संजय सेठ रक्षा राज्य मंत्री, भारत सरकार तथा सांसद, रांची (झारखंड)
झारखंड की पहचान देश के सबसे समृद्ध खनिज राज्यों में होती है. कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर, डोलोमाइट और ग्रेफाइट जैसे खनिज केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, रोजगार, उद्योग, ऊर्जा और विकास की बड़ी ताकत हैं. इसलिए झारखंड के लिए खनन क्षेत्र में सुधार का अर्थ केवल खनन नीति में बदलाव नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को नयी गति देने, रोजगार बढ़ाने और लंबे समय के लिए राजस्व के नये स्रोत तैयार करने से है. खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है कि इससे झारखंड का खनिज राजस्व समाप्त हो जायेगा. यह सही नहीं है.
रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, जिला खनिज प्रतिष्ठान (डीएमएफ), राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (एनएमइटी) और जीएसटी से राज्य को मिलने वाले राजस्व पर इस सुधार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा. आज झारखंड के सामने वास्तविक चुनौती अपने विशाल खनिज संसाधनों को शीघ्र उत्पादन, निवेश, रोजगार और राजस्व में बदलने की है. पिछले 11 वर्षों में झारखंड में केवल 11 खनिज ब्लॉकों की नीलामी हुई है और अभी तक एक भी ब्लॉक परिचालन में नहीं आ सका है. यह स्थिति बदलनी होगी. खनिज संपदा का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब खदानें जमीन के नीचे से निकलकर उत्पादन में आयेंगी.
नीलामी के बाद खदानों का परिचालन शुरू होने से राज्य को केवल रॉयल्टी ही नहीं, नीलामी प्रीमियम, डीएमएफ और अन्य माध्यमों से भी लगातार राजस्व प्राप्त होता है. झारखंड को मौजूदा खदानों पर अतिरिक्त कर बोझ बढ़ाने के बजाय नयी खदानों को परिचालन में लाकर राजस्व के नये स्रोत तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए. यही दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि है. खनन क्षेत्र से प्राप्त राजस्व का बड़ा हिस्सा राज्यों को मिलता है. वर्ष 2014 से अब तक खनन क्षेत्र से राज्यों को सात लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है.
वित्त वर्ष 2025-26 में राज्यों का खनिज राजस्व लगभग 1,14,549 करोड़ रुपये रहा. राज्यों को मिलने वाली रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डीएमएफ और जीएसटी से संबंधित राजस्व की व्यवस्था जारी रहेगी. यानी यह विधेयक राज्यों के राजस्व को कम करने वाला कानून नहीं है. इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें खनन परियोजनाएं आर्थिक रूप से व्यवहार्य रहें, निवेश और उत्पादन बढ़े तथा राज्यों के राजस्व का आधार और मजबूत हो. खनन क्षेत्र में अनेक प्रकार के कर, शुल्क, फीस और लेवी लगती है. जब इनका संचयी बोझ बहुत अधिक हो जाता है, तो वैध खनन की लागत बढ़ती है. इससे एक ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसमें वैध तरीके से निकाला गया खनिज महंगा और चोरी या अवैध खनन से निकला खनिज सस्ता दिखाई देने लगे. इससे सरकार का राजस्व घटता है, वैध खनन करने वाली कंपनियों को नुकसान होता है और अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है. इसलिए सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट है-वैध खनन आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी होना चाहिए और अवैध खनन के आर्थिक आधार को कमजोर किया जाना चाहिए.
इसीलिए खनन क्षेत्रों की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई के लिए केंद्रीय सुरक्षा तंत्र की भूमिका मजबूत की जा रही है. सीआइएसएफ की भूमिका अब केवल खदानों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहकर अवैध खनन और कोयला चोरी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई तक विस्तारित हो रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने जिस दृढ़ता के साथ देश में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान चलाया है, उसी तरह खनिज चोरी के खिलाफ प्रभावी और निरंतर कार्रवाई जरूरी है. यानी कोयला वैध तरीके से निकले, वैध तरीके से परिवहन हो और वैध तरीके से बाजार में पहुंचे. यदि कोयला चोरी और अवैध खनन पर रोक लगती है, तो हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान को रोका जा सकता है. खनन क्षेत्र के आसपास परिवहन, मशीनरी, मरम्मत, व्यापार, सेवाएं और अनेक छोटे-बड़े व्यवसाय विकसित होते हैं.
इसलिए खदानों को आर्थिक रूप से व्यवहार्य रखना रोजगार की रक्षा करना भी है. भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 10.12 लाख करोड़ रुपये मूल्य के खनिजों का आयात किया. जाहिर है, घरेलू खनिजों की लागत को प्रतिस्पर्धी बनाये रखना जरूरी है. खनिज संपदा का लाभ केवल राज्य के खजाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इसी उद्देश्य से जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) की व्यवस्था की गयी है. इसके माध्यम से खनन प्रभावित जिलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और जीवन स्तर सुधारने से जुड़े कार्य किये जाते हैं. झारखंड के 24 जिलों में डीएमएफ के जरिये लगभग 19,000 करोड़ रुपये एकत्र किये गये हैं. यह दिखाता है कि खनिज संपदा का उपयोग स्थानीय विकास और जनकल्याण के लिए भी किया जा सकता है. खनन गतिविधियां बढ़ेंगी, तो इन क्षेत्रों के विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का आधार भी मजबूत होगा.
यह भी स्पष्ट है कि एमएमडीआर संशोधन विधेयक राज्यों की हर खनिज शक्ति को समाप्त नहीं करता. लघु खनिजों पर राज्यों की मौजूदा भूमिका और अधिकार बने रहते हैं. प्रमुख खनिजों के क्षेत्र में सुधार का उद्देश्य राज्यों को कमजोर करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्थिर और समान आर्थिक वातावरण बनाना है. यदि अलग-अलग राज्यों में कर और शुल्क की व्यवस्था असमान होगी, तो खनिजों की लागत बढ़ सकती है, आपूर्ति शृंखला प्रभावित हो सकती है और राष्ट्रीय बाजार में असंतुलन पैदा हो सकता है. एमएमडीआर संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य स्पष्ट है-खनिज क्षेत्र को अधिक स्थिर, प्रतिस्पर्धी और निवेश अनुकूल बनाना, राज्यों के राजस्व को सुरक्षित रखना और भारत की घरेलू खनिज क्षमता को विकास की ताकत में बदलना. झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्य के लिए यह एक बड़ा अवसर है.
राज्य के पास संसाधन हैं, पर अब उन संसाधनों को तेजी से उत्पादन और आर्थिक गतिविधि में बदलने की जरूरत है. ओडिशा का उदाहरण बताता है कि नीलाम खदानों को समय पर परिचालन में लाने से राज्य को भारी अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है. झारखंड को भी अपनी खनिज संपदा से नये और स्थायी राजस्व स्रोत विकसित करने चाहिए. भारत की धरती में मौजूद खनिज केवल भंडार नहीं हैं, वे भारत की विकास शक्ति हैं. इनका लाभ देश के उद्योगों को मिले, रोजगार पैदा हो, राज्यों का राजस्व बढ़े, खनन प्रभावित क्षेत्रों का विकास हो और आम नागरिक को सस्ती एवं विश्वसनीय ऊर्जा तथा बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलें. यही इस सुधार की भावना है.
