सुकांत ने कविता में दबे-कुचलों की पीड़ा को दिया था स्वर

सुकांत भट्टाचार्य, 20वीं सदी के एक ऐसे कवि थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में ही अपनी कविताओं से गहरा प्रभाव छोड़ा. उनकी रचनाओं में शोषितों और वंचितों की आवाज़ मुखर होती थी. मात्र 21 साल की उम्र में देहांत के बावजूद, उन्होंने अनमोल साहित्यिक विरासत छोड़ी.

बीसवीं सदी के बेहद लोकप्रिय बांग्ला कवि सुकांत भट्टाचार्य का लेखन मात्र छह साल तक का था और इक्कीस वर्ष से भी कम उम्र में उनका देहांत हो गया था. इसके बावजूद उन्होंने सार्थक और यादगार लेखन किया. सुकांत अपने समकालीन कवियों में सबसे कनिष्ठ और संभावनाशील थे. तब रवींद्र युग समाप्त हो चुका था और बुद्धदेव बसु कलावाद की नयी स्थापनाएं कर रहे थे. दूसरी तरफ विष्णु दे, अरुण मित्र और जीवनानंद दास अपनी कविताओं में संभावनाओं के नये द्वार खोल रहे थे.

मार्क्सवादी मंत्रों से दीक्षित नजरुल इस्लाम, वीरेंद्र चट्टोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय और समर सेन जैसे कवियों का अलग रास्ता था. सुकांत भट्टाचार्य इसी धारा के कवि थे. प्रसिद्ध कवि सुभाष मुखोपाध्याय ने उनके बारे में लिखा था, 'मैं तब स्कॉटिश चर्च कॉलेज में बीए का छात्र था... विडन स्ट्रीट वाली चाय की दुकान हमारे बैठने की एकमात्र जगह थी, जहां हम कक्षा छोड़कर प्राय: बैठते थे. कॉलेज के सहपाठी मनोज ने एक दिन जबरदस्ती मेरे हाथों में कविताओं की एक कॉपी थमा दी. पढ़कर मैं यकीन ही नहीं कर पाया कि ये कविताएं उसके चौदह वर्षीय चचेरे भाई की लिखी हुई हैं.

मैं ही क्यों, मेरे अन्य मित्रगण, स्वयं बुद्धदेव बसु तक वे कविताएं पढ़कर अवाक रह गये थे'. सुकांत की ज्यादातर श्रेष्ठ कविताएं 1940-46 में चौदह से बीस साल की उम्र में लिखी गयी हैं और वे 'छाड़पत्र' में संकलित हैं. इस संग्रह की शीर्षक कविता है-'इस पृथ्वी को शिशुओं के रहने लायक मैं बना जाऊंगा, नवजातों के प्रति यह मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा है.' इसी संग्रह की एक कविता है, 'एक मुर्गे की कहानी'. इसमें महल के पास रहने वाला एक मुर्गा खाने की चीजें ढूंढ़ते हुए एक डस्टबिन के पास पहुंचता है, जहां उसे खाने-पीने की चीजें मिलती हैं.

तभी लंगोट पहने कुछ लोग वहां पहुंचकर खाद्य पदार्थ चुनने लगते हैं. हारकर वह मुर्गा महल में घुसने की कोशिश करता है. न घुस पाने पर भी वह महल में घुसने के सपने देखता है. कविता की आखिरी पंक्ति है-'उसके बाद मुर्गा एक दिन सचमुच महल में घुस गया/सीधा चला आया सफेद कपड़े ढके डाइनिंग टेबल पर/लेकिन खाने नहीं/खुद खाद्य बनकर'. उनकी 'अनुभव', 'ठिकाना', 'रानार' (डाक थैलों को लेकर दौड़ने वाला डाकिया) और 'विद्रोह आज' जैसी कविताओं को सलिल चौधुरी की धुन और हेमंत कुमार की आवाज ने अमर कर दिया.

'अनुभव' कविता में वह कहते हैं, 'पृथ्वी तुमने मुझे हैरान कर दिया, यहां आकर मुझे सिर्फ पदाघात यानी लात ही मिली'. इसी शीर्षक से बाद में उन्होंने एक और कविता लिखी, 'चारों ओर विद्रोह फैला है, और मैं इसका रोजनामचा लिख रहा हूं. 'हे महाजीवन' कविता भी बेहद प्रसिद्ध हुई, 'अकाल का यह कठिन समय कविता का समय नहीं है. कविता, मैं आज तुम्हें छुट्टी दे रहा हूं. भूख से भरे देश में पृथ्वी गद्यमय है. पूर्णिमा का चांद जली हुई रोटी जैसा लगता है'. 'अठारह वर्ष की उम्र' कविता में वह संपूर्ण देश के हृदय में अठारह उतर आने की कल्पना करते हैं. कामगारों की पीड़ा और दुर्दशा सुकांत की कविताओं के विषय थे. दबे-कुचले लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मुग्ध करती थी.

मामूली वस्तुओं को अपने काव्य गुण से वह विशिष्ट बना सकते थे. 'रेलिंग', 'माचिस की तीली', 'सिगरेट' आदि उनकी ऐसी ही कविताएं हैं. दूसरे विश्वयुद्ध ने सुकांत के कवि मानस पर बहुत असर डाला था. छोटी उम्र पाने के बावजूद उन्होंने व्यापक अनुभव हासिल किया. वर्ष 1943 में बंगाल के अकाल के दौरान वह कोलकाता में अकाल से प्रभावित लोगों को राहत देने के काम से जुड़े हुए थे. उसके अगले वर्ष उन्होंने 'अकाल' नामक काव्य ग्रंथ का संपादन किया. रवींद्रनाथ के प्रति आस्थावान इस विद्रोही कवि ने रवींद्रनाथ को अलग तरह से याद किया है.

'रवींद्रनाथ के लिए' कविता में उन्होंने लिखा, 'मैं एक अकाल का कवि हूं रोज दुस्वप्नों में देखता हूं मृत्यु की स्पष्ट प्रतिच्छवि मेरा वसंत गुजरता है अनाज की कतार में खड़े-खड़े, मेरी उनींदी रातों में बजता है रात का सतर्क सायरन...'. लगातार शारीरिक अस्वस्थता भी क्रांति के प्रति उनके जुनून को मिटा नहीं पायी. पहले मलेरिया, फिर टीबी से ग्रसित होकर सुकांत इक्कीस की आयु से पहले ही दुनिया से विदा हो गये. अपनी कविताओं का पहला संग्रह भी सुकांत देख नहीं पाये. जब उनका पहला कविता संग्रह 'छाड़पत्र' प्रकाशन के लिए जा रहा था, तब वह कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती थे. तेरह मई, 1947 को मृत्यु के समय वह 20 साल नौ महीने के थे. रवींद्रनाथ, जीवनानंद और नजरुल इस्लाम जैसे दिग्गज कवियों के बीच युवतर सुकांत भट्टाचार्य अपनी प्रासंगिकता बनाये रख सके, तो यही उनका महत्व बताने के लिए काफी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By कल्लोल चक्रवर्ती

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >