सामाजिक पिरामिड में महिलाएं सबसे नीचे

प्रत्येक भारतीय पुरुष मंदिर की चारदीवारी में महिलाओं को देवी के तौर पर सीमित रखना चाहता है. पौराणिक कथाओं के दायरे से बाहर महिला नेता नहीं, बल्कि अनुयायी बनी हुई हैं.

By प्रभु चावला | October 28, 2020 6:31 AM

प्रभु चावला, एडिटोरियल डायरेक्टर, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

prabhuchawla@newindianexpress.com

“जिस तरह से शक्तिशाली नदी मजबूत चट्टानों और पहाड़ों को तोड़ देती है, उसी तरह बुद्धिमान महिला दुष्टों के छल को ध्वस्त कर देती है. ऐसी बुद्धिमान महिलाओं को हमें नमन करना चाहिए”– ऋग्वेद. ताकत की राह गुणा-गणित की नक्शानवीशी से होकर गुजरती है. प्राचीन भारत में महिलाओं को ऊंचा दर्जा हासिल था. यजुर्वेद कहता है- “हे नारी! तुम पृथ्वी की तरह मजबूत हो और उच्च स्थान पर हो. दुनिया को बुराई और हिंसा के मार्ग से बचाओ.” आज उसे ही सुरक्षित किये जाने की जरूरत है.

आश्चर्य नहीं है कि आज महिलाएं सामाजिक पिरामिड में सबसे निचले स्थान पर हैं. केवल चुनाव प्रचार के दौरान ही महिलाएं देवी बन जाती हैं. इस वर्ष 25 मार्च से 31 मार्च के बीच लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के 1477 मामले दर्ज हुए. बीते 10 वर्षों में इस अवधि के दौरान यह संख्या सर्वाधिक है.

सदियों से, महिलाएं अपशब्द और उपासना दोनों का ही विषय रही हैं. पश्चिम बंगाल सर्वोच्च माता के रूप में काली की पूजा करता है. मान्यताओं में देवियों को ऊंचा स्थान प्राप्त है- सरस्वती ज्ञान और लक्ष्मी धन-समृद्धि प्रदान करती हैं और दुर्गा पापियों को दंड देती हैं. वास्तव में भारतीय महिलाओं के साथ देवदासियों या शूर्पणखा जैसा बर्ताव किया जाता है और चुनावी मंचों से राजनेताओं द्वारा उनके प्रति दिखावटी सहानुभूति प्रदर्शित की जाती है.

कमलनाथ ने अपनी ही सहयोगी को ‘आइटम’ कह दिया है, हालांकि, बाद में उन्होंने खेद व्यक्त किया. इससे पहले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने राजनीतिक विरोधी जया प्रदा के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था. हाल ही में भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने प्रियंका गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें कांग्रेस का ‘चॉकलेटी चेहरा’ कहा था.

वास्तव में, बिजनेस से लेकर राजनीति तक हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उनका उपहास उड़ाना सामान्य सी बात हो गयी है. वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव महिलाओं पर टिप्पणी के कारण कई बार घिर चुके हैं. डीएमके नेता नांजिल संपत ने पुदुचेरी की एलजी किरण बेदी के बारे में कहा कि ‘हम नहीं जानते कि वे पुरुष हैं या महिला.’ महिलाएं एक प्रकार का वोटबैंक बन गयी हैं, जिनसे हर चुनावी लड़ाई में लुभावने वादे किये जाते हैं. महिला मतदाताओं के प्रति दरियादिली दिखाने के लिए सभी नेता आपस में होड़ करते हैं.

जातिगत राजनीति वाले राज्य बिहार में महिला मतदाताओं के लिए खूब वादे किये गये हैं. महिला उद्यमिता के क्षेत्र में बिहार की शायद ही कोई पहचान हो. फिर भी, महिला नवउद्यमियों के लिए 50 प्रतिशत ब्याज मुक्त पांच लाख तक के ऋण की घोषणा की गयी है. शायद ही कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव होता हो, जिसमें महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए विशेष घोषणाएं न होती हों. हिंदू परंपराओं के इतर, महिला सशक्तीकरण की कवायद, मौद्रिक मदद, घर में और बाहर सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान तथा शासन-प्रशासन में नाममात्र की भागीदारी तक ही सीमित होती है.

