भविष्य के बाजार में अतीत की यादों का सहारा

डिजिटल युग में, ब्रांड्स 'नॉस्टैल्जिया मार्केटिंग' का सहारा ले रहे हैं. यह ग्राहकों की भावनात्मक यादों से जुड़कर उन्हें आकर्षित करने की एक अनोखी रणनीति है. जानें कैसे ये पुराने अनुभव नए ब्रांड्स के लिए सफलता की सीढ़ी बन रहे हैं.

-प्रो तमाल सामंत-

भारतीय बाजार आज डिजिटलीकरण के साथ वैश्विक रूप से बदलने की राह पर है. इस रफ्तार ने उत्पादों की खरीद-बिक्री के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है, चाहे वह 10 मिनट में होने वाली 'क्विक कॉमर्स' डिलीवरी हो या एआइ के सुझाव पर होने वाली खरीदारी. तकनीक आज ग्राहकों के निर्णय लेने की क्षमता को बदलने वाली सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है. इस अत्याधुनिक और सुविधाजनक दौर के पीछे एक ऐसी रणनीति छिपी है, जो विरोधाभासी तो लगती है, पर ब्रांड्स उसका मजबूती से इस्तेमाल कर रहे हैं.

इसे 'नॉस्टैल्जिया मार्केटिंग' का नाम मिला है. इसके जरिये ब्रांड्स लोगों की भावनात्मक यादों और सामाजिक जुड़ाव का इस्तेमाल कर ग्राहकों का ध्यान खींच रहे हैं. यह पूरी तरह ग्राहकों के व्यवहार और मनोविज्ञान पर आधारित है. विपणन की भाषा में इसे बचपन की यादों को जगाना कहते हैं. विज्ञापन का यह तरीका मनुष्य के लिए एक भावनात्मक ढाल का काम करता है, जो ग्राहक की तार्किक शंकाओं को दरकिनार कर देता है. जब ब्रांड्स किसी व्यक्ति के निजी इतिहास या पुरानी यादों से भावनात्मक जुड़ाव बनाते हैं, तो ग्राहक उस उत्पाद को सिर्फ एक सामान की तरह नहीं देखता, बल्कि उसे अपने दिल से जुड़ा महसूस करता है.

यह जुड़ाव ग्राहकों के बीच कीमत को लेकर होने वाली हिचकिचाहट को कम करता है, और कई बार ब्रांड्स इस भावना की बदौलत थोड़ी ज्यादा कीमत भी वसूल कर लेते हैं. भारतीय बाजार में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ब्रांड्स ने पुरानी यादों को एक मुनाफे वाले बिजनेस मॉडल में बदला है. इसका बेहतरीन उदाहरण है 'पेपर बोट.' इस ब्रांड ने एक ऐसे बाजार में कदम रखा, जहां कोका-कोला व पेप्सी का दबदबा था. पर पेपर बोट ने एक अलग रास्ता चुना. इस ब्रांड ने एनर्जी बढ़ाने या प्यास बुझाने जैसे पारंपरिक दावों को छोड़कर, अपने उत्पाद को बचपन के देसी स्वाद जैसे आम पन्ना, आमरस और जलजीरा से जोड़ दिया.

इससे पेपर बोट लाखों भारतीयों तक पहुंचने में सफल हुआ. कई बार ब्रांड्स ने अतीत की यादों को संकट से उबरने के लिए भी इस्तेमाल किया है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है नेस्ले का मैगी. वर्ष 2015 में, सरकारी खाद्य सुरक्षा नियामकों ने मैगी में सीसा और अघोषित मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) की असुरक्षित मात्रा पायी थी, जिससे ब्रांड एक बड़े संकट में फंस गया और उस पर प्रतिबंध लग गया. पर जब ब्रांड ने वापसी की, तो उसने किसी लैब रिपोर्ट, क्लीनिकल टेस्ट या वैज्ञानिक पोषक तत्वों की सफाई का सहारा नहीं लिया. इसके बजाय उसने भावनात्मक कैंपेन शुरू किया, जिसका थीम रखा-'वी मिस्ड यू टू.' इस कैंपेन ने लोगों को मैगी के साथ उनकी पुरानी यादों का अहसास कराया.

