Jewellery Exports : भारत जिन वस्तुओं का बड़े पैमाने पर निर्यात करता है, उनमें स्वर्णाभूषण और तराशे हुए हीरे का बड़ा स्थान है. ये देश के कुल निर्यात में लगभग 10 से 12 प्रतिशत का योगदान देते हैं. इतना ही नहीं, हमारी जीडीपी में यह उद्योग लगभग सात प्रतिशत का हिस्सेदार है. यानी इसका महत्व इतना अधिक है कि इसमें किसी तरह का व्यवधान जीडीपी को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. और इस समय यही हो रहा है.
ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण आभूषण और हीरे सहित रत्नों के निर्यात में गिरावट आ गयी है, जिससे एक नया खतरा पैदा हो गया है. ऑल इंडिया जेम्स एंड ज्वेलरी काउंसिल और जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनके कुल निर्यात में नौ प्रतिशत, यानी 2.33 अरब डॉलर की उल्लेखनीय गिरावट आयी है. अप्रैल महीने के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण वर्तमान युद्ध ही है, जिससे इनके कंसाइनमेंट भेजे जाने में व्यवधान आया है.
जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल की मानें, तो पश्चिम एशिया में जारी तनाव की वजह से दुनियाभर में आपूर्ति और कारोबार प्रभावित हुआ है, जिसका असर भारतीय निर्यात पर भी पड़ा है. इसके अतिरिक्त, अमेरिका में, जो भारत के जेम्स और ज्वेलरी सेक्टर का बड़ा बाजार है, टैरिफ को लेकर अब भी स्थिति साफ नहीं होने से निर्यात प्रभावित हुआ है. आंकड़ों के मुताबिक, कट और पॉलिश किये गये हीरों का निर्यात अप्रैल में करीब 20 प्रतिशत गिरकर 89 करोड़, 91 लाख डॉलर रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.10 अरब डॉलर से अधिक था.
वहीं, लैब में तैयार किये पॉलिश्ड डायमंड का निर्यात भी करीब 15.5 प्रतिशत घटकर नौ करोड़, 32 लाख डॉलर रह गया. यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि किसी समय दुनिया में अपनी चमक बिखेरने वाले भारतीय हीरे अब खदानों से निकलने बंद हो गये हैं और हम लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर हो गये हैं. हीरे का आयात करने के बाद भारत में इसकी कटिंग और पॉलिशिंग होती है. गुजरात का सूरत शहर इसके लिए विश्व विख्यात है. जहां तक स्वर्णाभूषणों की बात है, तो बंगाल से लेकर गुजरात तक और कश्मीर से लेकर केरल तक इन्हें गढ़ा जाता है.
अमेरिका लंबे समय से भारतीय स्वर्णाभूषण का सबसे बड़ा आयातक देश रहा है, पर ट्रंप सरकार की बेतुकी नीतियों के कारण इसके निर्यात को चोट पहुंची है. अप्रैल में सोने के गहनों का निर्यात करीब 22 प्रतिशत घटकर 84 करोड़, 15 लाख डॉलर रहा. खास तौर पर सादे सोने के गहनों का निर्यात लगभग 47 प्रतिशत टूटकर 34 करोड़, 10 लाख डॉलर पर आ गया. यह गिरावट मामूली नहीं है और इसने सरकार तथा उद्योग के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं.
इतने बड़े पैमाने पर निर्यात घटने से कारीगरों के रोजगार पर असर पड़ने की आशंका है. यह भी पता नहीं है कि अमेरिका और ईरान की लड़ाई कब तक चलेगी. यह एक अनिश्चितता का दौर है, जो निर्यातकों को आशंका में डाले हुए है. भारत में स्वर्णाभूषण और रत्न उद्योग में 50 से 60 लाख लोग काम करते हैं. निर्यात में बड़े व्यवधान का इन पर असर पड़ना तय है. यदि वर्तमान स्थिति ऐसी ही बनी रहती है, तो इस क्षेत्र में तीन से चार लाख लोगों की नौकरी जा सकती है.
इससे जीडीपी में भी गिरावट आयेगी. हालांकि, सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिये हैं. विदेशी व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने जेम्स एंड ज्वेलरी निर्यातकों के लिए एडवांस ऑथराइजेशन स्कीम के तहत ड्यूटी-फ्री (शुल्क मुक्त) सोना मंगाने की सीमा प्रति लाइसेंस अधिकतम 100 किलोग्राम तय कर दी है. इससे निर्यातकों को राहत मिलेगी तथा स्टॉक रखने की भी सुविधा रहेगी. रही बात कस्टम ड्यूटी की, तो जेम्स एंड ज्वेलरी काउंसिल (जीजेसी) का मानना है कि सोने पर कस्टम ड्यूटी (इंपोर्ट ड्यूटी) बढ़ाना उचित नहीं है. इसका असर वैध कारोबार करने वालों पर पड़ेगा और निर्यात में बाधा आयेगी, क्योंकि तैयार आभूषण महंगे हो जायेंगे. जीजेसी का कहना है कि सरकार इसमें संशोधन करे, क्योंकि इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से सोने की मांग नहीं घटेगी, बल्कि तस्करी बढ़ेगी. ऐसा अतीत में हो चुका है.
जब तक यह युद्ध चलेगा, तब तक रत्न एवं आभूषणों के निर्यात में बाधा आती रहेगी. विदेशी ग्राहक भी खरीदारी से दूर रहेंगे तथा नये ऑर्डर मिलने भी मुश्किल हो जायेंगे. ऐसे में निर्यात करने वाली कंपनियों के सामने काम का संकट रहेगा. स्वाभाविक है कि जब बड़े पैमाने पर लोगों की जरूरत नहीं रहेगी, तो छंटनी होगी या फिर बड़े पैमाने पर कारीगरों के कॉन्ट्रैक्ट में बदलाव होगा. इन सभी का देश के कुल रोजगार पर बुरा असर पड़ेगा. इस समय देश में रोजगार बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि अब और श्रमिक एवं कारीगर रोजगार की तलाश में सामने आ रहे हैं. पर इस समय हालात ऐसे हैं कि नये को तो छोड़िए, पुराने कारीगरों की ही नौकरी खतरे में पड़ती दिख रही है. ऐसे में सरकार की भूमिका बड़ी हो जाती है. यहां उसे कई कदम उठाने होंगे. यह आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है. ऐसे में दोनों पक्षों को- सरकार तथा कारोबारी- मिलकर इसका समाधान निकालना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
