कड़ी कार्रवाई के बिना नहीं रुकेंगे नाइट क्लब हादसे, पढ़ें उमेश चतुर्वेदी का आलेख

Nightclub incidents : भारत में नियमावलियां तो खूब बनायी गयी हैं. पर वे केवल दस्तावेजों के लिए हैं. जिन पर इन नियमावलियों को लागू करने की जिम्मेदारी है, इन्हें तोड़ने वालों को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत दंडित करने-कराने की जवाबदेही है, वे अक्सर इनसे आंखें मूंद लेते हैं.

Nightclub incidents : उत्तर भारत की सर्दियां गोवा के लिए वरदान होती हैं. अरब सागर तटीय इस राज्य में सर्दियों में उत्तर भारतीय सैलानियों की आवक बढ़ जाती है. परंतु गोवा में वर्ष के अंतिम दिनों और अगले वर्ष की छुट्टियां मनाने का मन बना चुके सैलानियों में इस बार हिचक हो सकती है. वजह है वहां के मशहूर नाइट क्लब ’बर्क बाय रोमियो लेन’ में लगी आग, जिसमें पांच सैलानी समेत पच्चीस लोगों की दर्दनाक मौत हो गयी है. गोवा के इस नाइट क्लब में लगी आग और उसमें गयी निर्दोष जान ने सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न उस प्रशासनिक तंत्र पर लगाया है, जिस पर इस हादसे की रोकथाम की जिम्मेदारी थी. बताया जा रहा है कि अनधिकृत ढंग से इस नाइट क्लब का निर्माण किया गया था. इस अनधिकृत निर्माण को तोड़ने के लिए गोवा की संबंधित पंचायत ने निर्देश भी दे रखा है. आग लगने की दशा में उसके रोकथाम और बचाव को लेकर नाइट क्लब में कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं था. यह क्लब बेहद संकरी जगह पर है, जहां आसानी से जाना संभव नहीं है.


भारत में नियमावलियां तो खूब बनायी गयी हैं. पर वे केवल दस्तावेजों के लिए हैं. जिन पर इन नियमावलियों को लागू करने की जिम्मेदारी है, इन्हें तोड़ने वालों को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत दंडित करने-कराने की जवाबदेही है, वे अक्सर इनसे आंखें मूंद लेते हैं. कई बार नियम तोड़ने वालों से संबंध पलकों को मोड़ने का जरिया बनते हैं, तो कई बार रिश्वत की रकम का बोझ पलकों को झुकने के लिए मजबूर कर देता है. भारत के प्रशासनिक तंत्र का बड़ा हिस्सा इसी तरह की मानसिकता में काम करता है. वह दुर्घटनाओं और हादसों का इंतजार करता है. वह तभी जागता है, जब हादसे हो जाते हैं, मासूम जानें चली जाती हैं.

तब उसे नियमों की तेजी से याद आने लगती है. तब उसे अनधिकृत निर्माण भी दिखने लगता है, कार्रवाई की भी सूझने लगती है. कार्रवाई होती भी है. गोवा के इस क्लब के मालिकों पर भी होगी, पर इसका असर कितनी देर तक रहेगा, कहना मुश्किल है. क्योंकि वक्त बीतते-बीतते कार्रवाई में ढिलाई भी शुरू हो सकती है और यदि किसी सामाजिक संस्था, राजनीतिक व्यवस्था या न्यायिक व्यवस्था की निगाह उस पर नहीं पड़ी, तो कार्रवाई धीरे-धीरे टलती चली जायेगी, उसकी तासीर ठंडी होती जायेगी और फिर हो सकता है कि नियमों को तोड़ने वाले किसी और जगह नियम तोड़कर किसी और नाम से ऐसा ही नाइट क्लब चलाने लगें


भारत में अंग्रेजों ने प्रशासनिक ढांचा अपना राजकाज चलाने के लिए बनाया था. देखते-देखते यह तंत्र स्टील फ्रेम में तब्दील होता चला गया. संविधान सभा ने भारत के भावी प्रशासनिक तंत्र की रूपरेखा को लेकर गंभीर चर्चा की थी. उसका उद्देश्य एक ऐसा ढांचा तैयार करना था जो स्वतंत्र भारत के लिए प्रभावी, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति जवाबदेह हो. संविधान सभा के सदस्यों को आशंका थी कि भारत की भावी नौकरशाही भारतीय मूल्यों और भारतीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं हो पायेगी.

इसलिए संविधान सभा में तत्कालीन सदस्यों ने नौकरशाही की भूमिका पर न केवल व्यापक चर्चा की, बल्कि उसकी राजनीतिक तटस्थता, कार्यक्षमता, जवाबदेही और नये स्वतंत्र राष्ट्र के लोकतांत्रिक ढांचे में उसकी स्थिति सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया. प्रश्न है कि क्या संविधान सभा की बहसों के अनुरूप आज की नौकरशाही बन पायी है. उसके अधिकांश हिस्सों को देखिए, तो लगता है कि बिल्कुल नहीं. आज भी उसमें अंग्रेजी राज जैसी अकड़ है, उसका ध्यान ज्यादातर अपनी ताकत को बचाये रखने और उसके जरिये आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने पर है. बिना प्रशासनिक मिलीभगत के यह कल्पना बेकार है कि किसी नाइट क्लब में अवैध निर्माण होगा, वह संकरी गलियों में चलेगा और उसमें सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी होंगे.


हाल के दिनों में सड़कों पर बसों के आग का गोला बनने की घटनाएं भी बढ़ी हैं, अवैध निर्माण के खिलाफ बुलडोजर भी चले हैं. पर क्या खटारा बसें बिना प्रशासनिक मिलीभगत और लापरवाही के चल सकती हैं, क्या अवैध निर्माण बिना प्रशासनिक सहयोग के हो सकता है? नहीं. जब भी हादसे होते हैं, संबंधित बस मालिक के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है, अवैध निर्माण गिरा दिये जाते हैं. पर इन सबके लिए प्रशासनिक रूप से जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती.

जब भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के बिना कोई नाइट क्लब नियमों को तोड़ते हुए निर्माण नहीं करा सकता, रोकथाम के उपायों की अनदेखी नहीं कर सकता है, बिना तंत्र के सहयोग के कोई अवैध निर्माण नहीं कर सकता, बिना तंत्र की आंखें मूंदे कोई टूर ऑपरेटर खटारा बसों को सड़कों पर उतार नहीं सकता, तो उस तंत्र पर अंगुली क्यों न उठे, उस पर प्रहार क्यों न हो? जरूरत है कि अब हर गलत कार्य के लिए, गलत कार्य करने वाले, नियम तोड़ने वाले, कानून का उल्लंघन करने वाले को दोषी ठहराने की न्यायिक प्रक्रिया तो चले ही, इसके लिए परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार रहे अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाया जाये, उन्हें दंडित किया जाये. जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक देश में निर्दोष जानें जाती रहेंगी. पर लाख टके का प्रश्न यह है कि क्या इस तरीके से सोचने के लिए हमारा राजनीतिक ढांचा तैयार है?
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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