प्रेमचंद को बीसवीं शताब्दी के आरंभिक हिस्से का सबसे महान हिंदी-उर्दू लेखक माना जाता है. उनकी मृत्यु के आठ वर्ष बाद शिवरानी देवी ने 'प्रेमचंद घर में' नामक एक पुस्तक लिखी, जिसे प्रसिद्ध इतिहासकार ज्ञानेंद्र पाण्डे ने अनोखी और दिल बहलाने वाली पुस्तक कही थी. उनके अनुसार, इसमें पति की हार्दिक प्रशंसा है, पर साथ में खिलवाड़, कसौटी और कई सवाल भी हैं. शादी के समय शिवरानी 17 वर्ष की थीं, प्रेमचंद 25 के. प्रेमचंद 1935 में अंग्रेजी में लिखे एक पत्र में अपनी शादी के बारे में दर्ज करते हैं कि 'मेरी पहली पत्नी 1904 में गुजर गयी. जरा भी आकर्षक नहीं थी, और हालांकि मैं उससे संतुष्ट नहीं था, मैं शिकायत न करके काम चलाता रहा जैसे पुराने पति करते हैं. जब वह गुजर गयी, तब मैंने एक बाल विधवा से शादी की, और उसके साथ काफी खुश हूं.'
जबकि इस पुस्तक के पृष्ठ 39 पर बस्ती, 1914 की किसी तारीख को दर्ज एक इंदराज में शिवरानी देवी खुलासा करती हैं कि उनकी शादी के समय प्रेमचंद की पत्नी जीवित थीं. शिवरानी देवी प्रेमचंद से अनुरोध करती हैं कि वह अपनी पहली पत्नी को मायके से लिवा लायें, पर वह ऐसा नहीं कर पाये, या यह कहें कि उन्होंने करना नहीं चाहा. तब शिवरानी देवी ने प्रेमचंद की पहली पत्नी को 'प्रिय बहन' संबोधित कर पत्र लिखा और आने को कहा, तो उनका उत्तर आया कि जब वह (प्रेमचंद) स्वयं लेने आयेंगे, तो मैं चलूंगी. प्रेमचंद भले लाने को तैयार नहीं हुए हों, पर शिवरानी देवी को पत्र लिखने से रोका भी नहीं. यहां तक कि शिवरानी के नाम 'कैथी' में लिख कर आये पहली पत्नी के पत्र को पढ़ने का दायित्व भी जीवनभर उठाते रहे. शिवरानी देवी लिखती हैं कि समय के साथ दोनों में गजब की आत्मीयता और अपनापन स्थापित हो गया.
एक प्रसंग है, महोबा में प्रेमचंद डिप्टी के पद पर थे और उनका एक रुतबा था. उन्हें मेले देखने का बेहद शौक था. शिवरानी देवी के साथ मेले में सर्कस देखने पहुंचे, लेकिन शिवरानी देवी दो ढाई घंटे में घबराकर लौट आयीं. जबकि प्रेमचंद देर रात डेढ़ बजे लौटे. और पत्नी के इच्छानुसार दूसरे दिन सपरिवार घर लौट आये. प्रेमचंद मेला जाने के शौकीन थे, जबकि शिवरानी देवी को एकांत और जंगल घूमना पसंद था. वह जंगल जाने को कहतीं, तो प्रेमचंद सहर्ष तैयार भी हो जाते. वह लिखती हैं कि हम दोनों जंगल की शुरुआत में ही गाड़ी छोड़कर भीतर चले जाते. दिनभर वहीं झाड़ियों में पानी पीते, फल खाते, समय व्यतीत करते. पहाड़ों पर चढ़कर पहाड़ की भी सैर करते.
प्रेमचंद तब लिख रहे थे जब पूरा हिंदुस्तान सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था. पोती सारा राय प्रेमचंद और शिवरानी देवी के साथ अपने संबंधों से निरपेक्षता बरतते हुए कहती हैं कि प्रेमचंद और उनके साथ शिवरानी देवी का जीवन अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि वे बीसवीं शताब्दी में घट रहे सामाजिक सुधारों के अभिन्न अंग थे. बाल-विधवा पुनर्विवाह और समाज में स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने- प्रेमचंद का शिवरानी के प्रति प्रेमपूर्वक, संवेदनशील बर्ताव, जिसकी वजह से उनके बीच और समाज के साथ उनका एक सम्मानपूर्वक संबंध बन सका- के साथ अन्य सामाजिक सुधारों को वह व्यक्तिगत रूप से जी कर मशाल का काम कर रहे थे. एक प्रसंग में प्रबोध कुमार अपनी नानी अम्मा (शिवरानी देवी) के बारे में लिखते हैं कि महात्मा गांधी की मृत्यु पर बनारस में शोक सभा हुई थी.
शिवरानी देवी के साथ मैं भी वहां गया था और उन्हीं के साथ मंच पर बैठा था. मंच पर उस समय के जो बड़े नेता बैठे थे, उनमें से एक कमलापति त्रिपाठी भी थे. किसी नेता का भाषण चल रहा था और श्री त्रिपाठी पान चबाते-चबाते अपने आसपास बैठे नेताओं से हंस-हंसकर बातें कर रहे थे. शिवरानी देवी से यह बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्होंने श्री त्रिपाठी को डांट लगायी और पान थूक कर आने को कहा. श्री त्रिपाठी को शायद अपनी गलती समझ में आ गयी, क्योंकि वह फौरन मुंह साफ करने मंच से नीचे उतर गये थे. प्रख्यात लेखिका सारा राय लिखती हैं, 'प्रेमचंद घर में' को एक नारीवादी दस्तावेज कहें, तो गलत नहीं होगा.
शिवरानी देवी का अपने पति के लिए एक प्रकार का आदर भाव छाया हुआ है, फिर भी वह किसी मायने में, तर्क या विचारों में, अपने पति से दबी हुई या कमतर नहीं मालूम देतीं. इंद्रनाथ मदान की पुस्तक 'प्रेमचंद : एन इंटरप्रेटेशन' में प्रेमचंद अंग्रेजी में लिखे पत्र में शिवरानी देवी का जिक्र यूं करते हैं- मेरे वैवाहिक जीवन में रोमांचक भाव कुछ नहीं है. शिवरानी देवी के साथ काफी खुश हूं. उसे भी साहित्य में कुछ रुचि हो गयी है, और वह कभी-कदा कहानियां लिखती है. वह एक निडर, हिम्मती, दृढ़निश्चय वाली, निष्कपट महिला है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
