स्मृति शेष : बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे लॉर्ड मेघनाद देसाई

Lord Meghnad Desai : वह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में ही मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली थी. सच तो यह है कि भारत के गुजरात, वडोदरा से शुरू हुआ उनका यह सफर ब्रिटेन के शिक्षक और शैक्षिक गलियारों में इस तरह छा गया कि पूरा ब्रिटेन उनका मुरीद हो गया और फिर उन्हें लॉर्ड की उपाधि से नवाज दिया.

Lord Meghnad Desai : बहुमुखी प्रतिभा के धनी लॉर्ड मेघनाद देसाई अब इस दुनिया में नहीं रहे. 29 जुलाई, 2025 की रात उनका 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनके चले जाने से सांस्कृतिक संबंधों के साथ-साथ आर्थिक फलक पर भी एक युग का अंत हो गया है. उनके इस तरह अचानक रुखसत हो जाने से भारतीय सांस्कृतिक और राजनीतिक दायरे में सन्नाटा-सा पसर गया है. लॉर्ड देसाई भारत की मिट्टी से जुड़ाव रखने वाले अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी थे. वे अपने पीछे जो विरासत छोड़ गये हैं, उनमें उनकी दोस्ती का लंबा सिलसिला भी शामिल है. वह शोध और राजनीति के साथ-साथ, दुनिया के नये विकल्पों में आर्थिक मसलों का हल क्या हो, इस पर एक दूरदर्शी सोच रखने वाले विद्वान थे. मेघनाद देसाई के जाने से साहित्य, शोध, संस्कृति, राजनीति एवं अर्थशास्त्र के नये शोध संवादों को विराम लग गया है.


वह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में ही मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली थी. सच तो यह है कि भारत के गुजरात, वडोदरा से शुरू हुआ उनका यह सफर ब्रिटेन के शिक्षक और शैक्षिक गलियारों में इस तरह छा गया कि पूरा ब्रिटेन उनका मुरीद हो गया और फिर उन्हें लॉर्ड की उपाधि से नवाज दिया. मेघनाथ देसाई दुनिया के एकमात्र ऐसे आर्थिक वैज्ञानिक थे, जो आर्थिक मुद्दों और दुनिया की नीतियों को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ कर तथा वर्तमान दुनिया में हो रहे बदलावों के धरातल पर रख कर देखते थे. इसलिए, पूरी दुनिया में एक आर्थिक विशेषज्ञ के तौर पर उनकी काफी मांग रहती थी. भारत के अर्थशास्त्र और राजनीति में बेहद गहरी रुचि रखने के साथ समय-समय पर वे इसके संवाहक भी बने. उन्होंने अपनी इस अनोखी व गहरी समझ के कारण भारत-ब्रिटेन संबंधों को जिस तरह की मजबूती दी, वह अद्भुत है. उनके निधन से सहज प्रवृत्ति वाला एक दोस्त तथा भारतीय मिट्टी को प्यार करने वाला, उसकी संस्कृति को गहराई से चाहने वाला, कद्रदान चला गया है.


मेघनाद जगदीशचंद्र देसाई, बैरन देसाई, उर्फ लॉर्ड देसाई के नाम से प्रसिद्ध मेघनाद का जन्म 10 जुलाई, 1940 को वडोदरा, बड़ौदा राज्य (आज के गुजरात) में हुआ था. वहीं वे पले-बढ़े. बाद में पढ़ाई के लिए उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय का रुख किया और फिर पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. इसके बाद वह एकेडमिक्स से जुड़ गये. वर्ष 1965 से 2003 तक लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसइ) में इकोनॉमिक्स के प्राध्यापक भी रहे. लॉर्ड देसाई को सेंटर फॉर ग्लोबल गवर्नेंस की नींव रखने वाले अर्थशास्त्र के शिक्षक के रूप में भी जाना जाता है. वर्ष 1992 में उन्होंने इसकी स्थापना की थी. वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के डेवलपमेंट स्टडीज के निदेशक भी रहे. अपने लंबे शोध कार्य में उन्होंने ब्रिटेन, अमेरिका तथा एशियाई देशों में जिस विकास और मार्क्सवादी वैश्वीकरण तथा बाजार का जिक्र किया, वह अद्भुत है.


लॉर्ड देसाई ने कई पुस्तकें भी लिखीं, जो बेहद चर्चित रही हैं. उनकी कुछ बेहद चर्चित पुस्तकों में ‘मार्क्सियन इकोनॉमिक थ्योरी’, ‘मार्क्स रिवेंज : द रिसर्जेंस ऑफ कैपिटलिज्म एंड द डेथ ऑफ स्टेटिस्ट सोशलिज्म’, ‘अप्लाइड इकोनोमेट्रिक्स’, ‘रीडिस्कवरी ऑफ इंडिया’ आदि शामिल हैं. इन पुस्तकों ने उन्हें विश्व स्तर पर प्रसिद्ध किया. उन्होंने ‘हू रोट द भगवदगीता’ और ‘नेहरूज हीरो’ जैसी पुस्तकें भी लिखीं, जो काफी पसंद की गयीं. लार्ड देसाई ने ब्रिटिश ‘साप्ताहिक ट्रिब्यून’, भारतीय बिजनेस दैनिक ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ व ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ में नियमित रूप से स्तंभ भी लिखे. वर्ष 1984 से 1991 तक वे ‘जर्नल ऑफ अप्लाइड इकोनोमेट्रिक्स’ के सह-संपादक भी रहे. उनके चुनिंदा अकादमिक शोध पत्र 1995 में ‘मेघनाद देसाई के चयनित निबंध’ नाम से दो खंडों में प्रकाशित हुए. राजनीतिक करियर की बात करें, तो देसाई ब्रिटिश लेबर पार्टी में सक्रिय रहे. वे 1971 में लेबर पार्टी में शामिल हुए थे. वर्ष 1986 और 1992 के बीच उसके अध्यक्ष बने. जून 1991 में उन्हें लेबर पार्टी के सदस्य के रूप में हाउस ऑफ लॉर्ड्स में नियुक्त किया गया. नवंबर 2020 में यहूदी विरोधी चिंताओं के कारण उन्होंने लेबर पार्टी की सदस्यता छोड़ दी.


मुझे उनसे लंदन तथा दिल्ली में कई बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. वे अद्भुत शिक्षक तथा चुंबकीय प्राण ऊर्जा से भरे हुए ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनसे हर मुलाकात में कुछ सीखा जा सकता था. वे एक खुशमिजाज और रोमांस व रोमांच से भरे हुए व्यक्तित्व थे. उन्होंने 1970 में एलएसइ (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स) की अपनी सहकर्मी गेल विल्सन से विवाह किया था. यह भी संयोग ही है कि ‘नेहरूज हीरो’ लिखते समय 2004 में देसाई की मुलाकात किश्वर अहलूवालिया से हुई, जो इस पुस्तक की संपादक भी हैं, वह उनकी दूसरी पत्नी बनीं. उनका जीवन मुस्कुराहटों से भरा हुआ था. वह दोस्तों के दोस्त थे. उनके जाने से ऐसी क्षति हुई है जिसकी भरपाई आने वाले दिनों में बहुत मुश्किल है, क्योंकि मेघनाद देसाई जैसे व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेते हैं. बहुत याद आयेंगे लॉर्ड मेघनाद देसाई आप.

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