अस्पतालों पर लगाम

प्रतिस्पर्धा आयोग की कार्रवाई से उम्मीद बंधी है कि अस्पतालों की मुनाफाखोरी पर लगाम लगेगी. सरकारी स्तर पर निरंतर निगरानी भी की जानी चाहिए.

बड़े निजी अस्पतालों पर लंबे समय से दवाओं और सुविधाओं के बदले मरीजों से बहुत अधिक पैसा लेने के आरोप लगते रहे हैं. दुर्भाग्य से आरोपों और आपत्तियों का खास असर नहीं होता है क्योंकि चिकित्सा बाजार में इन अस्पतालों का एकाधिकार है. लेकिन अब यह सिलसिला थम सकता है. भारत के प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने देश के तीन सबसे बड़े निजी अस्पतालों- मैक्स हेल्थकेयर, फोर्टिस हेल्थकेयर और अपोलो हॉस्पिटल्स- से पूछा है कि वे अपने अस्पतालों में दवाओं और अन्य चिकित्सा सामग्रियों के दाम कैसे तय करते हैं.

यदि उनका जवाब संतोषजनक नहीं होता है, तो आयोग उन्हें दंडित कर सकता है. यह कार्रवाई एक लंबी जांच के बाद की गयी है और देश में ऐसी कोई जांच पहली बार हुई है. वर्ष 2015 में दिल्ली में एक व्यक्ति ने शिकायत की थी कि जो सीरिंज सामान्य दुकानों पर दस रुपये में उपलब्ध है, उसे एक बड़े अस्पताल में दुगुने दाम पर बेचा जा रहा है. अक्सर देखा जाता है कि बड़े अस्पताल, यहां तक कि क्लिनिक भी, मरीजों से अपने ही दवाखानों से दवाएं और जरूरी चिकित्सा सामग्री खरीदने का दबाव बनाते हैं.

इनके यहां जांच की दरें भी महंगी होती हैं. बड़े अस्पतालों में भले ही अच्छे चिकित्सक हैं और उनके यहां उपचार की अच्छी सुविधा भी है, पर इन आधारों पर मनमानी शुल्क वसूलने या महंगी दवाएं बेचने को सही नहीं ठहराया जा सकता है. ऐसी खबरें अक्सर आती हैं कि इलाज का बकाया न चुकाने की वजह से मरीज को बंधक बना लिया जाता है. कभी कभी तो मृत रोगी के शरीर को भी परिजनों को सौंपने से इनकार कर दिया जाता है.

प्रतिस्पर्धा आयोग ने पिछले साल हुई अपनी विस्तृत जांच में पाया है कि निजी अस्पताल कई गुना मुनाफे पर दवाइयों और अन्य चीजों को बेच रहे हैं. यह भी पाया गया है कि दवा बनानेवाली कंपनियों का निजी अस्पतालों और क्लिनिकों से गठजोड़ है. उल्लेखनीय है कि हमारे देश में कुछ आवश्यक दवाओं के दाम राष्ट्रीय दवा मूल्य प्राधिकार द्वारा निर्धारित हैं ताकि सभी को वे आसानी से मुहैया हो सकें.

सरकारी अस्पतालों और कार्यक्रमों में उन्हें निशुल्क भी दिया जाता है. अन्य दवाओं की कीमत कंपनियां तय तो कर सकती हैं, पर वे इस्तेमाल हुए फार्मूले के अधिकतम खुदरा मूल्य से दस फीसदी से अधिक नहीं हो सकती है. भारत में चिकित्सकों और स्वास्थ्य केंद्रों की बड़ी कमी है. सरकारी अस्पतालों में या तो संसाधनों व सुविधाओं की कमी है या फिर भारी भीड़.

ऐसे में निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. प्रतिस्पर्धा आयोग की कार्रवाई से उम्मीद बंधी है कि अस्पतालों की मुनाफाखोरी पर लगाम लगेगी. सरकारी स्तर पर निरंतर निगरानी भी की जानी चाहिए. अस्पतालों को भी अपने रवैये में सुधार करना चाहिए और याद रखना चाहिए कि उन्हें सस्ते दामों पर जमीन, कर्ज, रियायत आदि की सुविधाएं जन सेवा के लिए ही दी जाती हैं.

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