व्यापक था पंडित नेहरू का व्यक्तित्व

नेहरू ने ऐसा आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत बनाया था, जिसे टिके रहना था. गणतंत्र के आरंभिक वर्षों में उनका नेतृत्व मिलना भारत का सौभाग्य था. नेहरू का व्यक्तित्व व्यापक बौद्धिकता और दूरदृष्टि से संपन्न था.

आज से 60 वर्ष पूर्व 27 मई 1964 को जब जवाहरलाल नेहरू का देहांत हुआ, तब वे 74 वर्ष के थे. वह क्षण मुझे अच्छी तरह से याद है, जब उनकी मृत्यु का समाचार आया. तब मैं पुणे के गोएटे इंस्टीट्यूट में जर्मन भाषा सीख रहा था और उस दिन दोपहर बाद साइकिल से एक दोस्त से मिलने जा रहा था. नेहरू की मृत्यु का समाचार पाकर मुझे बड़ा आघात लगा.

हालांकि उनके संभावित उत्तराधिकारियों के बारे में कई अनुमानों के बारे में मैंने पढ़ा था, पर बहुत सारे युवा भारतीयों की तरह मैं भी नेहरू के बिना भारत की कल्पना नहीं करना चाहता था. उस विषय पर एक लोकप्रिय किताब अमेरिकी पत्रकार वेलेस हैंजेन ने लिखी थी- ‘आफ्टर नेहरू हू?’ यानी नेहरू के बाद कौन? उन्होंने लिखा है कि कई लोगों, जो मानते थे कि नेहरू की जगह किसी और को लाने का समय आ गया है, ने यह माना कि विभाजन के बाद के प्रारंभिक दिनों में नेहरू ही देश को एक रख सकते थे. बहुत से लोग मानने लगे थे, खासकर 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद, कि नेहरू के होने का उद्देश्य पूरा हो चुका है.

हालांकि गुलजारीलाल नंदा को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था, पर उत्तराधिकारी के रूप में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था. देर रात तक कई आशंकाएं तारी हो रही थीं. एक आशंका यह थी कि सेना सत्ता अपने हाथ में ले लेगी. यह भी भय व्याप्त था कि कम्युनिस्ट या अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए तख्तापलट को अंजाम दे सकते हैं. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. नेहरू ने ऐसा आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत बनाया था, जिसे टिके रहना था. गणतंत्र के आरंभिक वर्षों में उनका नेतृत्व मिलना भारत का सौभाग्य था. हमारी उपलब्धियां बेहतर हो सकती थीं, पर हम बदतर भी हो सकते थे, जैसा कि हमारे जैसी स्थिति में कई देशों के साथ हुआ. आधुनिक भारत के आधारभूत दर्शन के विरुद्ध चल रहे झंझावातों के बावजूद नेहरू और राष्ट्रनिर्माताओं द्वारा गढ़ा गया भारत आज भी अस्तित्व में है. नेहरू का व्यक्तित्व व्यापक बौद्धिकता और दूरदृष्टि से संपन्न था. जिन लोगों ने ‘भारत की खोज’ पढ़ी है, वे इस बात से असहमत नहीं हो सकते.

उन्होंने हमारे लिए एक नयी पूर्ण समावेशी राष्ट्रीयता गढ़ने का प्रयास किया. मैं इसे सरल शब्दों में विश्लेषित करने का अक्सर प्रयास करता हूं. यह मदुरै के मीनाक्षी मंदिर, आगरा के ताजमहल या अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को समान रूप से अपनी धरोहर बनाना है. सारे आक्रमण या प्रवासन, सभी वाद्य यंत्र और सभी प्रकार के संगीत और भारत में फली-फूली हर साहित्यिक शैली समान रूप से हम सभी की हैं. राग और गजल उसी तरह हमारे हैं, जैसे भीमसेन जोशी और बेगम अख्तर हमारे अपने हैं.

नेहरू ने गलतियां की. जब बड़े लोगों से भूलें होती हैं, तो वे अक्सर बहुत बड़ी होती हैं. उन्होंने चीन के साथ विवाद के स्वरूप को ठीक से नहीं समझा. उन्होंने अर्थव्यवस्था को केंद्रीय योजना की रस्सियों से जकड़ दिया. इससे हमें एक औद्योगिक आधार तो मिला, पर बड़ी संख्या में अयोग्य घनकुबेर भी पैदा हुए. लेकिन उनकी दृष्टि व्यापक थी. उन्हें भरोसा था कि नया भारत तर्क से निर्देशित होगा तथा उसमें वैज्ञानिक प्रवृत्ति होगी. किंतु हम निरंतर रूढ़ियों और अंध श्रद्धा से संचालित लोग होते जा रहे हैं, जिससे सामाजिक संघर्ष बढ़ रहा है तथा सार्वजनिक व्यवहार एवं व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.

हाल के वर्षों में नेहरू की स्मृति पर हमले तीक्ष्ण होते गये हैं, जिनकी अगुवाई ऐसे तुच्छ लोग कर रहे हैं, जिन्हें इतिहास का पता नहीं है, वे विज्ञान नहीं जानते. वे हमारी पहचान को संकीर्णता एवं विभाजन के सहारे परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. हमारी निरंतर आर्थिक मुश्किलें और जम्मू-कश्मीर की समस्या नेहरू की स्मृति को दुत्कारने का सरल बहाना बन जाती हैं. अज्ञानी और घृणा से भरे नेताओं के हाथ में ये घटक हथियार हो जाती हैं, भले वे चाहे जितनी झूठ हों. यह झूठ भी लगातार फैलाया जाता है कि प्रधानमंत्री बनने की नेहरू की चाह भारत के विभाजन का कारण बनी.

यह देखना दुखद है कि आजकल नेहरू के पक्षधर कम हैं. अपने दौर में मैंने नेहरू की लगातार आलोचना की है, फिर भी मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि कई शताब्दियों में वे देश के महानतम राजनेता थे. यह हमारा सौभाग्य है कि स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक वर्षों में हमें उनका नेतृत्व मिला. हम भारत के लोग हैं, और हम अभी भी उसी घर में रहते हैं, जिसे नेहरू ने बनाया था.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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