सोमवार को जब एक साथ हजारों की संख्या में CJP के प्रोटेस्टर, संसद की तरफ बढ़ रहे थे तो पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज किया और उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े. इस प्रोटेस्ट का कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. वीडियों में कुछ ऐसे लोग है जो सादे कपड़े में हैं और लाठीचार्ज कर रहे हैं. उनको लेकर दावा है कि वो पुलिस वाले हैं. जिसको लेकर सोशल मीडिया यूजर और CJP ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए सवाल किए हैं. आपने भी वो वीडियो देखा होगा. आपकी तरह हमने भी जब वो वीडियो देखा तो उसके कमेंट्स में कुछ ऐसे सवाल थे. जिसका जवाब जानना हमने जरूरी समझा.
- क्या पुलिस इस तरह के प्रोटेस्ट के दौरान अपनी पहचान छिपाकर कार्रवाई कर सकती है?
- क्या भारतीय कानून पुलिसकर्मियों को बिना नेमप्लेट या सादे कपड़ों में बल प्रयोग करने की अनुमति देता है?
- इस मामले में कानून और अदालतों के निर्देश क्या हैं.
हमने आपके इस लेख इन कानूनी सवालों की जांच की और पाया कि इस तरह का डायरेक्ट नियम हमारे संविधान में तो नहीं है, लेकिन इस से मिलते जुलते कई नियम हैं.
पुलिस कब पहन सकती है सादा लिबास
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय 11 (धारा 148 से 160) में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को अधिकार दिए गए हैं. हालांकि इन धाराओं में यह साफ नहीं किया गया है कि इस दौरान पुलिसकर्मियों या सुरक्षा बलों को अपनी पहचान दिखाना अनिवार्य है या नहीं.
इस मामले को लेकर कानून के जानकारों का कहना है कि
कानून केवल मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को ही भीड़ हटाने का अधिकार देता है. जिसका मतलब हुआ कि मजिस्ट्रेट या पुलिस की पहचान स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि ऐसा कौन कर रहा है. कानून के जानकार ये भी कहते हैं कि यदि कोई पुलिस अधिकारी पहचान में न आए, तो भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वो कानून के आदेश का पालन कर रहा है यह प्रभावी कैसे माना जाएगा?
पुलिस के सादे लिबास पर सुप्रीम कोर्ट में हो चुकी है सुनवाई
1997 में डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किए थे. इस दौरान कोर्ट ने कहा था कि
गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी की पहचान स्पष्ट और दिखाई देने वाली होनी चाहिए.
हालांकि, डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य वाला मामला गिरफ्तारी से जुड़ा था. वहीं एक दूसरे मामले में
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के विधायक नल्लापुरेड्डी प्रसन्न कुमार रेड्डी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल उठाया था कि यदि पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में हों तो आम नागरिक उन्हें पुलिस अधिकारी के रूप में कैसे पहचानेंगे?
रेड्डी पर ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारी के काम में बाधा डालने का आरोप था. रेड्डी ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि संबंधित पुलिसकर्मी वर्दी में नहीं था, इसलिए वो उसे पहचान नहीं सके. अब ये दोनों मामले तो गिरफ्तारी और पुलिस की पहचान से जुड़े थे, न कि भीड़ नियंत्रण या लाठीचार्ज के दौरान पहचान छिपाने के सवाल से, इसलिए इन्हें सीधे इस मामले पर लागू नहीं माना जा सकता, लेकिन इसको लेकर कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि पुलिस की पहचान महत्वपूर्ण है.
पुलिस को क्यों पड़ती है पहचान छुपाने की जरूरत
अब सवाल है कि आखिर पुलिस अपनी पहचान क्यों छुपाती है. जिसको लेकर कई पुलिस अधिकारी कहते हैं कि
नेमप्लेट या पहचान सार्वजनिक होने से कई बार उन्हें और उनके परिवार को खतरा हो सकता है. इतना ही नहीं पहचान सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होने पर उन्हें कानूनी मुकदमे, सोशल मीडिया पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो पुलिसकर्मी द्वारा पहचान छिपाने की प्रथा पहले जम्मू-कश्मीर, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे उग्रवाद प्रभावित इलाकों में शुरू हुई थी. वहां पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल अक्सर अपनी नेमप्लेट या रैंक इसलिए नहीं दिखाते थे, ताकि आतंकवादी उन्हें आसानी से निशाना न बना सकें.
मतलब यह साफ है कि भारत में इस तरह का कोई कानून नहीं हैं. वहीं अगर CJP प्रोटेस्ट वाले वायरल वीडियो मामले में दिल्ली पुलिस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. इसलिए यह विवाद पुलिस की जवाबदेही और कानून के पालन को लेकर बहस का विषय बना हुआ है.
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