Regional Parties : भारतीय लोकतंत्र के विशाल अखाड़े में एक कठोर सच्चाई उभर रही है. पूरे देश में, किसी एक नेता के करिश्मे, जातीय समीकरणों या भाषाई गौरव पर आधारित शक्तिशाली रहे क्षेत्रीय दल आश्चर्यजनक गति से बिखर रहे हैं. पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस को ही लें. ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर इसका गठन किया था और इसमें वामपंथ विरोधी लोकलुभावन राजनीति, बंगाली सांस्कृतिक अस्मिता और व्यक्तिगत कल्याणकारी राजनीति का शक्तिशाली मिश्रण भरा था. दो दशकों तक यह पार्टी एक राजनीतिक दल से अधिक एक महिला की इच्छाशक्ति का विस्तार बनकर कार्य करती रही. पर जब चुनावी झटके लगे, तो कुछ ही घंटों में स्पष्ट हो गया कि यह वैचारिक घर कम, संरक्षण आधारित नेटवर्क अधिक था. जिन विधायकों ने ‘दीदी’ के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी, उन्हें अहसास हुआ कि वह निष्ठा हमेशा लेन-देन पर आधारित थी. सत्ता में वापसी और उससे जुड़ी सुविधाओं की गारंटी समाप्त होते ही समूह बिखर गया.
तमिलनाडु में द्रविड़ दल कभी क्षेत्रीय पहचान, भाषा गौरव और सामाजिक न्याय के मजबूत स्तंभ माने जाते थे, जो कथित उत्तरी सांस्कृतिक वर्चस्व के विरुद्ध खड़े थे. फिर भी डीएमके और एआइएडीएमके अपनी निर्विवाद प्रभुत्वशाली स्थिति खो चुके हैं. नेतृत्व परिवर्तन से वैचारिक ऊर्जा कमजोर पड़ने पर डीएमके की संगठनात्मक शक्ति भी अपने मूल आकर्षण के क्षरण को नहीं रोक सकी. जयललिता के निधन के बाद पहले ही विभाजित हो चुकी एआइएडीएमके ऐसे उत्तराधिकारियों के हाथों में पहुंची, जिनमें समर्थकों को एकजुट रखने वाला प्रभावशाली व्यक्तित्व नहीं था. विधायक नये राजनीतिक मंचों की ओर जाने लगे, जो बदलते राष्ट्रीय परिदृश्य में अधिक प्रासंगिकता का वादा कर रहे थे.
महाराष्ट्र में बाल ठाकरे द्वारा मराठी गौरव और बाद में हिंदुत्व की भावना पर निर्मित शिवसेना तब विभाजित हो गयी, जब उद्धव ठाकरे अपने पिता जैसी प्रभावशाली नेतृत्व शैली का प्रदर्शन नहीं कर सके. एकनाथ शिंदे का विद्रोह इसलिए सफल हुआ, क्योंकि बड़ी संख्या में विधायकों ने यह आकलन किया कि राष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्ठान के साथ जुड़ाव, कमजोर पड़ती विरासत के प्रति निष्ठा से अधिक लाभकारी होगा. यही गणित एनसीपी में भी दिखाई दिया. राजनीति के माहिर रणनीतिकार शरद पवार अब अपने समर्थकों को सत्तारूढ़ गठबंधन के आकर्षण से बचाने में सक्षम नहीं रहे. उनके भतीजे अजित पवार एक बड़े समूह को अपने साथ ले गये, क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि वरिष्ठ पवार का प्रभाव अब टिकट या राजनीतिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देता.
आम आदमी पार्टी भी अछूती नहीं रही. भ्रष्टाचार विरोधी और सुशासन आधारित विचारधारा के साथ उभरी इस पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में भारी बहुमत हासिल किया था. अरविंद केजरीवाल ने कल्याणकारी योजनाओं और व्यवस्था के साथ टकराव की राजनीति के आधार पर एक सशक्त व्यक्तिगत छवि बनायी. फिर भी कई प्रमुख नेताओं ने यह मानते हुए, कि राष्ट्रीय पार्टी तेज राजनीतिक उन्नति और संस्थागत मजबूती के बेहतर अवसर प्रदान करती है, भाजपा का दामन थाम लिया. ये अलग-थलग घटनाएं नहीं, एक गहरे संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत हैं.
