लंबित मुकदमों के बोझ का हल निकले

न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और जजों से जुड़े विवादों ने न्याय व्यवस्था की छवि धूमिल की है. सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ को कम करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले और सुझाव दिए हैं.

पंजाब और राजस्थान हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति के साथ जजों से जुड़े विवादों की वजह से न्यायपालिका की छवि धूमिल हो रही है. सुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुईयां ने जजों की योग्यता और जवाबदेही के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें कही हैं. पहला- संविधान लागू होने के 76 साल बाद भी अनुच्छेद 124 के तहत अभी तक किसी भी विद्धान न्यायविद को सुप्रीमकोर्ट का जज क्यों नहीं बनाया गया? दूसरा यह कि जज भगवान या दैवीय नहीं हैं और उन्हें सवालों का जवाब देना चाहिए. वर्ष 2021 में 4.5 करोड़ लंबित मुकदमों पर चिंता जाहिर करते हुए चीफ जस्टिस बोबड़े ने तदर्थ जजों की नियुक्ति का तदर्थ समाधान दिया था.

रिटायरमेंट के बाद अधिकांश जज चूंकि मध्यस्थता से भारी आमदनी कर लेते हैं, इसलिए रिटायर्ड लोगों ने तदर्थ जज बनने में कोई रुचि जाहिर नहीं की. वर्ष 2026 में देशभर की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या बढ़कर 5.84 करोड़ हो गयी है. इनमें से 4.25 करोड़ मुकदमे जिला अदालतों में लंबित हैं. संसद में 30 जुलाई को विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के जवाब के अनुसार, हाईकोर्ट और जिला अदालतों में जजों के 31,086 पद हैं. हाईकोर्ट में 341 और जिला अदालतों में 7,311 पद रिक्त हैं. उत्तर प्रदेश में 1,106, महाराष्ट्र में 912, गुजरात में 760, बिहार में 400, पश्चिम बंगाल में 242 और झारखंड की जिला अदालतों में 213 जजों के पद रिक्त हैं. आइआइटी की पढ़ाई से बेहतर इंजीनियर निकलते हैं. विधि की पढ़ाई की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए राज्यों में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी स्थापित की गयी है. देश में लाखों योग्य विधि स्नातक होने के बावजूद जिला अदालतों में हजारों रिक्त पद हैं.

जिला अदालतों में न्यायिक भर्ती करने की बजाय सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर ज्यादा जोर देने के कारण लंबित मुकदमों का मर्ज बढ़ता ही जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले से छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में जजों की रिटायरमेंट उम्र 60 साल से बढ़कर 62 साल हो गयी है. बिहार, झारखंड समेत देश के 24 राज्यों में जजों की उम्र बढ़ाने के बारे में एक अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में फैसला होगा. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, रिटायरमेंट उम्र बढ़ने के बाद अनुभवी जजों से जिला अदालतों में मुकदमों का बोझ कम होगा. युवा विधि स्नातकों को नियुक्ति और रोजगार देने की बजाय जिला अदालतों के जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर अनेक सवाल हैं. सुप्रीम कोर्ट के दूसरे फैसले से सिविल जज भर्ती के लिए अनिवार्य तीन साल की वकालत के नियम में बदलाव करके उसे घटाकर एक साल कर दिया है.

