जब बलिया हुआ आजाद

एक दो/ लाल पगड़ी फेंक दो/ एक दो तीन/ लाल पगड़ी छीन/ एक दो तीन चार/ लाल पगड़ी फाड़ डाल... बचपन में अलाव तापते हुए इन नारों को जब पहली बार सुना था, तो मन रोमांच से भर गया था.

एक दो/ लाल पगड़ी फेंक दो/ एक दो तीन/ लाल पगड़ी छीन/ एक दो तीन चार/ लाल पगड़ी फाड़ डाल… बचपन में अलाव तापते हुए इन नारों को जब पहली बार सुना था, तो मन रोमांच से भर गया था. ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के पारित होने के बाद बलिया में आजादी की जो चिंगारी जगी, उसने देश के इतिहास में एक नया तराना लिख दिया. लाल पगड़ी तब अंग्रेज सरकार के पुलिस के सिपाहियों की पहचान हुआ करती थी. यह नारा भी तब यूं ही नहीं गढ़ा गया था. नौ अगस्त, 1942 को मुंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चोटी के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जो दावानल भारतीय दिलों में उबल पड़ा था, उसकी तपिश बलिया तक अगले ही दिन पहुंच गयी थी.

सुराजी लोगों ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया, लेकिन यह आंदोलन निर्णायक तब हुआ, जब 18 अगस्त को बलिया के पूर्वी छोर पर स्थित बैरिया थाने पर पास के बाबा लक्ष्मण दास हाइस्कूल और मिडिल स्कूल के छात्रों ने तिरंगा फहराने की सोची. नारायण गढ़ निवासी कौशल कुमार सिंह की अगुआई में छात्रों का दल तिरंगा फहराने चला, तो पहले थानेदार ने अनुमति दे दी, लेकिन उसके मन में अंग्रेजी दासता का कीड़ा छुपा हुआ था और उसने छात्रों पर गोलियां बरसा दीं. इस घटना में कौशल कुमार सिंह और पदुमदेव पांडे समेत 19 छात्र शहीद हुए.

अपने नौनिहालों की इस नृशंस हत्या से पूरा इलाका विचलित हो उठा. लोग थाने की तरफ बढ़ चले. उन्मादी भीड़ देख बैरिया थाने के पुलिस कर्मियों के हाथ-पांव फूल गये और वे भाग खड़े हुए. भीड़ ने रास्ते में पड़ने वाले थानों पर भी हमला किया और वहां तिरंगा फहरा दिया. देखते ही देखते यह क्रांति इतनी तेज हो गयी कि पूरे जिले से अंग्रेज अफसरों को भागना पड़ा. बलिया में नौ अगस्त, 1942 को ही राधा मोहन सिंह, परमात्मा नंद सिंह और रामनरेश सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया था. चित्तू पांडेय, राजेश्वर तिवारी, शिवपूजन सिंह, महानंद मिश्र, विश्वनाथ चौबे, ठाकुर जगन्नाथ सिंह, तारकेश्वर पांडेय, युसूफ कुरैशी भी हिरासत में थे. छात्र नेता तारकेश्वर पांडेय के नेतृत्व में पूरे बलिया में इन गिरफ्तारियों के खिलाफ प्रदर्शन हुआ और हड़ताल रखी गयी.

शहर में विश्वनाथ मर्दाना के नेतृत्व में हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने जुलूस निकाला. सभा को संबोधित करने वाले रामअनंत पांडेय को गिरफ्तार कर लिया गया. बिल्थरारोड में पारसनाथ मिश्र के नेतृत्व में उग्र प्रदर्शन हुए. आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. जानकी देवी, कल्याणी देवी और पार्वती देवी के नाम अविस्मरणीय हैं. जनपद के विभिन्न स्थानों पर जनता के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था. इस बीच इलाहाबाद विश्वविद्यालय से छात्रों की एक टोली रेल से चली और रास्ते में पड़ने वाले थानों को लूटती गयी. डाकखानों को भी लूटा गया. जगह-जगह रेल लाइनें उखाड़ दी गयीं.

बलिया जनपद के क्रांतिकारी संघर्ष के लिए 19 अगस्त, 1942 का दिन निर्णायक दिन था. कई स्थानों पर कब्जा हो जाने से क्रांतिकारियों के हौसले बुलंद थे. दस हजार से अधिक की भीड़ ने बलिया जेल को घेर लिया, जिसके दबाव में तब के कलेक्टर जे निगम को सभी बंदियों को रिहा करने पर बाध्य होना पड़ा. बलिया में प्रजातांत्रिक स्वराज सरकार की स्थापना हुई और चित्तू पांडेय बलिया के प्रथम कलेक्टर नियुक्त हुए, लेकिन बलिया की यह आजादी महज छह दिनों तक ही कायम रह पायी. इसके बाद बलिया में बक्सर से गंगा के रास्ते क्रूर अंग्रेज अधिकारी नेदरसोल की अगुआई में अंग्रेजी फौज ने पश्चिम-दक्षिण की सीमा से प्रवेश किया.

फिर बलिया में अंग्रेजी हुकूमत का नंगा नाच शुरू हो गया. गांवों पर जुर्माने लगाये गये. शहर में जो भी जहां दिखा, उसे पीटा गया. बैरिया आंदोलन के कई लोग फरार हो गये. रेलवे लाइन के किनारे के गांवों पर अंग्रेज अफसरों ने जुर्माना लगाया. मेरी दादी बताती थीं कि अंग्रेजों के डर से हफ्तों तक मकई के खेतों के बीच पूरे परिवार को, जिसमें महिलाएं भी थीं, छुप कर रहना पड़ा. इस दौरान पुलिस और अंग्रेज सैनिकों को लोगों के घरों में जो कुछ भी मिला, उठा ले गये. बलिया पर अंग्रेजी हुकूमत का कब्जा इतना अहम था कि तब बीबीसी पर उसे खबर प्रसारित करनी पड़ी- बलिया हैज बीन रिकांकर्ड यानी बलिया पर फिर से कब्जा हो गया.

बलिया ने आजादी हासिल करके स्वर्णिम इतिहास तो रच दिया, पर उसकी कीमत पूरे जिले को दमन, सरकारी लूट और अत्याचार के तौर पर चुकानी पड़ी. यह बात और है कि 1944 में लोगों के दर्द पर राहत का मरहम लगाने फिरोज गांधी बलिया पधारे. उन्होंने महीनों तक तांगे पर घूम-घूम कर लोगों का सहयोग किया और उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों के लिए बंदोबस्त किया. इसीलिए बलिया की खत्म होती पीढ़ी आज भी फिरोज गांधी को याद करती है. मंगल पांडे और चित्तू पांडे जैसे क्रांतिकारियों की भूमि रही बलिया ने इतिहास भले ही रचा, मगर आज की तारीख में बलिया विकास की कसौटी पर पीछे ही है. यह बात दीगर है कि चंद्रशेखर जैसी राजनीतिक हस्ती ने सात बार बलिया की संसद में नुमाइंदगी की और प्रधानमंत्री बने. इसने बलिया को बड़ी राजनीतिक पहचान दी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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