पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की जरूरत, पढ़ें अनिल त्रिगुणायत का आलेख

West Asia Peace: अमेरिका और ईरान ने फिर जिस तरह की आक्रामकता दिखायी, उससे आशंकाएं बढ़ गयी थीं, लेकिन अच्छी बात यह है कि दोनों शांति बहाली के प्रति गंभीर दिखते हैं. ईरान दरअसल स्थायी युद्धविराम चाहता है, जिसमें यह गारंटी हो कि अमेरिका-इस्राइल उस पर भविष्य में हमला नहीं करेंगे, क्योंकि अगर उसने अपने परमाणु कार्यक्रम से हाथ खींच लिया और उस पर हमला भी हो गया, तो उसकी मुसीबत बढ़ जायेगी. इसके बावजूद यह मानने का कारण है कि दोनों पक्ष संभावित समझौते के काफी करीब पहुंच रहे हैं.

West Asia Peace: अमेरिका और ईरान ने फिर जिस तरह की आक्रामकता दिखायी, उससे आशंकाएं बढ़ गयी थीं, लेकिन अच्छी बात यह है कि दोनों शांति बहाली के प्रति गंभीर दिखते हैं. पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरान के खिलाफ प्रमुख अमेरिकी सैन्य अभियानों की समाप्ति की घोषणा की. व्हाइट हाउस में उन्होंने पत्रकारों को यह बताया कि विगत 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किया गया ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ समाप्त हो गया है. उन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से यह कहा कि अमेरिका समझौता करना चाहता है. वह शांति का मार्ग अपनाना पसंद करता है और होर्मुज जलडमरुमध्य को खोलने पर चर्चा करना चाहता है, ताकि जनजीवन सामान्य हो सके.

अमेरिका ने अपने उस ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ पर भी रोक लगा दी है, जिसके जरिये वह सैन्य ताकत के बल पर होर्मुज को खोलने की कोशिश कर रहा था. उसने पिछले दिनों ईरान को एक शांति प्रस्ताव भेजा, जिसका मकसद तुरंत युद्धविराम लागू करना और अगले एक महीने के भीतर स्थायी समाधान की नींव रखना है. इस प्रस्ताव में 14 बिंदुओं का एक एमओयू यानी सहमति पत्र है और उम्मीद है कि उसी से सुलह का रोडमैप तैयार होगा और स्थायी शांति का रास्ता निकलेगा.

इस सहमति पत्र में तीन मुख्य बिंदु बताये जा रहे हैं- पहला यह कि वैश्विक व्यापार की जीवन रेखा कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरुमध्य को खोला जाये, दूसरा-ईरान परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी दे. और तीसरा, इसके बदले में अमेरिका ईरान पर लगे कुछ प्रतिबंध हटाने और ईरानी संपत्तियों में फंसे अरबों डॉलर जारी करने की प्रक्रिया शुरू करेगा. हालांकि समझौते की कई शर्तें आगे की बातचीत के नतीजों पर निर्भर करेगी. ऐसे में, पश्चिम एशिया में फिर से तनाव बढ़ने या लंबे समय तक अनिश्चितता बने रहने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. सप्ताह की शुरुआत में ही संयुक्त अरब अमीरात पर हुए हमले से यह आशंका बढ़ी ही, जिसमें भारतीय नागरिक भी घायल हुए. अमीरात पर हमला उसी दिन हुआ, जिस दिन अमेरिका ने होर्मुज में ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ की शुरुआत की.

आशंका जतायी गयी कि इसके बाद इस्राइल ईरान के निशाने पर हो सकता है. हालांकि ईरान का कहना है कि उसने अमीरात पर हमला नहीं किया है और ईरान के राष्ट्रपति ने इस हमले की तीखी निंदा की है. यह भी हो सकता है कि ईरान की सेना ने वह हमला किया. अगर ऐसा है, तो स्पष्ट है कि वहां राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में तालमेल का अभाव अब भी है. दरअसल अमीरात में ईरान की बड़ी आबादी रहती है. ऐसे में, इस्राइल से अमीरात की नजदीकी तेहरान बर्दाश्त नहीं कर सकता.