दो साल की वकालत के एवज में चयनित उम्मीदवारों को एक साल की ट्रेनिंग और एक साल की क्लर्कशिप करनी होगी. जजों से जुड़े मामलों पर दो और महत्वपूर्ण फैसले आये हैं. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि सभी राज्यों के हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों को समान लाभ और सुविधाएं मिलनी चाहिए. इसमें घरेलू सहायक, ड्राइवर, टेलीफोन, मेडिकल और सरकारी गेस्ट-हाउस आदि शामिल हैं. अन्य मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के अनुसार, जजों को आवास भत्ते और एलटीसी आदि भत्तों में फिलहाल आयकर भुगतान से छूट मिल गयी है. नये आयकर कानून के अनुसार सभी भत्तों को आमदनी माना जाना चाहिए. संविधान में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के अनुसार, संसद से ही कानून में बदलाव होना चाहिए. हितों के विरोधाभास के न्यायिक सिद्धांत के अनुसार व्यक्तिगत हित या लाभ से जुड़े विषयों पर न्यायिक फैसलों से जजों को बचना चाहिए. जजों की जवाबदेही से जुड़े दो मुद्दों पर मंथन और संस्थागत सुधार करने की आवश्यकता है. इससे न्यायपालिका की साख के साथ जनता का भरोसा भी बढ़ेगा.

पहला- हाईकोर्ट जजों में जज से चीफ जस्टिस या हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन के मामलों में फिलहाल वरिष्ठता सूची को नजरंदाज किया जाता है. संविधान पीठ के फैसले के बावजूद जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर से जुड़े मामलों के लिए केंद्रीय सचिवालय नहीं बना. जजों की नियुक्ति के लिए संसद से बने न्यायिक आयोग कानून को निरस्त कर सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया था. जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कॉलेजियम की संड़ांध खत्म करने के लिए पेरोस्त्रोइका और ग्लास्नोस्त जैसे सुधारों पर जोर दिया था. लेकिन 11 वर्षों से उस बारे में संसद या सुप्रीम कोर्ट से कोई पहल नहीं हुई. दूसरा विषय अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (एआइजेएस) का है. आइएएस, आइपीएस और आइएफएस की तर्ज पर एआइजेएस का गठन करने के लिए विधि आयोग ने 1961 में अनुशंसा की थी.

इसके लिए 1976 में संविधान के अनुच्छेद 312 में 42वां संशोधन किया गया था. पिछले 65 वर्षों से केंद्र और राज्य सरकारों के साथ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कई बार परामर्श कर चुके हैं. केंद्र सरकार के सचिवों की समिति ने 2012 में कहा था कि एआइजेएस से न्यायपालिका में श्रेष्ठ प्रतिभा के साथ महिलाओं और वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. जस्टिस शेट्टी की अध्यक्षता वाले प्रथम राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग ने भी आशंकाओं का स्पष्टीकरण देते हुए एआइजेएस लागू करने के लिए कहा था. संसदीय समिति में 2017 और 2021 में इस बारे में विमर्श हुआ था. रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने जैसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ फैसला दे रही है. पर जजों की वरिष्ठता से जुड़े कई विवादों के लिए पांच जजों की संविधान पीठ गठित की गयी है.

एआइजेएस लागू होने के बाद जिला अदालतों के जजों की वरिष्ठता से जुड़े विवाद स्वतः खत्म हो जायेंगे. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एआइजेएस पर अनेक हाईकोर्ट और राज्य सरकारों ने आपत्ति जाहिर की थी. विधि आयोग, संसदीय समिति और वेतन आयोग की विस्तृत रिपोर्ट में उन आपत्तियों का निराकरण किया जा चुका है. रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के मामले में कई राज्य सरकारों के विरोध के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक फैसले से हाईकोर्ट के नियमों में बदलाव हो रहा है. एआइजेएस के बारे में तो संविधान में स्पष्ट प्रावधान हैं. इसे अविलंब लागू किया जाये, तो न्यायपालिका में योग्यता और कुशलता बढ़ने और हजारों युवा वकीलों को गरिमामय रोजगार मिलने के साथ लंबित मामलों का बोझ तेजी से कम होगा. पूरे देश में जजों की नियुक्ति और प्रमोशन से जुड़े विषयों पर समान प्रशासनिक प्रणाली वाले एआइजेएस, यानी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा से 'एक देश एक कानून' का संकल्प बेहतर तरीके से सफल हो सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By विराग गुप्ता

लेखक और वकील
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