नशामुक्त भारत के लिए मोदी सरकार का राष्ट्रीय संकल्प

Drug Free India: केंद्र की मोदी सरकार ने 2047 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य रखा है. गृह मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडीकेट, तस्करी, डार्कनेट और सीमापार नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई कर रहा है. राज्यों, एजेंसियों और नागरिकों के सहयोग से व्यापक अभियान चलाया जा रहा है.

Drug Free India: मौज मस्ती से शुरू नशे की लत जिंदगी के साथ साथ देश के लिए भी कितनी घातक हो सकती है, इसका अंदाज लगाना अब किसी के लिए कठिन नहीं रहा. हर दिन, अरबों डॉलर का अवैध हस्तांतरण कई देशों की अर्थव्यवस्था खराब कर रहा है तो हर दिन सैकड़ों जीवन भी अत्यधिक नशे के कारण असमय समाप्त हो रहा है. नशे का कारोबार हर महाद्वीप में फैल चुका है और इसके कारण पूरे विश्व में हिंसा भी बढ़ रही है. आज नशे के जिन पदार्थों का सेवन किया जा रहा है और जिन भौगोलिक क्षेत्रों में किया जा रहा है, उसे सुन और जानकार होश उड़ जा रहे हैं. भारत भी इससे अछूता नहीं है.

ड्रग कारोबार के लिए बदनाम गोल्डन ट्रायंगल के नाम से मशहूर म्यांमार, लाओस और थाईलैंड से हो रही आपूर्ति और ड्रग उत्पादन के मामले में कुख्यात गोल्डन क्रिसेंट , जिनमें अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान शामिल हैं, के साथ हमारी भौगोलिक नजदीकियाँ भी मादक पदार्थों की उपलब्धता को बढ़ा रही है. एक अनुमान के अनुसार, लगभग 5 करोड़ भारतीय इस समय सिंथेटिक ड्रग्स जैसे कैनाबिस और ओपिओइड्स का उपयोग कर रहे हैं. जाहिर है पहले इस पर लगाम लगाने और फिर इसे खत्म करने के लिए राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है. अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार ने नक्सलवाद की तरह ड्रग्स और नारकोटिक मुक्त भारत का भी संकल्प लिया है.

गृहमंत्री ने 2047 तक भारत को नारकोटिक्स मुक्त करने का वायदा किया है. लोग कह सकते हैं कि 20 साल का समय किसने देखा है. एक व्यक्ति की उम्र में 20 साल एक लंबी अवधि हो सकती है, लेकिन एक राष्ट्र के लिए 20 साल का समय सामने से दिख सकता है. जिस गंभीर स्थिति में यह समस्या है, उसे खत्म करने में समय तो लगेगा. खासकर तब जब लोग नशे को जीवन शैली का हिस्सा बना रहे हैं, नई पीढ़ी पहले शौक से फिर आदत से और फिर बाद में लत के कारण इसकी चपेट में आसानी से आ जा रही है. अब एक आकड़ा डराने वाला है.

कैंब्रिज प्रिज़म ने भारत के 1630 युवाओं का एक सर्वे किया उससे पता चलता है कि उसमें से 26.4 प्रतिशत लोग तंबाकू का सेवन कर रहे थे, 26.1 प्रतिशत शराब का सेवन कर रहे थे. गांजा का सेवन करने वाले 9.5 प्रतिशत लोग थे और 22.2 प्रतिशत लोग एक से ज़्यादा नशीले पदार्थों के आदि हो चुके थे. इंजेक्शन से ली जाने वाली दवाओं का भी इस्तेमाल शामिल था. सबसे ज्यादा डराने बात यह निकलकर सामने आई कि 29.5 प्रतिशत लोग नशे के लिए उन पदार्थों का सेवन करने वाले में शामिल थे जिन्हें सिन्थेटिक ड्रग्स की श्रेणी में रखा जाता है. इन नशीले पदार्थों की शुरुआत या तो इंटरनेट के ज़रिए मिली जानकारी के साथ शुरू हुईं या फिर पार्टियों में किसी ने उसकी शुरुआत कर दी. ज़्यादातर को उनके दोस्तों ने नशे से परिचित कराया.

पार्टी फिर कैंपस और अंततः घर की दहलीज तक पहुंचे नशे के कारोबार के संजाल को तोड़ना, फिर आपूर्ति को बाधित करना, इसके कारोबार से जुड़े लोगों को कानून के कठघरे में खड़ा करना, इसके सिंडीकेट को ध्वस्त करना, बाहर बैठकर इस नशे के धंधे को संचालित करने वाले को भारत लाकर उनको सजा दिलाना, किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं हो सकता. लेकिन भारत की सरकार और खास कर गृहमंत्री अमित शाह इसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञ नजर आ रहे हैं. देश को नक्सलमुक्त करने की उनकी उपलब्धि विश्वास दिलाने में उनकी बड़ी बात सिद्ध हो सकती है.

