विश्वसनीयता खो रहा है टेलीविजन

नये दौर की पत्रकारिता में मीडिया की ताकत विश्वसनीयता के बजाय उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार पर निर्भर है. विवादास्पद कंटेंट सबसे तेज बिकनेवाला न्यूज प्रोडक्ट है.

By प्रभु चावला | September 8, 2020 2:27 AM

प्रभु चावला, एडिटोरियल डायरेक्टर, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

prabhuchawla@newindianexpress.com

भारतीय मीडिया एक गलतफहमी है और यह मीडिया के माध्यम से ही है. यह उन्माद उगल रहा है, जो लोगों को जोड़ता नहीं, बल्कि विभाजित कर रहा है. सूचना देने के बजाय सूचना प्रणाली को ही विरूपित कर रहा है.समाचारों को कम करने और अपने फायदे पर ज्यादा ध्यान देने के साथ भारतीय मीडिया समाचार और सामग्री दोनों का निर्माता बन गया है. इसने सत्य और विश्वसनीय समाचारों को एकत्र और प्रसारित करने की अपनी पारंपरिक भूमिका छोड़ दी है. एक फिल्मी सितारे की अप्राकृतिक मौत अब भारतीय मीडिया की सफलता और असफलता परखने का पूर्ण पैमाना बन गया है.

नये दौर की पत्रकारिता में मीडिया की ताकत विश्वसनीयता के बजाय उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार पर निर्भर है. विवादास्पद कंटेंट सबसे तेज बिकनेवाला न्यूज प्रोडक्ट है. दर्शकों को सही जानकारी देने के बजाय, बिखरते फ्रेम की बनावट के साथ बकवास को एक्सक्लूसिव न्यूज के तौर पर दिखाया जाता है, जो कि समाचार के प्रति निरक्षरता को दिखाता है.

व्यक्ति विशेष की खाने-पीने की आदतों और स्वास्थ्य से जुड़ी बेबुनियाद और सनसनीखेज निजी जानकारियों को रोजाना ही समाचारों के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है. टेलीविजन और डिजिटल न्यूज ने कंटेंट और विश्वसनीयता दोनों को ही खो दिया है. न्यूज चैनल बीते कई महीनों से अपना 70 प्रतिशत से अधिक समय एक व्यक्तिगत या एक घिनौनी घटना पर खर्च कर रहे हैं. यह गंभीर तथा स्वतंत्र समाचार पत्रकारिता के बढ़ते फालतूपन और अप्रासंगिकता को दिखाता है.

अचानक आयी यह गिरावट, भारत में समाचार के अकाल के कारण नहीं है. वास्तव में, कोविड के बाद के भारत में समाचारों को जुटाना महत्वपूर्ण है, ताकि सूचनाएं नीति निर्माताओं को प्रभावित करें. जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग द्वारा बताया जा सकता है कि 1.3 अरब की आबादी वाले देश में कोरोनावायरस के खिलाफ कैसे दूरदराज भारतीय क्षेत्रों में लोग लड़ रहे हैं. यह अन्य लोगों के लिए प्रेरक मॉडल साबित हो सकता है.

लेकिन, भारतीय टीवी चैनल भारतीय सितारों की आदतों को जानने के लिए लालायित हैं कि वे कैसे अपने घर में गेमिंग, डांसिंग और कुकिंग कर अपना समय व्यतीत कर रहे हैं. दुर्भाग्य से, भारतीय समाचार प्रतिष्ठान नये माध्यम में हैं, जो सोशल और इलेक्ट्रॉनिक रूप में पूरे देश में फैल रहा है. हथेली के आकार के स्मार्टफोन या आइपैड से जानकारियां साझा हो रही हैं. दुर्भाग्य से समाचारों और विषैले विचारों की आकर्षक क्लिप फैलायी जा रही है.

