मरुस्थल के पर्यावरण के लिए जरूरी है ओरण को बचाना

Desert Environment : विडंबना यह है कि जिस ‘हरित ऊर्जा’ को हम वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में देख रहे हैं, वही सौर परियोजनाएं आज राजस्थान के ‘देव वनों’' यानी ओरण और राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के लिए अस्तित्व का संकट बन गयी हैं.

Desert Environment : राजस्थान के पश्चिमी अंचल में इन दिनों एक ऐसी गूंज सुनाई दे रही है, जो आधुनिक विकास के मॉडल पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है. एक जनवरी को जैसलमेर के श्री तनोट माता मंदिर से शुरू हुई ओरण बचाओ पदयात्रा 82 दिनों में 700 किलोमीटर का सफर तय कर जयपुर पहुंची है. बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले धोरों से उठा ‘खेजड़ी और ओरण बचाओ आंदोलन’ महज चंद पेड़ों को बचाने की कवायद नहीं है, यह उस प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की अंतिम पुकार है, जिसने सदियों से थार के मरुस्थल को जीवंत बनाये रखा है.

विडंबना यह है कि जिस ‘हरित ऊर्जा’ को हम वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में देख रहे हैं, वही सौर परियोजनाएं आज राजस्थान के ‘देव वनों’’ यानी ओरण और राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के लिए अस्तित्व का संकट बन गयी हैं. यह संघर्ष इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब विकास की योजनाएं स्थानीय भूगोल और जैव विविधता को नजरअंदाज करती हैं, तो वे वरदान के बजाय अभिशाप सिद्ध होने लगती हैं.
मरुस्थल के पर्यावरण में ‘ओरण’ की महत्ता को वैज्ञानिक और सामाजिक, दोनों ही धरातलों पर समझना आवश्यक है. ओरण वे सामुदायिक वन क्षेत्र हैं, जिन्हें सदियों से संरक्षित किया गया है. सरकारी दस्तावेजों में भले ही इन्हें ‘वेस्टलैंड’ (बंजर भूमि) के रूप में वर्गीकृत किया गया हो, लेकिन पारिस्थितिकी विज्ञान के नजरिये से ये ‘बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट’ हैं.

राजस्थान में लगभग 25,000 ओरण हैं, जो करीब छह लाख हेक्टेयर भूमि में फैले हैं. ये क्षेत्र न केवल दुर्लभ वनस्पतियों के घर हैं, बल्कि लुप्तप्राय गोडावण, चिंकारा और रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे जीवों के लिए अंतिम शरणस्थली भी हैं. यहां की जैव विविधता अन्य मरुस्थलीय क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है, जो पूरे क्षेत्र के सूक्ष्म जलवायु को नियंत्रित करती है. ओरण की घास और पेड़ों की कमी का सीधा अर्थ है रेत का अनियंत्रित प्रसार. सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि ओरण को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ माना जाये, पर राजस्व रिकॉर्ड में इन्हें आज भी ‘बंजर’ के रूप में दर्ज किया जाना बड़ी प्रशासनिक चूक है. इसी का लाभ उठाकर ऊर्जा कंपनियां इन जमीनों को कौड़ियों के दाम पर लीज पर ले रही हैं. वर्तमान संकट का केंद्र वे विशाल सौर पार्क हैं, जिनके लिए मरुधरा के सीने पर लगे लाखों पेड़ों की बलि दी जा रही है. पिछले कुछ वर्षों में सौर परियोजनाओं के विस्तार के कारण केवल पश्चिमी राजस्थान में 26 लाख से अधिक खेजड़ी के पेड़ काटे गये हैं.


वैज्ञानिक शोध चेतावनी देते हैं कि सौर पैनलों का अत्यधिक जमाव स्थानीय तापमान को तीन से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देता है. यह ऊष्मा मरुस्थल के नाजुक पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ रही है. इसके अतिरिक्त, ‘लेक इफेक्ट’ के कारण आकाश में उड़ते पक्षियों को ये नीले पैनल जलस्रोत का भ्रम देते हैं, जिनसे टकराकर उनकी मृत्यु हो रही है. यदि यही गति रही, तो गोडावण जैसा राजकीय पक्षी इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जायेगा. जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से देखें, तो थार मरुस्थल में पानी की एक-एक बूंद स्वर्ण के समान है. पर एक विशाल सौर परियोजना को सुचारू रखने के लिए पैनलों की सफाई हेतु प्रति सप्ताह लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है.

यह पानी उसी भूजल स्रोत से खींचा जा रहा है, जो स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों की जीवनरेखा है. जब ओरण की जमीन पर कंक्रीट के ढांचे और पैनल बिछ जाते हैं, तो वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है, जिससे भविष्य में भयानक जल संकट की आशंका प्रबल हो गयी है. जलवायु परिवर्तन के इस वैश्विक दौर में, जहां मरुस्थलीकरण को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए, वहां खेजड़ी जैसे पेड़ों को काटना आत्मघाती कदम है. खेजड़ी की जड़ें जमीन के 30 मीटर नीचे तक जाकर मिट्टी को थामे रखती हैं और धूल भरी आंधियों की गति को नियंत्रित करती हैं. यदि ये ‘प्राकृतिक दीवारें’ ढह गयीं, तो मरुस्थल का विस्तार अरावली की सीमाओं को लांघकर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचने में देर नहीं लगायेगा.


आवश्यकता इस बात की है कि सौर ऊर्जा का विकास ‘विकेंद्रीकृत’ हो-उपजाऊ ओरण और मारू वनों के बजाय छतों और बंजर पहाड़ों का उपयोग किया जाये. विकास का पैमाना केवल ‘मेगावाट’ न हो, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी हो, जो सदियों से हमें ऑक्सीजन, चारा और आश्रय देता आया है. मरुभूमि का पर्यावरण, उसकी जैव विविधता और वहां की अनोखी जलवायु को बचाने के लिए ओरण को बचाना अब केवल क्षेत्रीय मांग नहीं, पर्यावरणीय आपातकाल बन चुका है. बिना खेजड़ी और ओरण के, राजस्थान का मरुस्थल केवल एक तपता हुआ सौर-कांच का घर बनकर रह जायेगा, जहां जीवन के लिए कोई स्थान नहीं होगा. यह समय नीति निर्माताओं के लिए आत्ममंथन का है कि क्या हम एक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करके प्राप्त की गयी बिजली को वास्तव में ‘हरित ऊर्जा’ कह सकते हैं? मरुभूमि की जैव विविधता और ओरण की पवित्रता को बचाना मानवता के भविष्य के लिए नैतिक उत्तरदायित्व है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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