मुफ्त यूपीआइ पर पुनर्विचार के मायने

यूपीआइ की दशकों पुरानी 'डिजिटल भुगतान मुफ्त' नीति पर पहली बार बड़ा विचार हो रहा है. संसद ने एमडीआर की कानूनी बाधा हटा दी है. इसका आम आदमी और व्यापारियों पर क्या असर होगा बता रहे हैं वरिष्ठ अर्थशास्त्री अभिजीत मुखोपाध्याय और अवनी गोयल.

देश की एकीकृत भुगतान प्रणाली, यानी यूपीआइ को शुरू हुए एक दशक हो चुके हैं और बीते छह वर्षों से यह एक सरल, पर महत्वपूर्ण सिद्धांत पर काम कर रही है : ‘डिजिटल भुगतान किसी के लिए भी कोई लागत नहीं रखता’. जनवरी, 2020 में सरकार ने यूपीआइ और रुपे डेबिट कार्ड पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट, यानी एमडीआर शुल्क को शून्य कर दिया था. अब इस सिद्धांत पर पहली बार वास्तविक पुनर्विचार हो रहा है. चार अगस्त को संसद ने कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया, जिसके तहत भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में संशोधन किया गया है.

यही वह प्रावधान था, जिसने शून्य एमडीआर को केवल नीतिगत निर्णय नहीं, बल्कि कानूनी अनिवार्यता बना दिया था. बेशक, यह संशोधन अपने आप कोई शुल्क लागू नहीं करता, पर यह उस कानूनी बाधा को हटा देता है, जिसके कारण यूपीआइ पर शुल्क लगाना गैरकानूनी था. इसलिए यह कहना कि ‘एमडीआर वापस आ रहा है’ पूरी तस्वीर नहीं है. असल बात यह है कि ‘एमडीआर अब कानूनी रूप से फिर संभव हो गया है’. यूपीआइ को किसी व्यावसायिक उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे के रूप में विकसित किया गया था. इससे समाज और अर्थव्यवस्था को वास्तविक लाभ मिला है.

इसने भारत की नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने, कर अनुपालन बेहतर और छोटे कारोबारों के डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड तैयार करने में मदद की है, जिससे उनकी ऋण तक पहुंच भी बेहतर हुई है. इनमें से किसी भी लाभ का असर बैंक या वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी के आय विवरण में दिखाई नहीं देता और यही इसका मूल उद्देश्य था. सरकार बैंकों की ओर से लेनदेन की लागत वहन करती रही और वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों को अन्य माध्यमों से आय अर्जित करने का अवसर दिया गया. बीते कुछ वर्षों में ‘अन्य माध्यमों’ का स्वरूप स्पष्ट हुआ है. इनमें यूपीआइ लेनदेन के आंकड़ों के आधार पर दिये जाने वाले ऋण और क्रेडिट उत्पाद, साउंड बॉक्स जैसे व्यापारी उपकरण तथा वित्तीय सेवाओं की बढ़ती शृंखला शामिल है, जो भुगतान व्यवस्था के माध्यम का इस्तेमाल करती हैं, पर स्वयं भुगतान व्यवस्था के लिए शुल्क नहीं लेतीं.

यूपीआइ तंत्र में प्रवेश करने वाली कंपनियों को पहले से पता था कि एमडीआर शून्य है. इसलिए उनसे अपेक्षा थी कि वे इस सीमा के भीतर नये समाधान विकसित करेंगी. दिलचस्प है कि भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, यानी एनपीसीआइ कभी पूरी तरह बिना आय के नहीं रहा है. उसे इस पूरे तंत्र के अन्य हिस्सों से शुल्क के रूप में आय होती है, जिससे वह बुनियादी ढांचे में निवेश जारी रख सका, जबकि मुख्य पी2एम, यानी व्यक्ति से व्यापारी लेनदेन नि:शुल्क बना रहा. गौरतलब है कि विगत मार्च में पेश की गयी वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में शून्य एमडीआर को अस्थिर बताते हुए टिकाऊ आय के स्रोत की जरूरत पर जोर दिया गया था. एनपीसीआइ के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में यूपीआइ पर लगभग 241.6 अरब लेन-देन हुए, जिनका कुल मूल्य करीब 314.2 लाख करोड़ रुपये रहा.

