BRICS meeting : अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशाल रंगमंच में प्रशंसा सबसे सस्ती चीज है, जिसका उपयोग कूटनीति करती है. किसी राष्ट्र की योग्यताओं की सराहना करने, उसकी प्राचीन बुद्धिमत्ता का गुणगान करने, उसकी राजनयिक क्षमता को सलाम करने और फिर उसे पूरी तरह दरकिनार कर देने का चलन है. पिछले सप्ताह नयी दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक ने इस कला का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया. भारत की अध्यक्षता में बुलायी गयी इस बैठक का उद्देश्य फरवरी के अंत से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को झकझोर रहे ईरान-अमेरिका संघर्ष पर सामूहिक संकल्प तैयार करना था. पर इसका अंत किसी संयुक्त घोषणा के बजाय विरोधाभास के साथ हुआ.
इस शिखर सम्मेलन ने दो ऐसे देशों की दोहरेपन की कूटनीति का प्रदर्शन किया, जो स्वयं को अक्सर भारत के सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार बताते हैं. ये देश हैं ईरान और रूस. उनके विदेश मंत्री सार्वजनिक रूप से नयी दिल्ली की शांति-स्थापक, सेतु-निर्माता और अपरिहार्य मध्यस्थ के रूप में प्रशंसा कर रहे थे, पर उनके द्वारा उठाये गये कदम अलग कहानी कह रहे थे. यह प्रशंसा की भाषा में छिपा हुआ योजनाबद्ध बहिष्कार था. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ब्रिक्स देशों को ‘अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन’ और ‘पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ एकजुट’ करने दिल्ली आये थे. पर सम्मेलन विफल हो गया, क्योंकि ईरान अमेरिकी-इस्राइली ‘आक्रामकता’ की स्पष्ट निंदा पर अड़ा रहा. पर इस असहमति के बीच भी अराघची ने कहा कि नयी दिल्ली पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने में और बड़ी भूमिका निभा सकती है.
उन्होंने भारत की किसी भी रचनात्मक भूमिका का स्वागत किया और चाबहार बंदरगाह को मध्य एशिया का स्वर्ण द्वार बताया. उनके शब्द गर्मजोशी भरे, विनम्र और अत्यधिक प्रशंसात्मक थे. पर वे पूरी तरह खोखले भी थे. रूस के सर्गेई लावरोव ने भी यही भूमिका अधिक सटीकता के साथ निभायी. उन्होंने पाकिस्तान की वर्तमान भूमिका और भारत की कहीं अधिक श्रेष्ठ दीर्घकालिक मध्यस्थता क्षमता के बीच स्पष्ट अंतर किया. उन्होंने कहा, यदि वे ईरान और उसके अरब मित्रों के बीच दीर्घकालिक मध्यस्थ चाहते हैं, तो अपने विशाल कूटनीतिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को देखते हुए भारत यह भूमिका निभा सकता है. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में भारत भविष्य की शत्रुता को रोकने के लिए ईरान और यूएइ के बीच प्रारंभिक वार्ताओं की मेजबानी कर सकता है. ये सोच-समझकर दिये गये बयान थे- प्रशंसा में सटीक, पर व्यवहार में निरर्थक.
दरअसल, इन दोनों देशों ने पहले ही अपने निर्णय ले लिये थे. और उनमें भारत स्पष्ट रूप से अनुपस्थित था. फरवरी में अमेरिका-इस्राइल हमलों के बाद नाजुक युद्धविराम और होर्मुज पर वास्तविक नाकेबंदी की भयावह स्थिति पैदा हुई, भारत ने हरसंभव अवसर पर हस्तक्षेप की अपनी तत्परता दिखाई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही दिन से तनाव कम करने की वकालत की. भारत ने बैक-चैनल सहायता की पेशकश की और बिना किसी शर्त के बार-बार मध्यस्थता की पेशकश की, क्योंकि यही ऐसा एक देश था, जो बिना वैचारिक पक्षपात के सभी पक्षों से विश्वसनीय संवाद कर सकता था. पर इस प्रस्ताव को न स्वीकार किया गया, न ही मान्यता दी गयी.
