पटरी पर लौटते भारत-चीन रिश्ते

प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की किर्गिस्तान में हुई मुलाकात भारत-चीन संबंधों में एक नया मोड़ ला सकती है. सीमा विवाद पर 8 सूत्रीय सहमति और व्यापार बहाली के बीच, क्या यह स्थायी शांति की ओर एक कदम है?

डॉ राजीव रंजन

सामाजिक विज्ञान संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय में चीन अध्ययन में एसोसिएट प्रोफेसर

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में प्रधानमंत्री मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात हुई. अगले कुछ दिनों में नयी दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में जिनपिंग आयेंगे. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम सीमा विवाद पर आठ मुद्दों पर बनी आपसी सहमति है. इससे पहले एक अगस्त से दोनों देशों के बीच सीमा व्यापार फिर शुरू हो गया है तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा पहले ही बहाल हो चुकी है. यह समझना होगा कि कूटनीति से केवल सीमा विवाद में नरमी तो लायी जा सकती है, परंतु दोनों देशों की राजनीतिक परिपक्वता ही स्थायी शांति की राह प्रशस्त कर सकती है.

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात हुई और दोनों के बीच संवाद भी हुआ. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने सीपीइसी मामले में राष्ट्र की संप्रभुता की बात छेड़कर चीन को प्रकारांतर से निशाने पर ही लिया. उससे पहले 25 अगस्त को बीजिंग में भारत-चीन सीमा मुद्दे पर 25वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के पोलित ब्यूरो सदस्य, पार्टी की केंद्रीय समिति के विदेश मामलों के निदेशक और विदेश मंत्री वांग यी के बीच संपन्न हुई थी, जिसमें दोनों देशों के बीच आठ सूत्रीय समझौतों पर सहमति बनी. इसमें सबसे अहम पहलू यह कि दोनों देशों ने पहली बार सीडब्ल्यूएमसीसी के अंतर्गत सीमा निर्धारण पर विशेषज्ञ समूह और सीमा प्रबंधन पर कार्य समूह को आगे वार्ता के लिए उत्तरदायित्व सौंपा है.

दूसरा, सीमा प्रबंधन उपायों में सुधार करने के उद्देश्य से दो मीटिंग पॉइंट्स पर भी सहमति बनी. इसी प्रकार, पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में सीमा सैन्य हॉटलाइन के दो अतिरिक्त चैनलों पर भी सहमति बनी. तीसरा, सीमा पार नदियों पर भारत-चीन विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र और जलविज्ञान संबंधी डाटा साझाकरण तथा संबंधित सहमति पत्रों के नवीनीकरण सहित मुद्दों पर संवाद बनाये रखने पर सहमति बनी है. हालांकि, इससे पहले दोनों देशों ने वार्ता को लेकर विज्ञप्ति जारी की थी. भारतीय विदेश मंत्रालय से जारी बयान संक्षिप्त है : दोनों विशेष प्रतिनिधियों ने भारत-चीन सीमा प्रश्न पर एक स्पष्ट और गहन विचार-विमर्श किया और अपने समग्र एवं दीर्घकालिक हितों के संदर्भ में सीमा प्रश्न के राजनीतिक समाधान की तलाश में अपने कार्य को जारी रखने पर सहमत हुए. जबकि चीनी बयान कहीं अधिक विस्तृत, वैचारिक और महत्वाकांक्षी लगता है : दोनों पक्षों को ऐतिहासिक अनुभव से सीखना चाहिए और सीमा मुद्दे को द्विपक्षीय संबंधों के उचित संदर्भ में रखना चाहिए.

यह वही पुरानी चीनी अवधारणा है, जिसे भारत गलवान के बाद अस्वीकार करता रहा है. हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर बार-बार यह कहते रहे हैं कि सीमा पर शांति ही सामान्य संबंधों की पूर्वशर्त है, न कि सीमा विवाद को अलग से देखना. भारतीय विज्ञप्ति में फिर से सीमा विवाद को समग्र एवं दीर्घकालिक हितों के संदर्भ में देखने की बात कही गयी है. चीनी विज्ञप्ति ने 2005 के राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों को दोहराते हुए, पारस्परिक सम्मान और समझ की भावना से 'न्यायसंगत, तर्कसंगत और परस्पर स्वीकार्य एक पैकेज समाधान' तलाशने की बात कही है. हालांकि, इस ‘एक पैकेज समाधान’ का आठ सूत्रीय सहमति पत्र में कोई जिक्र नहीं है. इससे पहले, एक अगस्त से दोनों देशों के बीच सीमा व्यापार फिर शुरू हो गया है. कैलास मानसरोवर यात्रा पहले ही बहाल हो चुकी है और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग कुछ दिनों बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने वाले हैं. भारत-चीन संबंधों में आये गुणात्मक सुधार के कई कारण हैं. एक कारण तो तेजी से बदलता अंतरराष्ट्रीय परिवेश ही है.

