12 दिसंबर 2026 को भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुआ गंगा जल बंटवारा समझौता 30 साल पूरा कर लेगा. अब इस समझौते को आगे बढ़ाया जाएगा या उसमें बदलाव होगा, इसे लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत अहम होने वाली है.
इसी बीच बिहार से जेडीयू के राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने कहा है कि पुराने समझौते को उसी रूप में आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. उनका कहना है कि पिछले 30 साल में बिहार की आबादी बढ़ी है, पानी की जरूरत बढ़ी है और गंगा की हालत भी काफी बदली है. गाद और बाढ़ जैसी समस्याएं भी बिहार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. ऐसे में नया समझौता तय करते समय बिहार के हितों का भी ध्यान रखना जरूरी है.
यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भारत और बांग्लादेश के बीच समझौता आगे बढ़ेगा या नहीं. सवाल यह भी है कि 1996 के समझौते का बिहार पर क्या असर पड़ा, बिहार इस मुद्दे पर पहले से क्या कहता रहा है और अब संजय झा पुराने समझौते को बदलने की बात क्यों कर रहे हैं?
पहले समझिए क्या है 1996 की गंगा जल संधि?
- भारत और बांग्लादेश ने 12 दिसंबर 1996 को गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर एक समझौता किया था. यह समझौता 30 साल के लिए हुआ था, यानी इसकी अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी हो रही है.
- इस समझौते में पश्चिम बंगाल के फरक्का बैराज से पानी के बंटवारे की व्यवस्था तय की गई. फरक्का बैराज 1975 में शुरू हुआ था. इसका मकसद गंगा से पानी निकालकर भागीरथी-हुगली नदी में पहुंचाना था, ताकि कोलकाता बंदरगाह में पानी का बहाव बना रहे.
- समझौते के मुताबिक हर साल 1 जनवरी से 31 मई के बीच, जब गंगा में पानी कम होता है, तब भारत और बांग्लादेश के बीच पानी बांटा जाता है. हर 10 दिन में उपलब्ध पानी के हिसाब से दोनों देशों का हिस्सा तय होता है.
- अगर फरक्का पर पानी 70 हजार क्यूसेक या उससे कम है, तो दोनों देशों को बराबर-बराबर पानी मिलता है. 70 से 75 हजार क्यूसेक के बीच पानी होने पर बांग्लादेश को 35 हजार क्यूसेक और बाकी भारत को मिलता है. वहीं 75 हजार क्यूसेक से ज्यादा पानी होने पर भारत के लिए 40 हजार क्यूसेक का प्रावधान है और बचा हुआ पानी बांग्लादेश को दिया जाता है.
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गंगा जल संधि को लेकर क्या है बिहार का रुख?
- बिहार इस समझौते का सीधे तौर पर पक्षकार नहीं है, लेकिन गंगा नदी बिहार में लंबी दूरी (लगभग 445 किलोमीटर) तय करती है. इसलिए पानी के बंटवारे का असर उसके हिस्से पर भी पड़ता है.
- संजय झा का कहना है कि खासकर गर्मी के महीनों में फरक्का पर उपलब्ध पानी और बिहार से होकर आने वाले पानी को नए सिरे से देखा जाना चाहिए.
- उनका कहना है कि 1996 में जो परिस्थितियां थीं, आज वे वैसी नहीं हैं. इसलिए बिहार की मौजूदा और भविष्य की पानी की जरूरत को भी नई व्यवस्था में शामिल किया जाना चाहिए.
- झा ने अपने लेख में लिखते हैं कि बक्सर में इन महीनों के दौरान गंगा का प्रवाह करीब 14,000 क्यूसेक रहता है. जिसका मतलब हुआ कि फरक्का तक पहुंचने वाले कम प्रवाह वाले मौसम के पानी का करीब तीन-चौथाई हिस्सा ही बिहार आता है.
- हालांकि इन आंकड़ों को फिलहाल झा के दावे या तर्क के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा. इन्हें अपने आप में अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.
2,000 क्यूसेक और 900 क्यूसेक का मामला क्या है?
- संजय झा ने बिहार की भविष्य की पानी की जरूरत को लेकर करीब 2,000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की मांग का जिक्र किया है. उनका कहना है कि 2050 तक की जरूरत को देखते हुए बिहार ने यह मांग रखी थी.
