जिनपिंग का बिखरता सपना

तिब्बत के लोग अपनी मातृभूमि के लिए संघर्षरत हैं. अगर भारत का उन्हें साथ मिला, तो तिब्बत के जांबाज चीन के सैन्य बल को तोड़ने का काम कर सकते हैं. भारत के लिए भी जरूरी है कि तिब्बत कार्ड का प्रयोग अब किया जाये.

By प्रो सतीश | September 15, 2020 7:04 AM

प्रो सतीश कुमार, राजनीतिक टिप्पणीकार

singhsatis@gmail.com

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दशक भर से चर्चा है कि दुनिया में राजनीतिक ध्रुवीकरण हो रहा है. शक्ति पश्चिमी दुनिया से खिसककर एशिया की ओर मुड़ रही है, जिसका सबसे प्रबल दावेदार चीन है. चीन की आर्थिक और सैनिक व्यवस्था में पिछले चार दशकों में बहुत बदलाव हुआ है. उसे उम्मीद है कि 2035 तक वह सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जायेगा और शक्ति में भी वह पहले पायदान पर पहुंच जायेगा. लेकिन, ऐसा होता हुआ दिखायी नहीं देता. प्रो रिचर्ड हास का मानना है कि महाशक्ति बनने के लिए कई गुणों की जरूरत पड़ती है. जिनमें दो गुण विशेष हैं- पहला, दुनिया के किसी भी हिस्से में सैनिक हस्तक्षेप तथा दूसरा, कहीं भी आण्विक प्रक्षेपास्त्र दागने की क्षमता.

ये दोनों क्षमता आज यदि किसी देश के पास है, तो निश्चित रूप से वह अमेरिका ही है. दोनों ही मानकों पर चीन की मठाधीशी कारगर नहीं दिखती. चीन एशिया का निष्कंटक संप्रभु बनने की कोशिश में है. भारत के साथ उसका सीमा विवाद इसी का नतीजा है. लेकिन, भारत ने उसे चुनौती दी है. जब चीन और भारत एक साथ राजनीतिक छावनी बनाने की तैयारी में जुटे थे, तो अमरीका ने भारत को अपना हितैषी माना था. 13 सितंबर, 1949 के न्यूयॉर्क टाइम्स में एक आलेख छपा था कि भारत चीन की शक्ति को रोकने में कामयाब होगा. भारत 65 वर्षों तक चीन की आत्मीयता के लिए सबकुछ त्याग करता गया.

सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता और तिब्बत का त्याग जैसे उदाहरण दुनिया के सामने हैं. फिर भी चीन भारत के साथ छल करता रहा. हिमालय के सीमावर्ती देशों में अपनी धाक जमाने के साथ, वहां भारत विरोध की लहर पैदा करना चीन के छल का हिस्सा बन गया. हम एक चीन के सिद्धांत को शिद्दत के साथ मानते रहे, लेकिन चीन लचर और लाचार पड़ोसी के रूप में हमारे प्रति अपनी धारणा बनाता गया. बदलाव का सिलसिला 2014 से शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा भूटान से शुरू की और फिर वह नेपाल गये. यह एक गंभीर संदेश था चीन के लिए. हिमालयी देश भारत की विशेष मैत्री और संप्रभुता के अंग हैं.

शीत युद्ध के कोलाहल ने भारत को दोयम दर्जे के देश के रूप में रूपांतरित कर दिया था. भारतीय विदेश नीति पूरी तरह से पाकिस्तान उन्मुख बन चुकी थी, जिसे बनाने वाले प्रधानमंत्री नेहरू और तत्कालीन रक्षा मंत्री मेनन थे. वर्ष 1962 के युद्ध के पहले जब सेना प्रमुख चीनी आक्रमण के लिए चिंतित थे, तो रक्षा मंत्री पाकिस्तान के साथ युद्ध पर आमादा थे. उन्होंने आगरा में यह बात युद्ध के पहले कही थी. अगर 2014 के पहले के भारत के अस्त्र-शस्त्र का आकलन करेंगे, तो भारत की सुरक्षा नीति स्पष्ट रूप से परिभाषित हो जाती है. भारत के पास चीन के विरुद्ध लड़ने की कोई तैयारी ही नहीं थी. डोकलाम के बाद सरकार प्रयासरत हुई. उसके बाद ही चतुर्भुज आयाम बना, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं.

एशिया-पैसिफिक को इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) के रूप में रूपांतरित कर दिया गया. पूर्वी एशिया में चीन की धार को कुंद करने के लिए भारत को विशेष अहमियत दी जाने लगी. चीन के पड़ोसी देश भारत के साथ सैनिक अभ्यास में शरीक होने लगे. बदले में चीन ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी सैन्य गतिविधि को और मजबूत बनाना शुरू कर दिया. पाकिस्तान पूरी तरह से चीन की पीठ पर जोंक की तरह चिपक चुका है. उसकी अपनी कोई स्वतंत्र नीति नहीं है. लेकिन चिंता की लकीर नेपाल को लेकर खिंच रही है. भारत नेपाल को चीन का पिछलग्गू देश बनते हुए नहीं देख सकता.

फिलहाल चीनी सेना पिछले पांच महीनों से भारतीय सीमा के भीतर घुसने के लिए बेताब है. पिछले दिनों सीमा पर जब चीनी सैनिकों की संख्या बढ़ायी गयी, तो भारत ने भी अपनी ताकत को बढ़ाकर दुगना कर दिया. यदि भारत ने तिब्बत कार्ड खेलना शुरू कर दिया, तो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दिवास्वप्न पर आघात लग सकता है. पिछले कुछ महीने में चीन के पांच बड़े नेता, जो पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं, तिब्बत जा चुके हैं और भारत के साथ संघर्ष के लिए उन्हें तैयार करने की सीख दे रहे हैं. तिब्बत के धर्मगुरु भारत में हैं और तिब्बत की निर्वासित सरकार भारत से चलायी जाती है. तिब्बत के लोग अपनी मातृभूमि के लिए संघर्षरत हैं.

अगर भारत का उन्हें साथ मिला, तो तिब्बत के जांबाज चीन के सैन्य बल को तोड़ने का काम कर सकते हैं. भारत के लिए भी जरूरी है कि तिब्बत कार्ड का प्रयोग अब किया जाये. यदि चीन सफल हुआ, तो दशकों तक भारत को शुतुरमुर्ग की तरह जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ेगा. अगर चीन की हार हुई, जिसकी संभावना पूरी है, तो विश्व राजनीति में भारत का प्रभाव कई गुना बढ़ जायेगा. शी जिनपिंग ने सत्ता में आने के तुरंत बाद एक व्यापक चीन साम्राज्य स्थापित करने की बात कही थी, जो मिंग साम्राज्य के समय था, अर्थात भारत का लद्दाख, अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर का हिस्सा चीन का है. जिनपिंग का यह सपना बिखरने वाला है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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