जी-7 में प्रधानमंत्री

अनेक मुद्दों पर असहमतियों के बावजूद विकसित देश यह स्वीकार करते हैं कि वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में भारत को साथ लेना ही होगा.

जर्मनी में आयोजित दुनिया के सबसे विकसित सात देशों- अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान- के महत्वपूर्ण शिखर बैठक में कुछ अन्य आमंत्रित देशों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भागीदारी की है. वर्ष 2014 से उन्हें तीन बार इस समूह की बैठक में आमंत्रित किया जा चुका है. यह निश्चित ही वैश्विक समुदाय में भारत के बढ़ते महत्व का परिचायक है.

जी-7 के नेताओं के साथ-साथ अन्य आमंत्रित देशों- अर्जेंटीना, सेनेगल, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका के शीर्ष नेतृत्व के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी वार्ताएं कर रहे हैं. इस बैठक में यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक भी हिस्सा ले रहे हैं. इस शक्तिशाली समूह द्वारा भारत को आमंत्रित किया जाना इस बात का सूचक है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं भारत को एक निकट सहयोगी के रूप में देखने के साथ वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में उसकी उल्लेखनीय भूमिका को भी स्वीकार करती हैं.

भारत न केवल जी-7 की बैठकों में नियमित रूप से आमंत्रित किया जाता रहा है, बल्कि वह क्वाड, आई2यूटू, ब्रिक्स आदि समूहों का भी सदस्य है. हाल के समय में विदेश मंत्री समेत कई भारतीय कूटनीतिकों ने विभिन्न देशों की यात्राएं की हैं तथा अनेक देशों के नेताओं ने भी भारत का दौरा किया है. इससे स्पष्ट है कि आज भारत की वैश्विक प्रासंगिकता स्थापित हो चुकी है.

महामारी, आपूर्ति शृंखला में अवरोध, वैश्विक अर्थव्यवस्था एवं भू-राजनीति में हलचल के इस दौर में भारत अपने राष्ट्रीय हितों तथा वैश्विक शांति एवं स्थिरता के लिए लगातार प्रयासरत है. जी-7 की बैठक रूस-यूक्रेन युद्ध तथा इससे उत्पन्न ऊर्जा और खाद्य संकट पर केंद्रित है. भारत समेत दुनिया के अधिकतर देश उच्च मुद्रास्फीति का सामना कर रहे हैं.

यद्यपि भारत ने रूस के हमले को सही नहीं ठहराया और बातचीत से तनाव खत्म करने की पैरोकारी की, पर पश्चिमी देश इससे संतुष्ट नहीं थे. युद्ध के प्रारंभिक दिनों में रूस की निंदा करने और पश्चिम का साथ देने के लिए भारत पर बड़ा दबाव था. पर भारत ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि हम अपने राष्ट्रहित और रणनीतिक हितों के अनुरूप चलेंगे. इस आमंत्रण से ऐसा प्रतीत होता है कि जी-7 के सदस्य देश भारत की समझ से संतुष्ट है.

भारत द्वारा अनाज मुहैया कराने का मुद्दा भी इस आयोजन में बातचीत का एक हिस्सा हो सकता है. बहरहाल, यह घरेलू खाद्य सुरक्षा तथा मुद्रास्फीति रोकने से जुड़ा एक तात्कालिक उपाय है. मुख्य बात यह है कि अनेक मुद्दों पर असहमतियों के बावजूद विकसित देश यह स्वीकार करते हैं कि दुनिया के सामने खड़ीं चुनौतियों का सामना करने में भारत को साथ लेना ही होगा. विश्व अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के अलावा सबसे अहम मसला जलवायु संकट से संबद्ध है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर भारत के अनुभवों और योजनाओं को बैठक में रखा है.

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