न्यायिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम

Supreme Court : जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सुरक्षित फैसले सुनाने में इतनी देरी बेहद चौंकाने वाली और आश्चर्यजनक है. कुछ मामले तो ऐसे होते हैं, जिनमें दोनों पक्षों की दलील हो चुकी होती है और फैसला सुरक्षित होता है.

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों में होने वाले फैसलों में देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए सुनवाई के बाद तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने का जो निर्देश दिया है, वह न्यायिक दक्षता और जवाबदेही में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. शीर्ष अदालत ने तीन महीने की समयसीमा का पालन न होने की स्थिति में मामले को दूसरी बेंच को सौंपने के लिए कहा है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा बना रहे.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दायर एक अपील पर सुनवाई चल रही थी, जिसमें 2008 से लंबित एक आपराधिक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गयी थी. दिसंबर, 2021 में हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील पर विस्तार से सुनवाई की थी. पर कोई फैसला न सुनाये जाने के बाद मामला दूसरी पीठ में ले जाया गया था. शीर्ष अदालत ने पाया कि जल्द से जल्द निपटारे के लिए आवेदन करने के बावजूद अंतिम फैसला नहीं सुनाया गया था.

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सुरक्षित फैसले सुनाने में इतनी देरी बेहद चौंकाने वाली और आश्चर्यजनक है. कुछ मामले तो ऐसे होते हैं, जिनमें दोनों पक्षों की दलील हो चुकी होती है और फैसला सुरक्षित होता है. कई हाईकोर्ट में सिर्फ आखिरी आदेश दे दिया जाता है, पर कारण सहित फैसला लंबे समय तक नहीं आता. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि ऐसी स्थिति में न्याय का असली मकसद विफल हो जाता है. पीठ ने यह भी कहा कि अधिकांश हाईकोर्ट में ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिसके तहत फैसले देने में देरी की जानकारी संबंधित पीठ या मुख्य न्यायाधीश तक पहुंचाया जा सके.

इसी कारण शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को अपने मुख्य न्यायाधीश को उन फैसलों का विवरण देने के लिए कहा है, जो तीन महीनों तक सुरक्षित रखे गये, लेकिन नहीं सुनाये गये. वैसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश संबंधित पीठ को आदेश देंगे कि वह फैसला दो सप्ताह में सुनाये, अन्यथा मामला किसी अन्य पीठ को सौंप दिया जायेगा. सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों पर चिंता भी जतायी है. आंकड़ों के मुताबिक, विगत जुलाई तक देश के न्यायालयों में 5.29 करोड़ मामले लंबित थे. इनमें से साढ़े चार करोड़ से अधिक लंबित मामले तो जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में ही थे. शीर्ष अदालत के इस निर्देश से न्याय व्यवस्था में जरूरी तत्परता की उम्मीद बनती है.

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