिछले कुछ दशकों में बड़ी संख्या में लोग शहरों की ओर चले गए हैं. इसके कारण खेती, पशुपालन और जंगलों की नियमित सफाई कम हो गई है.
  • अब जंगलों में सूखी घास, झाड़ियां और लकड़ियों का बड़ा भंडार जमा हो गया है. विशेषज्ञ इसे 'फ्यूल लोड' कहते हैं. जब उसमें आग लगती है, तो अत्यधिक ईंधन मिलने के कारण आग बेहद तेज और विनाशकारी रूप ले लेती है.

यूरोप के जंगलों में आग को लेकर क्या हैं वैज्ञानिकों की राय ?

  • कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S), विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), संयुक्त राष्ट्र के IPCC, नासा (NASA) और यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में आग के अनुकूल मौसम लगातार बढ़ रहा है.
  • विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया और जंगलों का बेहतर प्रबंधन नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यूरोप में मेगा फायर की घटनाएं और अधिक गंभीर हो सकती हैं.
  • वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, बेहतर वन प्रबंधन और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर ही इस बढ़ते खतरे को सीमित किया जा सकता है.

जलवायु परिवर्तन से भारत में भी बढ़ रहा खतरा

भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (CEEW) और अन्य आधिकारिक संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि भारत के जंगलों में आग का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. यह खतरा जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा और मानवीय लापरवाही का नतीजा है. समझिए भारत में क्यों है खतरे का संकेत

36% से अधिक वन क्षेत्र खतरे की जद में

  • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अनुसार, देश का 36 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र, यानी लगभग 2.52 लाख वर्ग किलोमीटर इलाका, जंगल में लगने वाली आग के मामले में अत्यधिक संवेदनशील है.
  • वहीं CEEW की रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों में जंगल में आग की घटनाओं में 89 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है.
  • विशेषज्ञों का कहना है, बदलते मौसम का प्रभाव है कि देश के 75 प्रतिशत से अधिक जिले बाढ़, सूखा और हीटवेव जैसी चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर रहे हैं. यही परिस्थितियां जंगलों में लगने वाली आग की आशंका को और बढ़ा रही हैं.

भारत में क्यों बढ़ रहा है खतरा?

  • जानकारों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार बदल रहे मौसम के कारण आज मार्च और अप्रैल में ही कई राज्यों का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, इससे जंगलों की नमी तेजी से कम हो जाती है और सूखी पत्तियां मामूली चिंगारी से भी आग पकड़ लेती हैं.
  • विशेषज्ञों यह भी मानते हैं कि भारत में अब वाइल्डफायर पहले की तुलना में लंबा हो गया है. जहां पहले आग की घटनाएं अप्रैल और मई में अधिक होती थीं, वहीं अब फरवरी के अंत से ही इसकी खबर आनी शुरू होने लगती है.
  • उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में चीड़ के जंगल वाइल्डफायर की बड़ी वजह माने जाते हैं. चीड़ की सूखी पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'पीरुल' कहा जाता है, अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं और आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं.
  • वन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में लगभग 95 प्रतिशत वाइल्डफायर की घटनाएं किसी न किसी रूप में मानवीय गतिविधियों से जुड़ी होती हैं. जंगल की सूखी पत्तियां जलाना, बीड़ी-सिगरेट फेंकना तथा झूम खेती जैसी गतिविधियां आग लगने के प्रमुख कारण हैं.
  • इसके अलावा अल-नीनो जैसी जलवायु घटनाएं मानसून से पहले सूखे की अवधि को लंबा कर देती हैं, जिससे जंगलों में आग फैलने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है.

किन क्षेत्रों में सबसे अधिक खतरा?