उत्पादों और सेवाओं के बाजार को बढ़ाने के माध्यम के तौर पर जब से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रिंट माध्यम पर बढ़त बनायी है, तब से आर्थिक हित समाचारों के चयन को प्रभावित करने लगे हैं. टेलीविजन रेटिंग प्वॉइंट (टीआरपी) समाचार बुलेटिन या प्रोग्राम की किस्मत का निर्णय करने का माध्यम बन गया है. कुल 50,000 परिवारों से जुटाये गये मतों के आधार पर टीआरपी कुल टीवी व्यूअरशिप की मृगतृष्णा बन गयी है. मीडिया-मालिकों या विज्ञापनदाताओं के प्रभुत्व वाली सभी रेटिंग एजेंसियों और नियामक संस्थाओं के साथ, किसी संस्था द्वारा दर्शकों की संख्या और गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध है. टीआरपी की अंधी दौड़ में न्यूजरूम से शोरशराबे ने न्यूज को ही मिटा दिया है.

सुशांत सिंह मौत के मामले की रिपोर्टिंग में उद्देश्य और निष्पक्षता के सिद्धांतों को ताक पर रख दिया गया. कई चैनल सूचनाएं देने के बजाय पक्षधरता के चरम पर पहुंच गये. दुर्घटना के बारे में कैसे-क्यों और कहां का जवाब तलाशने के बजाय रिपोर्टिंग उनकी मौत चुनावी फैसले को कब और कहां प्रभावित करेगी, इस पर फोकस है. जांच एजेंसियों को समाचार चैनलों द्वारा ‘विस्फोटक साक्ष्य’ दिये गये, बजाय इसके कि वे खुद सच्चाई की पड़ताल खुद करतीं.

एसएसआर प्रकरण ने मार्शल मैक्लुहान को सही साबित किया है. मैक्लुहान ने लिखा है- माध्यम संदेश है. मीडिया दर्शनशास्त्रियों के लिए, संदेश की गुणवत्ता समाज में होनेवाली दुर्घटनाओं और घटनाओं से तय होती है. यह वैचारिक आधार और स्वामित्व के चरित्र पर निर्भर होती है. एक समय था जब भारतीय मीडिया में लाभ के बजाय व्यावसायिक विशेषता अधिक प्रभावी थी. बाजार सुधारों के साथ भारत का उदारीकरण हुआ. आर्थिक हितों का बढ़ना और सामाचार का कम होना, दोनों ही किसी मीडिया हाउस का सफलता मंत्र बन गये. अदृश्य और कम मुनाफा वाले मालिक उच्च वेतन वाले सीइओ द्वारा विस्थापित कर दिये गये.

फिर भी, प्रिंट मीडिया विश्वसनीयता और स्वीकार्यता को बनाये रखने में सक्षम था, क्योंकि सामग्री को आवाज की नहीं, शब्दों को आवश्यकता होती है. शुक्र है कि टीवी का शोरगुल प्रिंट समाचार की पूर्ण रूप से जगह नहीं ले पाया है. हालांकि, कॉरपोरेट और न्यू एज मीडिया का गठजोड़ सूचना आर्किटेक्चर को नुकसान पहुंचा रहा है.

एक अनुमान के मुताबिक, रोजाना सभी टीवी चैनलों पर अस्सी लाख(कुल व्यूअरशिप के एक प्रतिशत से भी कम) से भी कम लोग प्राइम टाइम न्यूज देखते हैं. जबकि, हर दिन 45 करोड़ पाठक समाचार पत्रों से जुड़ते हैं. वायरलेस संचार सुपरसोनिक जेट से भी अधिक तेज गति सूचनाओं को प्रसारित करता है. अकेले भारत में 56 करोड़ इंटरनेट यूजर हैं, जबकि 3.4 करोड़ ट्विटर पर और 35 करोड़ से अधिक फेसबुक अकाउंट हैं.

यूट्यूब, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म दंगे का कारण बन सकता है, तो नयी हस्तियों को बना भी सकता है. सरकार के प्रमुख, नये माध्यमों के मालिकों के स्वागत के लिए खड़े रहते हैं, क्या कभी उन्होंने बड़े प्रसार वाले अखबारों के मालिकों के लिए ऐसा किया है.सूचना अब ताकत नहीं रह गयी है, बल्कि अब आमदनी है. मीडिया विज्ञापन चलाने वाला उपकरण और प्रोपगैंडा का माध्यम बन गया है. मैक्लुहान ने एक बार कहा था- विज्ञापन 20वीं सदी के सबसे महान कला का प्रारूप था. भारतीय मीडिया भी उसी रास्ते पर है. यह समाचारों को कोलाहल के तौर परोस रहा है, न कि उसके वास्तविक स्वरूप में.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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