पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में पिछले डेढ़ महीने से जारी विरोध प्रदर्शन अब पाकिस्तान के लिए एक गंभीर राजनीतिक और वैधता के संकट के रूप में उभरता दिखायी दे रहा है. शुरुआत में यह आंदोलन विधानसभा की 45 सदस्यीय संरचना में उन 12 आरक्षित सीटों के विरोध में शुरू हुआ था, जो 1947 के बाद पाकिस्तान चले गये जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं, लेकिन समय के साथ यह आंदोलन राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक उपेक्षा, नागरिक अधिकारों और पाकिस्तान के नियंत्रण की प्रकृति जैसे व्यापक मुद्दों का प्रतीक बन गया है. जिस तरह पाकिस्तान ने इस आंदोलन से संवाद स्थापित करने के बजाय बल प्रयोग और दमन का रास्ता अपनाया है, उसने जनता के असंतोष को और गहरा कर दिया है.
आंदोलन का मूल मुद्दा 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग है. हालांकि क्षेत्र के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला दिया कि ये सीटें संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं और इन्हें केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है, पर इस फैसले से विवाद समाप्त होने के बजाय और गहरा गया है. इसका कारण यह है कि विवाद केवल संवैधानिक प्रावधानों का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक अधिकारों का है. पिछले कुछ वर्षों से पीओके में बिजली की बढ़ती कीमतें, सब्सिडी वाले आटे की कमी, बेरोजगारी और विकास की धीमी गति ने आम लोगों की परेशानियां बढ़ायी हैं.
स्थानीय लोगों का सवाल है कि जिन क्षेत्रों में बड़े-बड़े जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित हैं और जहां से पाकिस्तान के अन्य हिस्सों को बिजली उपलब्ध कराई जाती है, वहीं के लोगों को महंगी बिजली क्यों खरीदनी पड़ रही है. लोगों का यह भी आरोप है कि प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय आबादी तक नहीं पहुंचता, जबकि विस्थापन और पर्यावरणीय समस्याओं का बोझ उन्हें ही उठाना पड़ता है. पाकिस्तान सरकार ने इस आंदोलन का जवाब मुख्यतः सुरक्षा के नजरिये से दिया है. इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही जेएएसी यानी ज्वायंट अवामी एक्शन कमेटी पर आतंकवाद निरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगाया गया, उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर प्रतिबंध लगाये गये तथा हजारों पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गयी.
प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पों में कई लोगों की मौत हुई है. आंदोलनकारी और स्थानीय राजनीतिक संगठन आरोप लगा रहे हैं कि निहत्थे नागरिकों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किया गया. जाहिर है कि बढ़ती हिंसा ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है. इस आंदोलन का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि इसके नेता अब पाकिस्तान के आधिकारिक नैरेटिव को भी खुली चुनौती देने लगे हैं. हाल ही में रावलाकोट में आयोजित विशाल जनसभा में आंदोलन के प्रमुख नेता सरदार अमन खान ने कहा कि 'यह क्षेत्र न तो आजाद है और न ही विवादित, बल्कि पाकिस्तान के कब्जे वाला क्षेत्र है'. यह बयान पाकिस्तान द्वारा दशकों से प्रस्तुत किये जा रहे उस आधिकारिक दृष्टिकोण पर सीधी चोट है, जिसके अनुसार तथाकथित 'आजाद कश्मीर' एक स्वायत्त इकाई है और अंतिम समाधान तक उसकी वर्तमान स्थिति बनी रहेगी.
प्रदर्शनों के दौरान पाकिस्तान विरोधी नारों का लगातार लगना भी इस बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत देता है. कुछ प्रदर्शनकारियों ने खुले तौर पर कहा कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का राजनीतिक और आर्थिक शोषण किया है. आंदोलन के नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन ने कई सप्ताह तक खाद्य सामग्री और दवाओं की आपूर्ति बाधित कर दी, जिससे मानवीय संकट उत्पन्न हो गया. उन्होंने नियंत्रण रेखा के पार रहने वाले लोगों तथा भारत से भी मानवीय सहायता की अपील की. इस बीच यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी सहित कई स्थानीय संगठनों ने सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर नागरिकों की हत्या, मनमानी गिरफ्तारियों, जबरन गुमशुदगी, संचार प्रतिबंध और नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है.
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से तथ्य खोजने वाले स्वतंत्र मिशन भेजने का आग्रह भी किया है. भले इस मांग पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कोई कार्रवाई न हो, लेकिन इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि स्थानीय आंदोलन अब अपने मुद्दों को वैश्विक मंच तक ले जाने का प्रयास कर रहा है. भारत ने भी इन घटनाक्रमों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पीओके में जारी आंदोलन पाकिस्तान द्वारा दशकों से किये जा रहे राजनीतिक शोषण, मौलिक अधिकारों के दमन और प्रशासनिक अत्याचार का नतीजा है. भारत ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान नागरिकों के खिलाफ बल प्रयोग कर रहा है, खाद्य व चिकित्सा आपूर्ति बाधित कर रहा है तथा इंटरनेट बंद कर लोगों की आवाज दबाने का प्रयास कर रहा है.
यह प्रतिक्रिया भारत की उस नीति के अनुरूप है, जिसके अनुसार पाकिस्तान इस क्षेत्र पर अवैध कब्जा बनाए हुए है और लोगों को अधिकारों से वंचित रख रहा है. हालांकि इस पूरे घटनाक्रम को केवल भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा. पीओके की घटनाएं पाकिस्तान के भीतर उभर रहे व्यापक राजनीतिक संकट का भी हिस्सा हैं. बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और अन्य प्रांतों में भी लंबे समय से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और प्रांतीय स्वायत्तता की मांग उठती रही है. ऐसे में पीओके के आंदोलन को इस व्यापक असंतोष की एक और अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है, जहां नागरिक अधिक जवाबदेह शासन और वास्तविक राजनीतिक भागीदारी चाहते हैं. क्षेत्र में इसी महीने होने वाले विधानसभा चुनाव ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है.
यदि चुनाव ऐसे माहौल में होते हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग निर्वाचन व्यवस्था की निष्पक्षता पर ही सवाल उठा रहे हों, तो चुनाव परिणाम की वैधता भी विवादों में आ सकती है. पीओके में चल रहा आंदोलन यह स्पष्ट संकेत देता है कि केवल सुरक्षा बलों की तैनाती, इंटरनेट बंद करने, संगठनों पर प्रतिबंध लगाने और विरोध को दबाने से राजनीतिक संकट समाप्त नहीं होते. स्थायी समाधान तभी संभव है, जब जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं, आर्थिक शिकायतों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांगों को गंभीरता से सुना जाये. यदि पाकिस्तान केवल दमन के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करता रहा, तो यह संकट और गहरा सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