  • भारत में वाइल्ड फायर का सबसे अधिक असर पश्चिमी और मध्य हिमालय के राज्यों, विशेष रूप से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में देखा जाता है. यहां चीड़ के जंगलों में लगने वाली आग कई दिनों तक धुआं फैलाती है. इससे निकलने वाला ब्लैक कार्बन हिमालयी ग्लेशियरों पर जमा होकर उनके पिघलने की रफ्तार भी बढ़ रहा है.
  • पूर्वोत्तर भारत के असम, मिजोरम और नागालैंड जैसे राज्यों में देश के सबसे अधिक फायर अलर्ट दर्ज किए जाते हैं. यहां झूम खेती और लंबे सूखे के कारण आग अक्सर बड़े जंगलों तक फैल जाती है.
  • वहीं मध्य भारत के ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के शुष्क पर्णपाती जंगल भी गर्मियों में अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं. कई बार स्थानीय स्तर पर लगाई गई छोटी आग सिमलीपाल टाइगर रिजर्व(ओडीशा) जैसे संरक्षित क्षेत्रों तक पहुंच जाती है.

समाधान क्या है?

  • विशेषज्ञों का मानना है कि वाइल्डफायर से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदायों की भागीदारी दोनों जरूरी हैं.
  • इसके लिए ISRO के INSAT और NASA के MODIS तथा VIIRS सैटेलाइट डेटा की मदद से रियल-टाइम फायर अलर्ट सिस्टम को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है, ताकि आग लगने के कुछ ही मिनटों के भीतर संबंधित टीमों को सूचना मिल सके.
  • साथ ही चीड़ की सूखी पत्तियों (पीरुल) का उपयोग बिजली उत्पादन, ब्रिकेट और हस्तशिल्प उद्योगों में बढ़ावा देकर जंगलों में ज्वलनशील सामग्री कम की जा सकती है.
  • उत्तराखंड की वन पंचायतों की तर्ज पर स्थानीय ग्रामीणों को प्रशिक्षित कर वाइल्डफायर नियंत्रण में शामिल करना भी एक प्रभावी उपाय माना जा रहा है.

यानी कि जलवायु परिवर्तन के दौर में वाइल्डफायर अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जैव विविधता, जल संसाधनों, वन्यजीवों और मानव जीवन से जुड़ा गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसको लेकर जानकार कहते हैं कि वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर वन प्रबंधन और जनभागीदारी के जरिए ही इस बढ़ते खतरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है.

भारत और यूरोप के वाइल्डफायर में क्या है अंतर

भारत और यूरोप के वाइल्डफायर में अंतर भी है. यूरोप में तेज हवाओं के कारण पेड़ों की ऊपरी सतह तक फैलने वाली आग अधिक होती है, जबकि भारत में अधिकांश घटनाएं जमीन पर फैली सूखी पत्तियों तक सीमित रहती हैं. दोनों जगहों के आग में क्या अंतर है इसे समझने के लिए देखिए इन्फोग्राफिक

भारत में भी बढ़ रहा है यूरोप जैसी आग का खतरा !

भारत में भी यूरोप जैसी विनाशकारी आग (Megafires) का खतरा बढ़ रहा है. इसकी शुरुआत भारत के कई हिस्सों में पहले ही देखी जा चुकी है. वैज्ञानिकों और पर्यावरण नीति विशेषज्ञों के अनुसार, जिन कारणों से यूरोप के जंगलों में बेकाबू आग लग रही है, वे सभी परिस्थितियां जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में भी तेजी से आकार ले रही हैं.

यूरोप और भारत में जंगल की आग की वजहें भले ही अलग हों, लेकिन दोनों एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती हैं. बदलती जलवायु और बढ़ता तापमान जंगलों को पहले से ज्यादा संवेदनशील बना रहे हैं. ऐसे में सिर्फ आग लगने के बाद उसे बुझाने की रणनीति काफी नहीं होगी.

जरूरत इस बात की है कि जंगलों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए, आग की शुरुआती चेतावनी देने वाली प्रणालियों को मजबूत बनाया जाए और स्थानीय समुदायों को संरक्षण का सक्रिय हिस्सा बनाया जाए. अगर समय रहते ये कदम नहीं उठाए गए, तो जंगल की आग केवल पर्यावरण का संकट नहीं रहेगी, बल्कि लोगों की जिंदगी, जैव विविधता और अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा खतरा बन सकती है.


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By गौतम कुमार

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