दरअसल, विश्व व्यापार व्यवस्था में उथल-पुथल, टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंधों का दबाव, और आपूर्ति शृंखलाओं की अनिश्चितता ने दोनों देशों के राजनयिक समीकरण बदल दिये हैं. फिर चीन की अर्थव्यवस्था को बाजार और स्थिरता भी चाहिए. इसी तरह भारत को विनिर्माण के लिए पूंजीगत वस्तुएं, कुशल तकनीशियन और दुर्लभ खनिज की आवश्यकता है. अर्थात, जब देशों के बड़े हित एक दिशा में जुड़ते हैं, तब कूटनीतिक मायने बदल जाते हैं.

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने पहले कार्यकाल से ही आपसी रिश्तों को सुदृढ़ करने के लिए काफी पहल की थी. वुहान और महाबलीपुरम की अनौपचारिक शिखर वार्ताओं से संबंधों में नये आयाम जुड़े थे, जो हालांकि गलवान, 2020 में ध्वस्त हो गये. रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने के लिए कजान में ब्रिक्स समिट तथा तियानजिन, फिर बिश्केक में एससीओ समिट की मुलाकातें इसी की कड़ियां हैं. भारत-चीन संबंधों में ‘नेतृत्व केंद्रित कूटनीति’ कुछ हद तक संस्थागत जड़ता को शिथिल तो कर देती है, पर यह हमेशा से क्षणिक शांति ही कायम कर पायी है. भारत-चीन जब तक संरचनात्मक बाध्यताओं को दुरुस्त नहीं कर लेते, तब तक रिश्तों में सामरिक स्थिरता मुश्किल है.

घरेलू राजनीतिक विवशताएं भी देशों की विदेश नीति को बदलती रहती हैं. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेस अगले साल होने वाली है. संभवतः शी जिनपिंग अपने चौथे कार्यकाल को लेकर निश्चित होना चाहते हैं. इसी संदर्भ में सीमा पर शांति और भारत-चीन संबंधों में नरमी 2027 की पार्टी कांग्रेस में शी को फिर से एक मजबूत और दूरदर्शी नेता के रूप में पेश करेगी. वहीं अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के नाम बदलने की चीनी कवायद जारी है और सीमा पर घुसपैठ की खबरें भी बीच-बीच में आती रहती हैं, ताकि चीनी जनता को लगे कि पार्टी राष्ट्रीय हितों पर समझौता नहीं करेगी. इस बीच, चीन के सार्वजनिक विमर्श में भारत विरोधी भावना का एक अप्रत्याशित विस्फोट तब हुआ, जब दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने एक ट्वीट में बताया कि उसने इस साल की पहली तिमाही में 85 हजार भारतीयों को वीजा जारी किये हैं.

चीनी जनता दूतावास की इस वीजा उदारता पर खीझ गयी, क्योंकि चीनी नागरिकों को भारतीय वीजा मिलने में कठिनाई होती है. चीनी सोशल मीडिया पर चीनी राजदूत की जमकर खिंचाई भी हुई. डोकलाम और गलवान विवाद के समय भी ऐसा हुआ था. पर इस बार भारतीयों पर नस्लीय टिप्पणी सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि चीन की सड़कों पर भी देखी गयी. यानी जहां बीजिंग सीमा मामलों पर 'सकारात्मक आख्यान' गढ़ने की बात कर रहा है, वहीं चीनी जनता भारत को लेकर अलग ही राग अलाप रही है. भारतीय जनमानस सीमा पर चीनी आक्रामकता को लेकर आक्रोशित है, तो चीनी जनता का आक्रोश विशेषाधिकार और वीजा उदारता को लेकर है. दोनों समाजों में आक्रोश हो, तो किसी छोटी घटना-एक सीमा गश्ती टकराव, एक नक्शा या एक बयान-को नियंत्रित रखना दोनों देशों के लिए कठिन होगा.

कूटनीति से केवल सीमा विवाद में नरमी तो लायी जा सकती है, परंतु अब दोनों देशों की राजनीतिक परिपक्वता ही जनमानस में आये उबाल को शांत कर सकती है. अंततः, अगले कुछ दिनों में होने जा रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग का शामिल होना दोनों देशों के रिश्तों में आयी स्थिरता का केवल एक राजनयिक संकेत होगा. लेकिन इस शिखर सम्मेलन के समानांतर अगर दोनों देशों के नेता कजान और तियानजिन की मुलाकात से आगे की रणनीति पर बढ़ें, तो रिश्तों में नये आयाम फिर से जोड़े जा सकते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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