- उनके मुताबिक, केंद्र की एक समिति की अंतिम रिपोर्ट में पेयजल और उद्योग के लिए करीब 900 क्यूसेक पानी की जरूरत बताई गई, लेकिन इसमें सिंचाई की जरूरत को शामिल नहीं किया गया.
- जानकारी के लिए बता दें कि 900 क्यूसेक को 1996 की संधि के तहत बिहार का मौजूदा पानी का हिस्सा नहीं है, यह बिहार की भविष्य की जरूरत और नई व्यवस्था से जुड़ा प्रस्ताव या आकलन है, जिसका जिक्र झा ने अपनी दलील में किया है.
तो क्या फरक्का बैराज की वजह से बिहार में बाढ़ आती है?
- बिहार में गंगा में गाद जमा होना, नदी की धारा में बदलाव और कटाव जैसी समस्याएं जरूर हैं. गंगा में गाद के प्रबंधन को लेकर सरकार ने अलग-अलग अध्ययन भी कराए हैं.
- माधव चितले समिति ने भी गंगा के नदी प्रबंधन और गाद से जुड़ी समस्याओं पर सुझाव दिए हैं.
- लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बिहार की बाढ़ के लिए सिर्फ फरक्का बैराज को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए.
- बिहार में बाढ़ के पीछे कई कारण होते हैं, नेपाल से आने वाला पानी, भारी बारिश, दूसरी नदियों का जलस्तर, गाद, तटबंध, नदी की प्राकृतिक स्थिति और स्थानीय जल निकासी जैसी कई वजहें इसमें शामिल हैं.
- इसलिए फरक्का और बिहार की बाढ़ के रिश्ते पर बात करते समय राजनीतिक दावे और वैज्ञानिक प्रमाण को अलग-अलग रखना जरूरी है.
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गंगा जल संधि को लेकर क्या चाहता है बिहार?
- संजय झा की मांग को अगर आसान भाषा में समझें तो बिहार चाहता है कि 1996 की संधि को बस उसी तरह आगे न बढ़ाया जाए.
- नई बातचीत में बिहार की पानी की जरूरत, गंगा में गाद, सिंचाई, पेयजल और उद्योग की जरूरतों को भी शामिल किया जाए. साथ ही गंगा बेसिन से जुड़े राज्यों की चिंताओं को भी बातचीत में शामिल किया जाए.
- यानी संजय झा का विरोध सीधे तौर पर बांग्लादेश को पानी देने के खिलाफ नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्था को बिहार की नई जरूरतों का आकलन किए बिना उसी रूप में आगे बढ़ाने के खिलाफ है.
क्या 12 दिसंबर 2026 के बाद बांग्लादेश को पानी मिलना बंद हो जाएगा?
- नहीं, संधि की 30 साल की अवधि खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि भारत बांग्लादेश को पानी देना बंद कर देगा. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि 1996 में तय की गई मौजूदा संधि की अवधि पूरी हो जाएगी.
- इसके बाद दोनों देश नई परिस्थितियों को देखते हुए बातचीत कर नई संधि या नई व्यवस्था पर सहमति बना सकते हैं. भारत सरकार ने फरवरी 2026 में संसद में बताया था कि मौजूदा संधि दिसंबर 2026 में खत्म हो रही है और उस समय तक इसके नवीनीकरण को लेकर दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई थी.
आगे क्या हो सकता है?
- 12 दिसंबर की समय सीमा भारत के लिए 1996 की संधि की समीक्षा का एक अहम मौका है. बिहार चाहता है कि अगर नई व्यवस्था बनती है तो उसकी आवाज भी बातचीत की मेज पर हो.
- दूसरी तरफ भारत के लिए बांग्लादेश के साथ पानी का मुद्दा बेहद अहम है. इसलिए आगे की बातचीत में सिर्फ राजनीतिक दावों की जगह नए जल आंकड़े, वैज्ञानिक अध्ययन, गंगा में गाद की स्थिति और बिहार की भविष्य की पानी की जरूरत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी.
- यानी असली सवाल यह है कि 30 साल पुरानी व्यवस्था को वैसे ही आगे बढ़ाया जाएगा या बदलती परिस्थितियों को देखते हुए भारत-बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे की नई व्यवस्था बनेगी. और अगर नई व्यवस्था बनती है, तो उसमें बिहार की पानी की जरूरतों को कितनी जगह मिलती है.
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