इस इस्तीफे से क्या कुछ बदलेगा, पढ़ें प्रभु चावला का आलेख

Dharmendra Pradhan Resignation: एक इस्तीफा 12 वर्षों के चुनावी प्रभुत्व को समाप्त नहीं कर सकता, और अधिकांश मानकों के अनुसार मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा का संगठनात्मक ढांचा अब भी काफी मजबूत है, पर शायद ही कभी सड़क का दबाव, संसद का दबाव और नागरिक समाज का दबाव किसी एक भाजपा मंत्री के खिलाफ इतनी मजबूती से एक साथ दिखाई दिया हो. कांग्रेस अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को राजनीतिक मॉडल के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी, पर क्या यह वोटों में बदलेगा? अब असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी, जहां

Dharmendra Pradhan Resignation: राजनीतिक आंदोलनों ने कई बार सरकारों की दिशा बदल दी है. कुछ आंदोलनों ने सरकारें गिरा दीं, कुछ ने नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर किया और कुछ ने जनाक्रोश को शांत करने के लिए शक्तिशाली सरकारों से मंत्रियों की कुर्बानी तक ले ली. पिछले सप्ताह नयी दिल्ली में ऐसा ही हुआ. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है. पिछले 12 वर्षों में यह पहली बार है कि लगातार चले जनांदोलन और विपक्ष के निरंतर दबाव के कारण नरेंद्र मोदी सरकार के किसी कैबिनेट मंत्री को पद छोड़ना पड़ा.

सोनिया और राहुल गांधी ने इस इस्तीफे को 'भारत के युवाओं की जीत' बताया. भाजपा ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि सरकार ने छात्रों के व्यापक हित में कदम उठाया है. क्या यह इस्तीफा केवल एक अलग-थलग रियायत है या इसने मोदी के राजनीतिक रूप से अजेय बने रहने की छवि कमजोर कर दी है, जिसे मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में सावधानीपूर्वक बनाया था या इसने राहुल गांधी के नेतृत्व वाले निराश विपक्ष में नयी जान फूंक दी है?

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा व्यक्ति से अधिक उस मिसाल के कारण महत्वपूर्ण है, जो इसने कायम की है. नरेंद्र मोदी के पूरे राजनीतिक कार्यकाल में पहली बार किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा जनदबाव के कारण हुआ. यह एक असाधारण गठजोड़ का परिणाम था. राहुल गांधी और कांग्रेस ने धरनों तथा संसद में विरोध का नेतृत्व किया. समाजवादी पार्टी से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक क्षेत्रीय सहयोगी साथ आये. सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक भूख हड़ताल जारी रखी. वहीं कॉकरोच जनता पार्टी नामक एक युवा आंदोलन ने उन छात्रों को भी संगठित किया, जो पहले कभी दलगत राजनीति में सक्रिय नहीं रहे थे.

शायद ही कभी सड़क का दबाव, संसद का दबाव और नागरिक समाज का दबाव किसी एक भाजपा मंत्री के खिलाफ इतनी मजबूती से एक साथ दिखाई दिया हो. भाजपा के लिए इसमें एक तीखा विडंबनापूर्ण पहलू भी है. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में यूपीए के दस वर्षों के दौरान लगभग आधा दर्जन मंत्रियों को इसी तरह के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा था. भाजपा ने वर्षों तक उसे यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का प्रमाण बताकर आलोचना की. अब एनडीए सरकार ने भी उसी प्रकार के दबाव में अपने एक मंत्री को पद छोड़ने दिया, जिसके प्रति वह स्वयं को कभी अजेय बताती थी.

फिर भी क्या इससे वास्तव में विपक्ष मजबूत होगा या यह इस बात का प्रमाण है कि मोदी सरकार अब भी व्यापक राजनीतिक कथा पर अपना नियंत्रण बनाए हुए है? एक इस्तीफा 12 वर्षों के चुनावी प्रभुत्व को समाप्त नहीं कर सकता. सरकार का अपना पक्ष भी यही है कि धर्मेंद्र प्रधान ने 'छात्रों के व्यापक हित में' इस्तीफा दिया, न कि किसी दोष को स्वीकार करते हुए. सीबीआइ जांच, परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा कराने को अंततः सरकार की निर्णायक कार्रवाई के रूप में भी देखा जा सकता है, न कि दबाव के आगे झुकने के रूप में.

