भूजल पर निर्भरता कम करने का समय आ गया है

भारत का भूजल तेजी से एक अदृश्य ज़हर बन रहा है, जिसमें आर्सेनिक, फ्लोराइड और कीटनाशक पाए जा रहे हैं. स्थिति गंभीर है और हमें भूजल पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी. इसके लिए वर्षा जल संचयन और जैविक खेती जैसे बदलाव आवश्यक हैं.

केंद्रीय भूजल बोर्ड की हालिया रिपोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण की चिंताएं इस कड़वी हकीकत की तस्दीक करती हैं कि भारत के पाताल में अब जीवनदायिनी अमृत नहीं, बल्कि एक खामोश और अदृश्य जहर तेजी से फैल रहा है. देशभर से लिये गये भूजल के नमूनों में से करीब 28 प्रतिशत का भारतीय मानक ब्यूरो के सुरक्षित मानकों से बाहर होना कोई मामूली चेतावनी नहीं है. उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण के पठारी राज्यों तक के भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट और यूरेनियम जैसी भारी धातुओं के साथ-साथ जानलेवा कीटनाशकों की मौजूदगी पायी गयी है.

चिंताजनक पहलू यह है कि सतह पर बहने वाली नदियों या तालाबों को साफ करना फिर भी मुमकिन है, लेकिन भूगर्भीय जलभृतों (एक्विफर्स) की परतों में रिस चुके इस रासायनिक जहर का आधुनिक विज्ञान के पास भी कोई व्यावहारिक इलाज नहीं है. यह संकट नीति-नियंताओं और समाज से एक बुनियादी नीतिगत बदलाव की मांग करता है कि हम पेयजल के लिए भूजल पर अपनी आत्मघाती निर्भरता को न्यूनतम करें और कृषि में रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर तुरंत लगाम लगाएं. इस संकट की परतें जितनी प्राकृतिक हैं, उससे कहीं अधिक मानव निर्मित हैं. भू-वैज्ञानिक अध्ययनों से साफ है कि आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे तत्व जमीन के भीतर मौजूद जरूर थे, पर इंसानी लालच ने जब बोरवेल के जरिये पाताल को पूरी तरह निचोड़ना शुरू किया, तो पानी का स्तर अत्यधिक नीचे गिरने से ये भारी धातुएं हवा और पानी के संपर्क में आकर घुलने लगीं. इसके समानांतर, देश के 56 प्रतिशत से अधिक जिलों में नाइट्रेट की भयावह मौजूदगी के पीछे हमारी त्रुटिपूर्ण कृषि नीतियां और रासायनिक उर्वरकों का बेलगाम इस्तेमाल जिम्मेदार है.

खेतों में पैदावार बढ़ाने की आपाधापी में हर वर्ष जो लाखों टन कीटनाशक और यूरिया-डीएपी धरती पर बिखेरे जा रहे हैं, वे हर बारिश के साथ रिसकर सीधे भूजल का हिस्सा बन रहे हैं. औद्योगिक इकाइयों द्वारा बिना उपचार के दूषित रसायनों को जमीन में इंजेक्ट करने की आपराधिक प्रवृत्तियों ने इस आग में घी का काम किया है. सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर अक्सर यह मुगालता पाला जाता है कि घरेलू स्तर पर लगी आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) प्रणालियां या वाटर प्यूरीफायर हमें इस संकट से बचा लेंगे. यह धारणा न केवल अधूरी है, बल्कि पर्यावरण के दृष्टिकोण से बेहद आत्मघाती भी है. ये तकनीकें बहुत सीमित दायरे में पानी को साफ तो करती हैं, पर इसके एवज में पानी के भीतर मौजूद आवश्यक प्राकृतिक खनिजों को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं. इसके अतिरिक्त, एक लीटर शुद्ध पानी के लिए तीन लीटर पानी की बर्बादी करने वाली यह तकनीक जल संकट को और गहरा ही करती है. व्यापक भूगर्भीय स्तर पर किसी समूचे जिले या विकासखंड के दूषित भूजल को रसायन मुक्त करने की कोई भी री-चार्जिंग या फिल्टर तकनीक दुनिया में उपलब्ध नहीं है. जो जहर एक बार पाताल की गहराइयों में पैठ बना चुका है, वह वहां दशकों तक समाज की नस्लों को बीमार करने के लिए मौजूद रहेगा.

इस विकट परिस्थिति से निपटने के लिए पहली और अपरिहार्य शर्त यह है कि हमें पेयजल के मोर्चे पर भूजल से अपनी निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना होगा. मॉनसून के दौरान होने वाली प्रचुर वर्षा का एक बड़ा हिस्सा आज उचित प्रबंधन के अभाव में बहकर समुद्र में व्यर्थ चला जाता है या विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लेता है. यदि हम स्थानीय स्तर पर जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार करें, शहरी और ग्रामीण नियोजन में 'रेन वाटर हार्वेस्टिंग' को एक अनिवार्य कानूनी दायित्व बनाएं, तो सतही जल को शुद्ध कर पाइपलाइन के जरिये सुरक्षित पेयजल पहुंचाना बेहद आसान हो जायेगा. इसके साथ ही, देश की कृषि नीति और फसल चक्र में आमूलचूल बदलाव किये बिना इस संकट की रीढ़ को नहीं तोड़ा जा सकता. आज कीटनाशकों और रसायनों का इस्तेमाल फसलों की जरूरत के बजाय रासायनिक कंपनियों के विपणन जाल के चलते एक अंधी दौड़ बन चुका है. यह रासायनिक चक्र मिट्टी की प्राकृतिक जीवन शक्ति को मार रहा है, जिससे किसानों की रसायनों पर निर्भरता हर वर्ष बढ़ती जाती है. इस दुश्चक्र को तोड़ने का समय आ गया है. हमें उन क्षेत्रों में, जहां भूजल का स्तर पाताल छू रहा है, या पानी जहरीला हो चुका है, धान और गन्ने जैसी अत्यधिक पानी सोखने वाली फसलों के बजाय मोटे अनाज (श्रीअन्न), दलहन और तिलहन की खेती को नीतिगत प्रोत्साहन देना होगा.

प्राकृतिक और जैविक कृषि को केवल एक वैकल्पिक विमर्श न मानकर राष्ट्रीय कृषि रणनीति का मुख्य हिस्सा बनाना होगा, ताकि मिट्टी के जरिये रसायनों का पाताल में रिसना बंद हो सके. यह संकट केवल सरकारी बजट, तकनीकी घोषणाओं या प्रशासनिक आदेशों के जरिये हल नहीं हो सकता. जल सुरक्षा को राष्ट्र की संप्रभुता और नागरिक अधिकारों से जोड़कर देखना होगा. उद्योगों द्वारा किये जा रहे प्रदूषण पर जहां कठोरतम कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की दरकार है, वहीं आम नागरिक को समझना होगा कि जमीन के नीचे का पानी किसी की निजी बपौती नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है. यदि हम आज भी अपनी इस साझा राष्ट्रीय धरोहर को लेकर सचेत नहीं हुए, तो आने वाला समय केवल पानी की किल्लत का नहीं, जहरीले पानी से उपजी महामारियों और बंजर होती मानवीय नस्लों का होगा. भूजल को जहरीला होने से बचाना अब हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व को बचाये रखने की न्यूनतम शर्त है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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