उन्हें शायद ही कभी नेतृत्व का जिम्मा दिया जाता है. यहां तक कि पंचायती राज जैसे संवैधानिक अधिनियम के बावजूद राजनीतिक पितृसत्ता उनकी भूमिका को प्रभावित करती है. जब महिलाओं ने अधिकारों और भागीदारी की मांग की, तो पुरुषवादी प्रतिष्ठान ने शक्तिहीन संस्थानों जैसे महिला आयोग (केंद्र और राज्य स्तर पर) का गठन कर दिया. उन्हें सभी सुविधाएं और शक्तियां दी गयीं, लेकिन उन पर मंत्रियों का प्रशासनिक नियंत्रण बरकरार रहा. महिलाओं के कल्याण हेतु लगभग सभी राज्यों में अलग से मंत्रालय की व्यवस्था है.

उनके बजट सीमित होते हैं. न तो आयोग और न ही मंत्रालय महिलाओं के मुद्दों का हल निकाल पाते हैं. लड़कियों और महिलाओं की मदद के लिए भारत में कल्याणकारी योजनाएं मेडिकल कॉलेजों से कहीं अधिक हैं. प्रत्येक मुख्यमंत्री और कई केंद्रीय मंत्री लड़कियों के लिए विवाह अनुदान से लेकर विधवा पेंशन तक कई मुफ्त योजनाओं की घोषणा करते हैं. लेकिन, यह केवल दिखावे के लिए ही होती हैं. महिलाओं को सम्मानजनक स्थान केवल धार्मिक समारोहों या विवाह के दौरान ही दिया जाता है, जबकि धर्मग्रंथों के अनुसार, महिलाओं की भागीदारी के बगैर कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता.

बेहतर शिक्षा और कौशल प्राप्त करने के बाद भी उन्हें अहम जिम्मेदारियों से महरूम रखा गया. केंद्र स्तर पर केवल 12 प्रतिशत महिला अधिकारी सचिव स्तर के पदों पर हैं. महिला प्रशासक शायद ही रक्षा, वित्त, गृह, वाणिज्य, कार्मिक और रेल जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की प्रमुख बन पाती हैं. वास्तविक शक्तियों से दूर रखकर महिलाओं को अधिक नुकसान पहुंचाया गया है. उनके खिलाफ अपराधों में निरंतर वृद्धि हुई है. सोशल और डिजिटल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाया जाता है. प्रत्येक सात में से एक ट्वीट महिलाओं के खिलाफ अपशब्दों से भरा होता है, प्रत्येक पांच में से एक ट्वीट लैंगिक भेदभाव से जुड़ा होता है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, रोजाना औसतन 88 बलात्कार होते हैं. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और प बंगाल में बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न महिला सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करता है. साल 2019 में महिलाओं के साथ अपराध के चार लाख मामले दर्ज हुए, इससे पहले 3.75 लाख दर्ज हुए थे. दो दशकों से अधिक समय से लंबित महिला आरक्षण विधेयक लैंगिक भेदभाव नहीं है, तो क्या है? जाति आधारित पार्टियां इसका विरोध करती हैं. लेकिन, राष्ट्रीय पार्टियां चुप क्यों हैं? क्या इसलिए मौका मिलने पर महिलाएं अधिक सफलता प्राप्त करती हैं?

पिछले 70 वर्षों में अब तक केवल एक महिला प्रधानमंत्री बनी हैं और लगभग एक दर्जन ही मुख्यमंत्री बन पायी हैं. प्रत्येक भारतीय पुरुष मंदिर की चारदीवारी में महिलाओं को देवी के तौर पर सीमित रखना चाहता है. पौराणिक कथाओं के दायरे से बाहर महिला नेता नहीं, बल्कि अनुयायी बनी हुई हैं. ऋग्वेद भारतीय नारियों से कहता है कि “आप साम्राज्ञी बन सकती हैं और सभी का नेतृत्व कर सकती हैं.” भारतीय पुरुषों के लिए वह साम्राज्ञी तो है, लेकिन वह केवल किचन और घर की, यहां तक कि इसमें किचन कैबिनेट भी नहीं शामिल है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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