गरीबी उन्मूलन के साथ रोजगार सृजन भी हो

Poverty Alleviation : भारत के 7.5 करोड़ अत्यधिक गरीब लोग इसका नौ प्रतिशत हैं. चूंकि वैश्विक आबादी में भारत की हिस्सेदारी इसका लगभग दोगुना (यानी 18 प्रतिशत) है, ऐसे में यह संतोषजनक तथ्य है कि गरीबी उन्मूलन में भारत का रिकॉर्ड वैश्विक औसत से बेहतर है.

Poverty Alleviation : विश्व बैंक के हालिया आकलन के मुताबिक, भारत में अत्यधिक गरीब लोग 2011-12 के 34.4 करोड़ से घटकर 2022-23 में 7.5 करोड़ रह गये. यानी ग्यारह साल में 26.9 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकल गये. यह प्रभावी और प्रशंसनीय आंकड़ा है. अत्यधिक गरीबी एक तकनीकी शब्दावली है, जिसका संबंध लोगों की क्रयशक्ति से है. हालांकि 2021 में गरीबी रेखा से संबंधित मानक बदल कर तीन डॉलर दैनिक कर दिया गया था. गरीबी से संबंधित एक और बहुआयामी गरीबी सूचकांक को देखते हुए गरीबी रेखा का मानक बदलना जरूरी था. गैर तकनीकी शब्दावली में देखें, तो विश्व बैंक के मुताबिक अत्यधिक गरीबी का मतलब इतनी कम आय से है, जिससे भोजन, स्वच्छ पेयजल, आवास और बुनियादी स्वास्थ्यसेवा जैसी दैनिक जरूरतें पूरी न हो पाती हों.


इतनी कम आय का अर्थ है भूखे रहना, कुपोषण, स्वच्छता का अभाव और बुनियादी प्राथमिक शिक्षा तथा बुनियादी स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच का न होना. यह स्थिति और खराब हो जाये, तो भुखमरी के हालात पैदा हो सकते हैं. यानी विश्व बैंक का ही आंकड़ा देखें, तो भारत में अत्यधिक गरीब लोग अब भी जनसंख्या का 5.3 प्रतिशत हैं. चूंकि देश में 2011 के बाद जनगणना नहीं हुई है, ऐसे में, आबादी का ठीक-ठीक आंकड़ा या अत्यधिक गरीबों की वास्तविक संख्या के बारे में हमारे पास सटीक आंकड़ा नहीं है. लेकिन अनुमान तो लगाया ही जा सकता है. दुनिया में 83.8 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में दिन बिता रहे हैं.

भारत के 7.5 करोड़ अत्यधिक गरीब लोग इसका नौ प्रतिशत हैं. चूंकि वैश्विक आबादी में भारत की हिस्सेदारी इसका लगभग दोगुना (यानी 18 प्रतिशत) है, ऐसे में यह संतोषजनक तथ्य है कि गरीबी उन्मूलन में भारत का रिकॉर्ड वैश्विक औसत से बेहतर है. हालांकि आंकड़ों के आधार पर देखें, तो नाइजीरिया के बाद भारत में ही अत्यधिक गरीबों की आबादी सबसे अधिक है. भारत की विशाल आबादी को देखते हुए यह आंकड़ा भले न चौंकाता हो, लेकिन याद रखना चाहिए कि चीन में अत्यधिक गरीबों का आंकड़ा शून्य है.

चीन का कहना है कि 2020 में वह अत्यधिक गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य पूरा कर चुका है. संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में टिकाऊ विकास लक्ष्यों की घोषणा की थी, जिसका पहला ही लक्ष्य 2030 तक अत्यधिक गरीबी का उन्मूलन है. इस तरह अत्यधिक गरीबी को पूरी तरह खत्म कर देने के लिए हमारे पास पांच ही वर्ष बचे हैं. याद रखना चाहिए कि अत्यधिक गरीबी को मापने के लिए जो गरीबी रेखा है, उसका मानक 2.15 डॉलर दैनिक आय से बढ़ाकर तीन डॉलर कर दिया गया है. दैनिक आय की निचली सीमा के तहत 2023 के मुताबिक, भारत में 3.37 करोड़ लोग अत्यधिक गरीब हैं. हालांकि तीन डॉलर दैनिक की आय ज्यादा सही है, क्योंकि निम्न आय वाले तमाम देशों की गरीबी रेखा के आधार पर इसे निर्धारित किया गया है.


