पृथ्वी का संरक्षण

केवल इसी सदी में सूखे की संख्या एवं अवधि में 29 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है.

अंतरराष्ट्रीय मातृ पृथ्वी दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर हमें अपने जीवन के रूप में मिले सौभाग्य के लिए धरती के प्रति आभार व्यक्त करते हुए यह भी सोचना चाहिए कि पृथ्वी आज किन संकटों का सामना कर रही है, उन संकटों के लिए हम यानी मनुष्य कितना दोषी है तथा उन संकटों के समाधान के लिए हमें क्या करना चाहिए.

वर्ष 1970 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य यही था कि लोगों में धरती की बेहतरी और पर्यावरण संरक्षण के लिए चेतना बढ़े. वर्ष 2009 में इस दिवस को अंतरराष्ट्रीय मातृ पृथ्वी दिवस नाम दिया गया. निश्चित रूप से मनुष्य समेत सभी जीवों और वनस्पतियों के लिए धरती माता ही है. पृथ्वी ही एकमात्र ग्रह है, जहां जीवन है. आज इसके समक्ष तीन गंभीर चुनौतियां हैं- जलवायु परिवर्तन, प्रकृति एवं जैव-विविधता का ह्रास तथा प्रदूषण एवं कचरा. इन संकटों के कारण आज दस लाख से अधिक जंतु, पेड़-पौधे और अन्य जीव विलुप्त होने की कगार पर हैं. धरती के तापमान में निरंतर बढ़ोतरी मनुष्य और तमाम जीवों, पेड़-पौधों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है.

यद्यपि तापमान कम करने, उत्सर्जन घटाने, स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन एवं उपभोग बढ़ाने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक प्रयास हो रहे हैं, पर ये कोशिशें पर्याप्त नहीं हैं. संकट की गंभीरता को देखते हुए व्यापक सक्रियता की आवश्यकता है. केवल इसी सदी में सूखे की संख्या एवं अवधि में 29 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है. जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती जा रही हैं. पिछले साल हमारे देश में लगभग हर दिन किसी-न-किसी हिस्से में प्राकृतिक आपदा घटित हुई थी.

मनुष्य एवं पशुओं के लिए भोजन की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. मिट्टी एवं पानी के अत्यधिक दोहन और रसायनों के बेतहाशा इस्तेमाल के कारण दुनिया में दो अरब हेक्टेयर से अधिक भूमि का क्षरण हो चुका है. वनों का विस्तार सिमट रहा है, नदियों, जलाशयों और भूजल के स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है. हर साल 43 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन और उपयोग हो रहा है, जिसका दो-तिहाई हिस्सा कचरे में चला जाता है.

स्थिति यह है कि वह कचरा हमारे खाने-पीने की चीजों में घातक तत्वों के रूप में मिलने लगा है. जल, वायु एवं भूमि के प्रदूषण से बड़ा स्वास्थ्य संकट हमारे सामने है. दुनिया की 99 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या असुरक्षित हवा में सांस लेने के लिए विवश है. समस्याओं की यह सूची अंतहीन है, लेकिन सरकारों, उद्योगों, विभिन्न संस्थाओं के साथ-साथ आपकी और हमारी व्यक्तिगत भागीदारी से इनका समाधान भी संभव है. प्लास्टिक और जीवाश्म ईंधनों पर हम अपनी निर्भरता को घटा सकते हैं. मोटे अन���जों के उपभोग से और पेड़-पौधे लगाकर हम योगदान दे सकते हैं. हमें सचेत और सक्रिय होने की आवश्यकता है.

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Published by: संपादकीय

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