पिछले वर्ष तक भारत के डिजिटल भुगतानों में यूपीआइ की हिस्सेदारी करीब 84 प्रतिशत थी. इतने बड़े पैमाने पर भुगतान निपटान, धोखाधड़ी से सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की लागत को अनिश्चितकाल तक बिना किसी अतिरिक्त आय के वहन करना सरकार के लिए राजकोषीय समस्या बन गया है, जिसका समाधान अब तलाशा जा रहा है. तर्क यह है कि इतने बड़े आर्थिक कारोबार को नवाचार और पुनर्निवेश के लिए लगातार वित्त उपलब्ध कराने के वास्ते लाभ की व्यवस्था की जरूरत है. समझना जरूरी है कि संशोधन में क्या तय हो चुका है और क्या अभी केवल संभावित प्रस्ताव के तौर पर है. तय बात यह है कि धारा 10ए में किया गया संशोधन अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर एमडीआर लगाने की व्यापक कानूनी रोक को हटा देता है.

हालांकि, आयकर अधिनियम की धारा 269एसयू के तहत बड़े कारोबारों के लिए, यानी जिनका वार्षिक कारोबार 50 करोड़ रुपये से अधिक है, अब भी कुछ निर्धारित डिजिटल भुगतान माध्यम उपलब्ध कराना अनिवार्य है. इनमें रुपे डेबिट कार्ड और भीम-यूपीआइ क्यूआर कोड शामिल हैं और इनका इस्तेमाल ग्राहक के लिए नि:शुल्क होना चाहिए. पचास करोड़ रुपये की यह सीमा अब भी अपरिवर्तित है. कई रिपोर्टों में 0.04 प्रतिशत से 0.07 प्रतिशत के बीच एमडीआर लगाने के प्रस्ताव का उल्लेख किया गया है. यह शुल्क उन व्यापारियों पर लागू हो सकता है, जिनका वार्षिक कारोबार लगभग एक से चार करोड़ रुपये के बीच है. यदि ऐसा होता है, तो भी यह पहले लागू होने वाले एक से तीन प्रतिशत के एमडीआर की तुलना में काफी कम होगा, जो ऐतिहासिक रूप से क्रेडिट कार्ड और गैर-रुपे डेबिट कार्ड पर लिया जाता था.

पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया जैसे उद्योग संगठनों ने अलग से बड़े व्यापारियों पर 0.3 प्रतिशत एमडीआर लगाने की मांग की है. छह अगस्त को वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी एमडीआर केवल व्यापारियों पर लागू होगा, अंतिम उपयोगकर्ताओं पर नहीं. इसका उद्देश्य बैंकों और वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों को बुनियादी ढांचे, नवाचार और सुरक्षा में निवेश करने के लिए संसाधन उपलब्ध कराना है. फिलहाल सरकार ने जोर देकर कहा है कि इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. छोटे व्यापारियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा. पचास करोड़ या उससे कम वार्षिक कारोबार वाले कारोबारों के लिए धारा 269एसयू के तहत मिली छूट बरकरार रहेगी.

इसके अतिरिक्त, 2,000 रुपये तक के लेनदेन के मूल्य पर बैंकों को 0.15 प्रतिशत तक की प्रतिपूर्ति देने वाली मौजूदा प्रोत्साहन योजना भी जारी रहेगी. बैंक और भुगतान प्रणाली प्रदाताओं को शुल्क के रूप में आय का एक स्रोत मिलेगा, भले ही यह राशि छोटी हो. इससे अब तक सरकारी खजाने से पूरी तरह वहन किये जा रहे लेनदेन प्रसंस्करण, निपटान और बुनियादी ढांचे की लागत को पूरा करने में मदद मिलेगी. वास्तविक दबाव बड़े व्यापारी वर्ग पर ही पड़ेगा. जनवरी, 2020 से यूपीआइ और रुपे पर शून्य एमडीआर का लाभ लेने वाले इस वर्ग के सामने अब शुल्क दोबारा लागू होने की संभावना है. प्रतिशत के लिहाज से यह शुल्क भले छोटा हो, लेकिन छह वर्षों तक मुफ्त रही भुगतान व्यवस्था में यह एक वास्तविक बदलाव होगा. यह संशोधन प्रक्रियात्मक है, अंतिम निर्णय नहीं. लेकिन इसने यूपीआइ पर एमडीआर लागू करने का कानूनी रास्ता तो खोल ही दिया है. (ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)


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लेखक के बारे में

By अभिजीत मुखोपाध्याय

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
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