अभी तक हम मानते थे कि पंजाब ही नशे में उड़ रहा है. ताजा आकड़े बताते है कि हिमाचल प्रदेश और केरल की भी हालत पंजाब वाली होती जा रही है. एक अंग्रेजी दैनिक ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमाचल में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और उनकी तस्करी में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है. उसी रिपोर्ट में राज्यपाल जे हवाले से लिखा गया है कि अगर नशीले पदार्थों के प्रति सख्त कदम तुरंत नहीं उठाए जाते तो तो अगले पाँच सालों में हिमाचल प्रदेश भी ‘उड़ता पंजाब’ बन जाएगा. हिमाचल में सिंथेटिक ओपिओइड की खेप आसानी से पहुंचाई जा रही है. 15 से 30 साल के युवकों में इसकी लत तेजी से फैल रही है. 2025 में ओवरडोज़ से 13 युवकों की मौतें रिकार्ड की गई. गृह मंत्री अमित शाह खुद मुख्यमंत्री सुक्खू के साथ बैठक कर कानूनी शिकंजा बढ़ाने के साथ नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने में मदद की. केरल में भी नारकोटिक्स के मामलों में 130 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी देखी गई. यहाँ लंबे समुद्री तट से आसानी से नशे के समान पहुँच रहे थे.

केंद्र, खासकर गृह मंत्रालय की पहल पर राज्यों में मादक पदार्थों के खिलाफ जीरों टोलेरेन्स की नीति बनाई जा रही है. गृह मंत्री सीधा प्रहार अंतरराष्ट्रीय गिरोहों पर करने की नीति पर चल रहे हैं. गृह मंत्रालय एंटी नारकोटिक्स में शामिल सभी एजेंसियों के बीच समन्वय का एक मेकनिज़म तैयार कर चुके हैं. मादक औषधि एवं मनोरोगी पदार्थ (एनडीपीएस ) अधिनियम, 1985 के तहत मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी) समन्वय की नोडल एजेंसी है. राज्य पुलिस और गृह मंत्रालय के अधिकारियों के बीच चार स्तरीय समन्वय तंत्र की स्थापना की गई है. ड्रग्स की खुफिया जानकारी के लिए इंटरपोल और संयुक्त राष्ट्र तक का सहयोग लिया जा रहा है.नशे की खेप के लिए उपयोग किये जा रहे डार्कनेट और क्रिप्टो की ट्रैकिंग के लिए गृह मंत्रालय ने एक अलग टास्क फोर्स का गठन किया है. अपराधियों की संपत्ति ज़ब्ती के अभियान में भी तेजी की जा रही है.

यही नहीं अपने लक्ष्य के लिए गंभीर गृह मंत्रालय ने एक स्थानीय प्रवर्तन निदेशालय के अधिकार्यों के साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष एएनटीएफ इकाइयों को भी अनिवार्य कर दिया है. नागरिक सहभागिता के लिए हेल्पलाइन की सुविधा विकसित की गई है. 24×7 टोल-फ्री राष्ट्रीय नार्कोटिक्स कॉल सेंटर की भी स्थापना की गई है. ताकि नशीले पदार्थों के अवैध नेटवर्क को तोड़ा जा सके. नशीले पदार्थों की तस्करी के रास्तों को बंद करने के लिए व्यापक उपाय किये जा है. वर्मा, पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाओं पर तस्करी की हर संभावना को खत्म करने की पहल की जा रही है. यह के खुशाइन बात है कि अधिकतर सीमावर्ती राज्यों में अब बीजेपी या एनडीए की सरकार है. गृह मंत्रालय अब अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता के लिए विशेष उपकरण भी उपलब्ध करा रहा है. अब प्रीकर्सर रसायनों का पता लगाना आसान हो गया है.

पहले ईरान, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान से ही सबसे ज्यादा नशे के व्यापार संचालित होते थे, क्योंकि इन तीनों देशों में सबसे ज्यादा अफ़ीम के उत्पादन होते थे. अफ़ीम के व्यापार से होने वाली आमदनी का उपयोग इस्लामी आतंकवाद को पैसे मुहैया कराने में किया जाता था. अफ़गान और ईरान अब भारत के विरुद्ध अफीम मनी का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान अब भी भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैये के साथ पंजाब के रास्ते नशे की खेप भारत पहुंचा रहा है. पर इस समय लाओस, थाईलैंड और म्यांमार के रास्ते भारत में सबसे ज्यादा नशीली खेप आ रही हैं. म्यांमार के तस्कर सबसे ज्यादा सक्रिय हैं.

जाहिर है चुनौती बड़ी है. ड्रग्स का यह अंतर्राष्ट्रीय सिंडीकेट राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है. इसीलिए गृह मंत्रालय ने नशा मुक्त का अभियान पूरे राष्ट्र के दृष्टिकोणके के साथ शुरू किया है. इसे स्थानीय कानून व्यवस्था की तरह लेने के बजाय एक व्यापक वैश्विक सुरक्षा चुनौती के रूप में लिया है. एक राष्ट्रीय संकल्प के तहत गृहमंत्री ने यह ऐलान किया है कि न तो नशीले पदार्थों का एक भी ग्राम भारत में प्रवेश करने दिया जाएगा, और न ही भारतीय क्षेत्र को अन्य देशों में नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए एक पारगमन मार्ग बनने दिया जाएगा. इस अभियान का परिणाम भी मिला है.

पिछले दो वर्षों में, भारतीय एजेंसियों ने 40 से अधिक नशीले पदार्थों के तस्करों और संगठित अपराध में शामिल लोगों को विदेश से प्रत्यर्पण करने में सफलता प्राप्त की है. यही नहीं सिंथेटिक एम्फ़ैटेमिन-आधारित नशीला पदार्थ कैप्टागॉन एक बड़ी खेप की पहली ज़ब्ती भी हुईं है. यह एक तरह से जिहादी ड्रग है जिसे चरमपंथी नेटवर्क चलाता है. नशा-मुक्त भारत 2047 का संकल्प मोदी सरकार का एक राष्ट्रीय विज़न है. इसको पूरा करने में नागरिकों की भी बड़ी भूमिका होने वाली है.

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