आसान नहीं हैं बाल साहित्य लिखना

वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्थापित करने में मिली सफलता को भी नुपूर शर्मा ने नुकसान पहुंचाया है.

यदि भारत में सबसे अधिक बिकने वाली किताबों की बात की जाए, तो बच्चों की किताबों के लेखक रॉयल्टी के मामले में सबसे अधिक मालामाल हैं. संख्या में भी ऐसी किताबें हिंदी में खूब छप रही हैं, लेकिन उनमें से असली पाठकों तक बहुत कम पहुंचती हैं. बाल साहित्य लेखकों का बड़ा वर्ग अब भी बच्चों के लिए लिखने और ‘बचकाना’ लिखने में फर्क नहीं कर पा रहा.

जानवरों को इंसान बना देना, राजा, मंत्री, रानी की कहानी, किसी बच्चे को चोट पहुंचा कर उसे सीख देना या दो बच्चों की तुलना कर उसमें अच्छा बच्चा-बुरा तय कर देना या फिर नैतिक शिक्षा की घुट्टी पिलाना- अधिकांश बाल साहित्य में समावेशित है. कविता के बिंब और संवाद वही घड़ी, कोयल, बंदर तक सीमित हैं.

बाल साहित्य का सबसे अनिवार्य तत्व उसके चित्र हैं और चित्र तो इंटरनेट से चुरा कर या किसी अधकचरे कलाकार से बनवाये गये होते हैं. ऐसी किताबें आपस में दोस्तों को बंटती हैं और कुछ स्वयंभू आलोचक मुफ्त में मिली किताबों में से ही सर्वश्रेष्ठ का चुनाव कर संपादन के खतरे से मुक्त सोशल मीडिया पर चस्पा कर देते हैं.

तकनीक ने हमारे समाज को दो दशकों में जितना नहीं बदला था, उससे कहीं अधिक कोविड के 22 महीनों में मानव-स्वभाव बदल गया. इससे बच्चा सर्वाधिक प्रभावित हुआ. उसे मित्र मिल नहीं पाये, वह खेलने नहीं जा सका और घर के परिवेश में दबा-बैठा रहा. बच्चों के लिए पठन सामग्री को भी उसके अनुरूप बदलना होगा. पाठ्य पुस्तक सामग्री, बोध या नैतिक पाठ्य और मनोरंजक पठन सामग्री में अंतर होता है तथा उनके उद्देश्य, सामग्री और प्रस्तुति भी अलग-अलग होती हैं.

पाठ्य पुस्तकों या बोध साहित्य के बोझ से थका बच्चा जब कुछ ऐसा पढ़ना चाहे, जो उसका मनोरंजन करे, ऐसे ज्ञान या सूचना दे कि उसमें कोई प्रश्न पूछने या गलत-सही उत्तर से बच्चे के आकलन का स्थान न हो, वह कितना पढ़े, कब पढ़े, उसका कोई दायरा न हो- ऐसी किताबें बाल साहित्य कहलाती हैं.

किस आयु वर्ग का बच्चा क्या पढ़ना पसंद करता है, इस पर पहले बहुत लिखा जा चुका है, लेकिन ध्यान यह रखना होगा कि बच्चे की पठन क्षमता और अभिरुचि बहुत कुछ उसके सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर निर्भर करती है. इसलिए कोई ऐसा मानक खांचा नहीं बना है कि अमुक किताब अमुक वर्ग का बच्चा ही पढ़ेगा.

बच्चा अपने परिवेश से बाहर की बातों और भाषा को रुचि के साथ पढ़ता है. एक अच्छे बाल साहित्य का मूल तत्व है जिज्ञासा. कहानी का पहला शब्द ही यदि शुरू होता है कि राजू शैतान है या रीमा पढ़ने में अच्छी है- तो बाल पाठक की उसमें कोई रुचि नहीं होगी. कथानक के मूल चरित्र के असली गुण या खासियत जब पहले ही शब्द में उजागर हो गयी, तो आगे की सामग्री बच्चा इस स्थायी धारणा के साथ पढ़ेगा कि वह शैतान है या पढ़ने में अच्छी.

क्या आपने बाल साहित्य में जन-प्रतिनिधि या कर्मचारी का उल्लेख देखा है? केवल पुलिस वाला होगा या पहले कुछ कहानियों में डाकिया. अधिकतर लेखक किसी बच्चे को बहादुर बताने के लिए उसे चोर या आतंकी से सीधा लड़ता बता देते हैं. कुछ साल पहले दिल्ली में एक महिला ने साहस के साथ एक ऐसे व्यक्ति को पकड़ा, जो उसकी चेन छीन रहा था.

पुलिस अधिकारी ने स्पष्ट किया कि ऐसे खतरे न मोल लें, इंसान का जीवन ज्यादा कीमती है. बच्चे को जागरूक होना चाहिए, पेड़ काटने या आतंकी घटना करने वालों की सूचना तत्काल संबधित एजेंसी को देना चाहिए. यह लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ, कार्यपालिका के प्रति भविष्य के नागरिक के दिल में भरोसा जताने का सबक होता है. आज भी कई युवा लोकतंत्र को भला-बुरा कहते मिलते हैं. क्योंकि उन्होंने बचपन में राजतंत्र की इतनी कहानियां पढ़ी होती हैं कि उनके मन में वे ही आदर्श होते हैं. यह जान लें कि देश का आज विश्व में जो स्थान है, उसका मूल कारण हमारा महान लोकतंत्र ही है, लेकिन बाल साहित्य में यह प्राय: नदारद रहता है.

छोटी बातों तथा आसपास की गतिविधियों को सूक्ष्मता से देखना और उसे शब्दों में प्रकट करना बाल साहित्य का एक गुण है. विश्व में बाल साहित्य नये विषयों के साथ आ रहा है. अकेले यूरोप या अमेरिका जैसे विकसित देश ही नहीं, अफ्रीका और अरब की दुनिया में बाल साहित्य में बाल मनोविज्ञान समस्या और सूचना के नये विषय आ रहे हैं, वहीं हिंदी में अभी भी पंचतंत्र या हितोपदेश के मानिंद रचना या धार्मिक ग्रंथ से कहानियों का पुनर्लेखन या किसी चर्चित व्यक्ति के जीवन की घटनाओं का बाहुल्य है.

एक बात समझना होगा कि बाल साहित्य में चित्र शब्दों का अनुवाद नहीं होते, बल्कि उनका विस्तार होते हैं. शब्द भी चित्र का ही विस्तार होते हैं. यह बात दीगर है कि आनंदकारी बाल साहित्य मूल रूप से पाठ्य पुस्तकों के मूल उद्देश्य की पूर्ति ही करता है- वर्णमाला और शब्द, अंक और उसका इस्तेमाल, रंग, आकृति की पहचान और मानवीय संवेदना का अहसास- बस उसका इम्तहान नहीं होता. बाल साहित्य के चयन, लेखन और संपादन के प्रति संवेदनशील होना इसलिए जरूरी है कि इन शब्द-चित्रों से हम देश का भविष्य गढ़ते हैं.

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