इस्राइल का आयरन डोम अमीरात की रक्षा कर रहा है. यह भी संभव है कि अमीरात पर हमला इस्राइल ने किया हो, क्योंकि वह यह कतई नहीं चाहता कि पश्चिम एशिया में शांति लौटे. जहां तक ईरान की बात है, तो वह स्थायी युद्धविराम चाहता है, जिसमें यह गारंटी हो कि अमेरिका-इस्राइल उस पर भविष्य में हमला नहीं करेंगे. क्योंकि अगर उसने अपने परमाणु कार्यक्रम से हाथ खींच लिया और उस पर हमला भी हो गया, तो उसकी मुसीबत बढ़ जायेगी.

जाहिर है कि अमेरिकी शर्तों को वह अपनी संप्रभुता से जोड़कर देख रहा है और बिना किसी ठोस गारंटी के पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है. अच्छी बात यह है कि होर्मुज को खुलवाने के लिए अमेरिका अब अपनी आक्रामकता से पीछे हट गया है और चीन जैसे देशों की भी मदद ले रहा है. इसी का नतीजा है कि अब चीन भी होर्मुज को खोले जाने और पश्चिम एशिया में पूर्ण युद्धविराम लागू करने की बात कह रहा है. यह अच्छा संकेत है. हाल ही में चीनी विदेश मंत्री ने बीजिंग आये ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ बातचीत के दौरान कहा कि होर्मुज के जरिये सामान्य एवं सुरक्षित आवागमन बहाल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा चिंता है.

चीन को उम्मीद है कि संबंधित पक्ष अंतरराष्ट्रीय समुदाय की इस अपील पर जल्द से जल्द प्रतिक्रिया देंगे. चीन न सिर्फ ईरान का करीबी सहयोगी है, बल्कि तेहरान के कच्चे तेल का बड़ा खरीदार भी है. डोनाल्ड ट्रंप भी इस सप्ताह चीन के दौरे पर जा रहे हैं और ये दोनों देश चाहते हैं कि ट्रंप की यात्रा से पहले पश्चिम एशिया का युद्ध समाप्त हो जाये. इस बीच फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भी ईरान के राष्ट्रपति के साथ बातचीत में होर्मुज जलडमरुमध्य में जहाजों की मुक्त आवाजाही के महत्व को दोहरा चुके हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए भी बेहतर यही है कि वह युद्धविराम पर गंभीरता दिखाएं. अभी तक इस युद्ध में ट्रंप के रवैये के कारण अमेरिका की किरकिरी ही हुई है. ईरान पर हमला करने के बाद से ट्रंप हर मोर्चे पर विफल साबित हुए हैं. न तो वह अपनी बातों पर टिके रह सके, न ही अपनी नीतियों पर. ट्रंप बार-बार ईरान से अपने परमाणु कार्यक्रम बंद करने की बात कह रहे हैं, लेकिन ईरान से परमाणु मुद्दे पर अमेरिका की बातचीत तो फरवरी में ही पूरी हो गयी थी. जाहिर है कि ट्रंप के रवैये से भ्रम बढ़ता है. ट्रंप के इसी रवैये के कारण यूरोप के देश अमेरिका से दूर छिटक गये हैं, और खाड़ी देश भी उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर रहे. दूसरी तरफ ईरान की बेहतर छवि बनी है. ऐसा माना गया है कि उसे निशाना बनाया गया है. और अब अमेरिका जिस तरह ईरान के साथ समझौता करने की कोशिश कर रहा है, उससे भी ईरान का पक्ष ही मजबूत हुआ है.

भले ही ईरान के नेतृत्व पर अमेरिका ने जबरदस्त चोट की हो, लेकिन न तो वहां सत्ता परिवर्तन हुआ, न परमाणु मिशन रुका और न ही बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम खत्म हुआ. उल्टे इस जंग ने ईरान को होर्मुज पर नियंत्रण का अवसर दे दिया. लिहाजा अमेरिका को अब स्थायी शांति की ओर कदम बढ़ाना चाहिए. वैसे तो तेहरान अब भी अमेरिका के युद्धविराम प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है, लेकिन अगले सप्ताह दोनों के बीच फिर वार्ता होने की उम्मीद है और यह मानने का कारण है कि दोनों पक्ष संभावित समझौते के काफी करीब पहुंच रहे हैं. ऐसे में, अमेरिका और ईरान से तो संयम की उम्मीद है ही, इसकी कोशिश होनी चाहिए कि इस्राइल को भी आक्रामकता से रोका जाए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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