आलोचकों का कहना है कि भाजपा इससे कहीं बड़े विवादों का सामना बिना झुके कर चुकी है. ऐसे में एक अकेला इस्तीफा, चाहे वह कितना भी प्रतीकात्मक क्यों न हो, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के पुनरुत्थान का आधार बनने के लिए पर्याप्त नहीं है. अधिकांश मानकों के अनुसार मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा का संगठनात्मक ढांचा अब भी काफी मजबूत है.

फिर भी राजनीतिक विश्लेषक इस क्षण को केवल प्रतीकात्मक नहीं मान रहे हैं. राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन में यह पहली ठोस उपलब्धि मानी जा रही है, जिसे अब तक परिणामों की अपेक्षा नारों से अधिक जोड़ा जाता रहा है. कांग्रेस रणनीतिकारों के लिए संदेश स्पष्ट है कि जब जन असंतोष ऐसे मुद्दे से जुड़ता है, जो सीधे मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को प्रभावित करता हो, जैसे धांधली वाली परीक्षा या छिना हुआ भविष्य, तब वह प्रभावी राजनीतिक दबाव बना सकता है. अब सवाल यह है कि क्या यही रणनीति आने वाले विधानसभा चुनावों में भी काम करेगी? अब असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव पहले ही इन प्रदर्शनों में राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के साथ दिखाई दे चुके हैं.

कांग्रेस अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को एक राजनीतिक मॉडल के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी, लेकिन क्या यह वोटों में बदलेगा, यह बिल्कुल अलग प्रश्न है. उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने एकल मुद्दों की तुलना में आधारभूत संरचना, कल्याणकारी योजनाओं और योगी आदित्यनाथ की कानून-व्यवस्था की छवि को अधिक महत्व दिया है. वर्ष 2019-20 के नागरिकता आंदोलन और कृषि कानूनों के विरोध जैसे आंदोलनों ने सड़क पर भारी ऊर्जा तो पैदा की, लेकिन चुनावों में भाजपा को सत्ता से नहीं हटा सके.

इतिहास बताता है कि दोनों व्याख्याएं एक साथ सही हो सकती हैं. वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन बिहार और गुजरात के अपेक्षाकृत सीमित मुद्दों से शुरू हुआ, लेकिन आगे चलकर वह इंदिरा गांधी विरोधी राष्ट्रीय लहर में बदल गया, जिसने 1977 में उनकी हार का रास्ता तैयार किया. वर्ष 2011-12 का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन भी मंत्रियों के इस्तीफों का कारण बना और उसने यूपीए की नैतिक साख कमजोर की.

हालांकि उसका प्रत्यक्ष चुनावी लाभ आम आदमी पार्टी को मिला. राष्ट्रीय स्तर पर अंततः भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी बनी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उम्मीद है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी ऐसी ही किसी राजनीतिक शृंखला की शुरुआत बन सकता है. हालांकि यह भी संभव है कि यह केवल एक सीमित रियायत साबित हो, जिसे मोदी सरकार अगले चुनावी चक्र से पहले प्रभावी ढंग से निष्प्रभावी कर दे.

राजनीतिक सत्ता का क्षरण तब शुरू नहीं होता, जब कोई मंत्री इस्तीफा देता है, बल्कि तब होता है, जब नागरिकों को यह अहसास होने लगता है कि सबसे शक्तिशाली सरकार को भी जनदबाव के सामने जवाब देना पड़ सकता है. राहुल गांधी और उनके सहयोगी इस कठिनाई से हासिल हुई एकमात्र जीत को, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, स्थायी राजनीतिक पूंजी में बदल पाते हैं या नहीं, यही तय करेगा कि 25 जुलाई, 2026 को उस दिन के रूप में याद किया जायेगा, जब विपक्ष को आखिरकार अपनी जमीन मिली या फिर भाजपा के लंबे प्रभुत्व के बीच यह केवल एक दुर्लभ और सीमित अपवाद बनकर रह जायेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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लेखक के बारे में

By प्रभु चावला

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
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