परिणामस्वरूप, बहुत कम समय में मैगी फिर से मार्केट शेयर पर अपनी धाक जमाने में सफल हुआ. वर्तमान में, मार्केटिंग से जुड़े पेशेवर 'नॉस्टैल्जिया मार्केटिंग' को प्रचार का प्रभावी साधन मानते हैं, क्योंकि लोग आज भी पुराने तौर-तरीकों पर विश्वास करते हैं. उदाहरण के लिए, मिलेनियल्स स्मार्टफोन के आने से पहले के एनालॉग व्यवस्था को समझते हैं, उनके बीच बचपन में इस्तेमाल किये गये उन उपकरणों की याद आज भी ताजा है. यही कारण है कि रेट्रो विज्ञापन उन्हें अपनी डिजिटल थकान और कॉरपोरेट तनाव से राहत देता है. इसके ठीक विपरीत, जेन-जी युवाओं में अतीत के प्रति एक गहरा खिंचाव दिखता है, जिसे उन्होंने स्वयं कभी नहीं जिया, न अनुभव किया. यही कारण है कि एक बार फिर एनालॉग तकनीक और विंटेज टाइपोग्राफी जैसी सामग्रियों की वापसी हो रही है.

बहरहाल, नये ब्रांड्स को इस बात को लेकर काफी सतर्क रहने की जरूरत है कि वे लक्षित उपभोक्ताओं के भावनात्मक जुड़ाव को सस्ते मार्केटिंग हथकंडे के रूप में इस्तेमाल न करें. इस मामले में पेपर बोट और मैगी जैसे ब्रांड्स ने खुद को अलग साबित किया. इन ब्रांड्स ने उपभोक्ताओं की यादों को जगाया, साथ ही बेहतरीन प्रोडक्ट क्वालिटी देकर उनका भरोसा भी जीता. नॉस्टैल्जिया मार्केटिंग तभी प्रभावी होगी जब अतीत में मिले सुकून को वर्तमान समय की उपयोगिता और गुणवत्ता के साथ सहेजा और जोड़ा जाये.

स्थानीय संगठन, स्वदेशी उद्यमी और लघु उद्योग तेजी से इस जियो-फिजिकल नॉस्टैल्जिया का लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं. इसमें पारंपरिक कला, भूली-बिसरी क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय लोक कथाओं का इस्तेमाल कर ब्रांड्स स्थानीय विरासत के संरक्षक के रूप में भी अपनी एक खास पहचान बना रहे हैं. यह प्रयास स्थानीय व्यवसायों को वैश्विक मंच पर फलने-फूलने में मदद कर रहा है. बिहार और झारखंड जैसे राज्य इसे हेरिटेज टूरिज्म, पारंपरिक हथकरघा और शिल्पकृतियों व क्षेत्रीय व्यंजनों पर आधारित उत्पादों और सेवाओं से जोड़ रहे हैं, जो उनकी ग्रामीण सशक्तीकरण की रीढ़ बन रहा है. जैसे-जैसे बाजार में एआइ व एल्गोरिदम आधारित विज्ञापन बढ़ रहे हैं, लोगों में इसके प्रति वास्तविक तथा आत्मीय मानवीय जुड़ाव की चाहत और तीव्र होती जा रही है. ऐसे में, अब ब्रांड अपने प्रचार के तरीकों के लिए अतीत की ओर लौटने को पिछड़ापन नहीं समझ रहे. बल्कि, व्यापार के लिए यह आज के समय की सबसे परिष्कृत और भविष्योन्मुखी आर्थिक रणनीतियों में से एक बन चुकी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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