उजड़ती अरावली और जलवायु परिवर्तन की मार

Climate Change : अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में कई अन्य पहाड़ियों के अलावा ऊपरी अरावली पर्वतमाला की हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में कम और मध्य उंचाई की कम से कम 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो गयी हैं.

Climate Change : राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बीते कुछ समय से गर्मी के साथ-साथ आकाश में छाये धूल के गुबार ने सांस के मरीजों के लिए जीवन का संकट खड़ा कर दिया है. पिछले दिनों हरियाणा के भिवानी में तो बवंडर ऐसा था कि दृश्यता 200 मीटर भी नहीं रह गयी थी. रेत के इस तूफान ने बीकानेर में भी लोगों को भयभीत किया, जहां धूल ने सूरज को ढक दिया था. यह रेतीली आंधी पाकिस्तान से उठी थी. वैसे तो हर साल मानसून आने से पहले दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत में ऐसे धूल भरे तूफानों का आना अब आम है. इस मौसम में सऊदी अरब और कभी-कभी सहारा जैसे दूरदराज के इलाकों से उठने वाली धूल पश्चिमी हवाओं के जरिये यहां तक पहुंच जाती है. लेकिन चिंता की बात यह है कि इस तरह के धूल भरे अंधड़ की संख्या और इनका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. यह सीधे-सीधे जलवायु परिवर्तन का असर है और प्रकृति में मानवीय छेड़छाड़ ने इसे और गंभीर बना दिया है. अंधड़ से जान-माल के साथ-साथ सार्वजनिक संपत्तियों का भी व्यापक नुकसान होता है.


अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘अर्थ साइंस इनफोरमैटिक्स’ में प्रकाशित एक शोध में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि अरावली पर्वतमाला में पहाड़ियों के गायब होने से राजस्थान में रेत के तूफान में वृद्धि हुई है. भरतपुर, धौलपुर, जयपुर और चित्तौड़गढ़ में अरावली पर्वतमाला पर अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और हरियाली उजाड़ने की अधिक मार पड़ी है. जबकि दिल्ली, राजस्थान के गैर मरुस्थलीय जिलों और हरियाणा का अस्तित्व ही अरावली पर टिका है. अरावली को नुकसान होने का अर्थ है कि देश के अन्न के कटोरे पंजाब तक बालू के धोरों का विस्तार. रेत के बवंडर खेती और हरियाली वाले इलाकों तक न पहुंचें, इसके लिए सुरक्षा-परत या शील्ड का काम हरियाली और जलधाराओं से संपन्न अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है. लेकिन इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ें जमा रहा है. राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान और उससे आगे तक फैले भीषण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है. बीते चार दशकों में अरावली पर्वतमाला में मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा है कि कई स्थानों पर पहाड़ की शृंखला की जगह गहरी खाई हो गयी. इस कारण अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है.


अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में कई अन्य पहाड़ियों के अलावा ऊपरी अरावली पर्वतमाला की हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में कम और मध्य उंचाई की कम से कम 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो गयी हैं. ऊपरी स्तर पर पहाड़ियों का गायब होना नरैना, कलवाड़, कोटपुतली, झालाना और सरिस्का में समुद्र तल से 200 मीटर से 600 मीटर की ऊंचाई पर दर्ज किया गया था. कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि आखिर कौन हनुमान जी ये पहाड़ियां उठा कर ले गये? वर्ष 1975 से 2019 के दौरान किये गये अध्ययन में यह पता चला कि वनक्षेत्र में सघन बस्तियां बस जाना पहाड़ियों के गायब होने के प्रमुख कारणों में से एक था. अध्ययन के परिणामों से यह भी पता चला है कि 1975 से 2019 के बीच अरावली की 3,676 वर्ग किलोमीटर भूमि बंजर हो गयी. इस दौरान अरावली के वनक्षेत्र में भी भारी कमी आयी है. ऐसे हालात में अंधड़ की मार का दायरा बढ़ेगा.
अरावली पहाड़ के उजड़ने यानी वहां के जंगल और जलनिधियों के खत्म होने और दुर्लभ वनस्पतियों के लुप्त होने के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. तेंदुए, हिरण और चिंकारा भोजन के लिए मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं और मानव-जानवर टकराव के मामले बढ़ रहे हैं. अंधड़ के बढ़ने से भी जानवरों के बस्ती में घुसने की घटनाएं बढ़ती हैं. ऐसे में, अवैध खनन और भूमि अतिक्रमण को कम करने के लिए उपाय किये जाने चाहिए तथा लगातार क्षेत्र की निगरानी, जंगल की कटाई की रोकथाम की दिशा में कदम उठाना चाहिए. यदि अरावली को और अधिक नुकसान हुआ, तो तेज अंधड़ की मार से दिल्ली भी नहीं बचेगी.


यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिशत हिस्से पर हरियाली थी, जो आज बमुश्किल सात फीसदी रह गयी है. हरियाली खत्म होने से वन्यप्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गये. सनद रहे कि अरावली रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाये रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है. अरावली की प्राकृतिक संरचना नष्ट होने की ही त्रासदी है कि वहां से गुजरने वाली साहिबी, कृष्णावती और दोहन जैसी नदियां अब लुप्त हो रही हैं. वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट की एक सर्वें रिपोर्ट बताती है कि 1980 में अरावली क्षेत्र के महज 247 वर्ग किलोमीटर पर आबादी थी, जो आज बढ़कर 638 वर्ग किलोमीटर हो गयी है. साथ ही, इसके 47 वर्ग किलोमीटर में कारखाने भी हैं. ऐसे में, खतरे की गंभीरता समझी जा सकती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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