इसके बजाय तेहरान ने इस्लामाबाद का रुख किया. पाक मध्यस्थता के परिणामस्वरूप अप्रैल में युद्धविराम ढांचा तैयार हुआ और अमेरिका-ईरान वार्ता इस्लामाबाद में आयोजित हुईं. ईरानी मंत्रियों ने पाकिस्तान की कई यात्राएं कीं. नाजुक कूटनीतिक गलियारे के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे राष्ट्र के लिए गर्व का विषय बताया. यूरोपीय राजधानियों, खाड़ी देशों और एशियाई कूटनीतिक मिशनों से बधाई संदेश आने लगे. भारत में प्रतिक्रिया तीखी और कठोर थी. रणनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी नेताओं ने प्रश्न उठाये कि आखिर भारत को, जिसके तेहरान के साथ अधिक गहरे ऐतिहासिक संबंध, बेहतर अवसंरचना, व्यापक वैश्विक विश्वसनीयता और क्षेत्रीय स्थिरता की वास्तविक इच्छा है, इस महत्वपूर्ण मंच से दूर क्यों रखा गया. संदेश स्पष्ट था : सामरिक सुविधा को रणनीतिक साझेदारी पर प्राथमिकता दी गयी और भारत को दर्शक बनाकर छोड़ दिया गया.
ईरान द्वारा होर्मुज में आवाजाही पर व्यापक प्रतिबंध लगाने के निर्णय ने इस दोहरेपन को और बढ़ा दिया. इससे आपूर्ति बाधित हुई और भारत की ऊर्जा गणनाओं पर ऐसा असर पड़ा, जिससे अन्य देश काफी हद तक बचे रहे. ईरान का सबसे स्थायी राजनीतिक और सैन्य समर्थक रूस भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. मॉस्को के पास तेहरान पर ऐसा प्रभाव है, जिसकी बराबरी कोई अन्य शक्ति नहीं कर सकती. यदि लावरोव सचमुच मानते कि भारत आदर्श दीर्घकालिक मध्यस्थ है, तो रूस ईरान पर दबाव डालने के लिए हर साधन का उपयोग कर सकता था. पर उसने ऐसा नहीं किया. जबकि मोदी और ट्रंप के बीच व्यक्तिगत संबंध हैं तथा भारत की यह अनोखी क्षमता है कि वह वाशिंगटन, तेहरान, रियाद और अबू धाबी से एक साथ संवाद कर सकता है. यही वे गुण थे, जिनकी लावरोव ने सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की. पर मॉस्को ने न तो भारत की भागीदारी का समर्थन किया, न ही उसकी रक्षा की. यह भूल नहीं थी. यह प्रशंसा की भाषा में छिपा हुआ सुनियोजित निर्णय था.
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक भारत का इस समाधान में केवल हित ही नहीं, सभ्यतागत दायित्व भी है. पर अब हिसाब का समय आ रहा है. सबसे पहले इसका सामना इस्लामाबाद को करना पड़ेगा. पाकिस्तान की मध्यस्थता उसकी अपनी सीमाओं के बोझ तले ढह चुकी है. स्थायी परिणाम देने की उसकी क्षमता पर विश्वास खत्म हो चुका है. अब ईरान एक चौराहे पर खड़ा है. आंतरिक दबाव, आर्थिक अलगाव और कूटनीतिक थकान के बीच तेहरान को एक असुविधाजनक पर सरल सत्य स्वीकार करना होगा. भारत वह सब कुछ रखता है, जिसकी उसे अब सख्त जरूरत है. भारत की कूटनीतिक पूंजी उधार की नहीं है. यह दशकों की सिद्धांतवादी और धैर्यपूर्ण भागीदारी से अर्जित की गयी है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अनजाने में दूरदर्शिता की कमी की कीमत पर आधारित नैतिक नाटक बन गया. भारत के लिए इसने एक स्पष्ट सबक दिया है. जीवन की तरह कूटनीति में, प्रशंसा मिलना सम्मान मिलने के बराबर नहीं होता, और उत्सव का केंद्र बनना शामिल किये जाने के समान नहीं होता. अब मंच को केवल वक्ता नहीं, एक सच्चे राजनेता की जरूरत है. तेहरान और मॉस्को को अब अपनी बात पर अमल करना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