एमपीआइ (बहुआयामी गरीबी सूचकांक) अत्यधिक गरीबी को मापने के लिए ज्यादा उपयुक्त है, जिसे यूएनडीपी और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलेपमेंट इनीशिएटिव ने विकसित किया है. स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर को मापने के इसके 10 पैमाने हैं, जिनमें बाल मृत्यु दर, रसोई में इस्तेमाल किया जाने वाले तेल तथा साफ-सफाई और स्वच्छ पेयजल की पहुंच आदि हैं. जबकि अपने यहां नीति आयोग ने 10 की जगह 12 पैमाने तय किये हैं, जिनमें मातृ स्वास्थ्य और बैंक खाता भी शामिल हैं. नीति आयोग के अध्ययन की मानें, तो भारत का एमपीआइ 2013-14 के 29 फीसदी से घटकर 2022-23 में 11.3 फीसदी रह गया है. इस अध्ययन के अनुसार, लगभग 24.8 करोड़ लोग एमपीआइ से बाहर निकल चुके हैं. यूएनडीपी के अनुसार, जो अत्यधिक गरीबी मापने के लिए 10 मानकों का इस्तेमाल करता है, 2019-21 में भारत की एमपीआइ गरीबी दर 15 फीसदी थी, जो नीति आयोग की गणना से चार प्रतिशत अधिक थी. यूएनडीपी के 2021-22 के एमपीआइ अनुपात के अनुसार, भारत 109 देशों की सूची में 66 वें स्थान पर था. नीति आयोग की एमपीआइ गरीबी दर की तुलना में यूएनडीपी द्वारा जारी एमपीआइ गरीबी दर के अधिक होने से विवाद पैदा हुआ.


आंकड़ों और विवादों से परे हटकर देखें, तो यह साफ है कि उच्च आर्थिक वृद्धि दर से देश के तमाम लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो रहा है. विश्व बैंक ने यह रेखांकित किया है कि भारत में जितने भी लोग अत्यधिक गरीबी में गुजर-बसर कर रहे हैं, उनका दो-तिहाई पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में हैं. जाहिर है कि पिछले करीब बारह साल में इन पांचों राज्यों में जीवन स्तर को बेहतर करने की काफी कोशिशें हुईं और जो सफल भी रहीं. पिछले पांच साल से 81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने की सरकारी योजना, जिसे अगले पांच साल तक के लिए बढ़ा दिया गया है, गरीबी उन्मूलन में बेहद लाभकारी साबित हुई है. इसके अलावा स्वास्थ्य बीमा तथा जल मिशन जैसे सरकारी अभियान भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए हैं.


हालांकि गरीबी रेखा से बाहर निकल आने का अर्थ स्थायी रूप से उससे बाहर हो जाना कतई नहीं है. अगर जीविका अनिश्चित हो, तो बीमारी या परिवार में मौत या नौकरी चले जाने पर कोई दोबारा गरीबी रेखा के नीचे जा सकता है. ऐसे में, हमें सार्थक और सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा बनाये रखने की सतत कोशिशें करनी चाहिए. चूंकि वित्तीय संसाधन सीमित हैं और सरकारी खर्च को अंधाधुंध तरीके से बढ़ाया नहीं जा सकता, ऐसे में, सामाजिक सुरक्षा के दायरे का विस्तार करने के लिए सरकारी खर्च को दूरदर्शिता से समायोजित करना चाहिए. सामाजिक सुरक्षा की बहाली लोकप्रियतावादी तरीके से संभव नहीं है. ऐसे में, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन से ही नागरिकों के जीवन स्तर को लगातार उन्नत किया जा सकता है. सतत रोजगार सृजन के लिए जहां हजारों छोटे उद्यमों का सृजन जरूरी है, बृहत पैमाने पर कौशल विकास और प्रशिक्षण भी उतना ही आवश्यक है. इन सारे लक्ष्यों की पूर्ति एआइ, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन जैसी उन चुनौतियों के बीच की जानी है, जो अब रोजगार के लिए खतरा बन रही हैं. अत्यधिक गरीबी उन्मूलन के बाद जल्दी ही हमें तुलनात्मक या सापेक्ष गरीबी तथा असमानता मिटाने के लिए कदम उठाना होगा, क्योंकि उच्च आर्थिक विकास का लाभ शीर्ष पर मौजूद कुछ खास लोगों को लेने नहीं दिया जा सकता. अगले पांच वर्षों में अत्यधिक गरीबी को खत्म करने का लक्ष्य उत्साहवर्धक है, पर विकसित राष्ट्र बनने के लिए हमें अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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