शरद पवार, एम करुणानिधि, मुलायम सिंह यादव, जयललिता, नवीन पटनायक और प्रकाश सिंह बादल जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों ने दशकों की जमीनी मेहनत और व्यक्तिगत विश्वसनीयता के बल पर सम्मान अर्जित किया था. वे स्वयं चुनाव जीत सकते थे और दूसरों को भी जीत दिला सकते थे. विदेशों में शिक्षित और जीवन की भिन्न गति के अभ्यस्त उनके उत्तराधिकारी वैसा जनसंपर्क स्थापित करने में संघर्ष कर रहे हैं. कुछ अपवादों को छोड़ नयी पीढ़ी ने लगातार मेहनत करने की सीमित इच्छा दिखाई है. लिहाजा, कार्यकर्ताओं में बढ़ती निराशा ने दल-बदल की गति तेज कर दी है. इस उलट-पुलट के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. उन्होंने वह उपलब्धि हासिल की है, जो कम नेता कर पाते हैं-यानी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व को आक्रामक राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं की स्पष्ट वैचारिक परियोजना के साथ जोड़ देना.
प्रत्यक्ष संवाद, लक्षित योजनाओं और संस्थागत प्रभाव के माध्यम से उन्होंने मतदाताओं के साथ ऐसा संबंध स्थापित किया है, जो पारंपरिक दलगत मध्यस्थों को दरकिनार कर देता है. वर्ष 2024 के जनादेश ने भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं दिया, फिर भी सरकार और पार्टी के भीतर मोदी की शक्ति कम होने के बजाय और बढ़ी हुई प्रतीत होती है. विभिन्न दलों के महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए भाजपा अब चुनावी सफलता और दीर्घकालिक राजनीतिक सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय माध्यम दिखाई देती है. कमजोर केंद्र से रियायतें हासिल करने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों का पुराना राजनीतिक गणित अब काम नहीं करता. ऐसे में, राजनीतिक बाजार में विलय और अधिग्रहण की लहर दिखाई दे रही है.
कांग्रेस ने वर्षों के क्षरण के बाद स्थिरता के संकेत दिखाये हैं. कई राज्यों में उसका संगठनात्मक ढांचा अब भी मौजूद है और उसे भाजपा के विरुद्ध संभावित राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखा जाता है. जो वामपंथ कभी एक शक्तिशाली वैचारिक शक्ति था, आज बाजार की वास्तविकताओं और मतदाताओं की बदलती आकांक्षाओं के कारण और पीछे चला गया है. राजनीतिक संघर्ष अब धीरे-धीरे कांग्रेस के नेतृत्व वाले केंद्र-वाम गठबंधन और भाजपा के नेतृत्व वाले केंद्र-दक्षिणपंथी गठबंधन के बीच सीमित होता दिखाई दे रहा है. दोनों का चरित्र लगातार अधिक राष्ट्रीय होता जा रहा है और दोनों का नेतृत्व ऐसे व्यक्तियों के हाथों में है जिन्होंने व्यक्तित्व और विचारधारा का सफल संयोजन किया है.
यह केवल कुछ नेताओं के महत्व खोने की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अत्यधिक विखंडन वाले एक पुराने चरण से बाहर निकलने की कहानी भी है. गठबंधन युग ने जीवंत क्षेत्रीय आवाजों को जन्म देने के साथ दीर्घकालिक अस्थिरता, नीतिगत गतिरोध और लेन-देन आधारित राजनीति को भी बढ़ावा दिया. वर्तमान राजनीतिक मंथन संभवतः एक अधिक जवाबदेह व्यवस्था का निर्माण कर रहा है, जहां दलों को किसी एक व्यक्ति के करिश्मे पर निर्भर रहने के बजाय लगातार प्रदर्शन करना होगा. दो राष्ट्रीय ध्रुवों पर आधारित राजनीति स्थानीय और सूक्ष्म आवाजों के लिए स्थान कम कर सकती है. भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि क्या यह राजनीतिक केंद्रीकरण स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और संस्थागत संतुलन को बनाये रखता है, या केवल अनेक छोटे सत्ता केंद्रों की जगह एक बड़े सत्ता केंद्र को स्थापित कर देता है. आगे यह स्पष्ट होगा कि यह पुनर्गठन अधिक संगठित और प्रभावी लोकतंत्र का निर्माण करता है या केवल सत्ता को कुछ हाथों में केंद्रित कर देता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
