हिमालय दुनिया को हवा, मिट्टी, पानी सब उपलब्ध करा रहा है, पर उसे लेकर बड़ी सामूहिक चिंता कभी नहीं हुई, कितनी अजीब बात है न यह. इतिहास खंगाल लें, तो हिमालय को लेकर, विशेषकर इसके वनों से संदर्भित चिपको आंदोलन ने देश में एक अलख जगायी थी. उसके बाद इसी धरती पर जल आंदोलन, नदी बचाओ आंदोलन आदि के जरिये टुकड़े-टुकड़े में लोग पेड़ों की कटाई के विरुद्ध खड़े हुए. इस प्रकार जो कुछ भी हुआ, वह हिमालय के अंदर ही, हिमालय के प्रति लोगों की भावना का सम्मान करते हुए हुआ.
पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कभी भी एक साथ मिलकर हिमालय को लेकर कोई बड़ी बात नहीं हुई. हमने जब-जब हिमालय की बात उठायी, हमारे पास सरल तरीका यही रहा कि हम इससे जुड़े राज्यों का निर्माण कर डालें और फिर स्थानीय सरकार अपनी प्राथमिकता के अनुसार सब कुछ तय करे. पर सरकारों के लिए पारिस्थितिकी कभी भी प्राथमिकता नहीं रहती. हमने हिमालय की भौगोलिक स्थितियों को कभी इस दृष्टि से भी नहीं नापा और समझा कि यहां क्या संभव है और क्या संभव नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि राज्यों ने इस बारे में चिंता न की हो, बल्कि यहां किस तरह के निर्माण को स्थान मिलना चाहिए, उसे लेकर कई बार बातें हुई हैं, बहसें भी हुई हैं. पर राज्यों की प्राथमिकताएं इसलिए भी बदल जाती हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर रोजगार, आवाजाही, स्वास्थ्य या शिक्षा को लेकर मांगें उठने लगती हैं और इन सबके बीच ढांचागत विकास स्वतः ही आ जाता है.
पर यदि हम आज भी नहीं समझे या सीखे, तो कल हमारे सामने ऐसे प्रश्न खड़े हो जायेंगे, जिनके उत्तर हमारे पास नहीं होंगे. नेपाल की त्रासदी को कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि हिमालय के किसी भी कोने में यदि कुछ होता है, तो वह वहीं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सब पर उसका अच्छा-बुरा प्रभाव पड़ता है. हिमालय आज भी दुनिया का सबसे बड़ा पारिस्थितिकी तंत्र है और इसे 'थर्ड पोल' (तीसरा ध्रुव) भी कहा जाता है. यह दो अरब लोगों को भोजन और पानी उपलब्ध कराता है. इसी तरह, आर्कटिक और अंटार्कटिका, जो दूसरे बड़े ध्रुव हैं, दुनिया के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संभाले हुए हैं, की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि 2050 तक आर्कटिक का पूरा हिमखंड पिघलकर समुद्र में डूब जायेगा. ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा इतना गंभीर हो चुका है कि यदि आज उसे नहीं समझा गया, तो दुनिया नेस्तनाबूद हो जायेगी.
एक तरफ हिमालय गर्मी के कारण पिघलेगा, दूसरी तरफ समुद्र का जलस्तर ऊपर उठेगा और इस कारण करोड़ों लोग डूब जायेंगे. इतना ही नहीं, बाकी बचे लोग तपते समुद्र के कारण लगातार गर्मी और वर्षा के बीच में पलेंगे और सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जायेगा. इस लिहाज से देखें, तो ग्लोबल वार्मिंग अब 'ग्लोबल वार्निंग' (वैश्विक चेतावनी) में बदल चुकी है. आज दुनिया का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जो कार्बन उत्सर्जन से प्रभावित न हो. फिर भी सभी देशों में होड़ है कि किस तरह उनकी जीडीपी आगे बढ़े या उनका आर्थिक तंत्र मजबूत हो. यह विडंबना ही है कि पेट भरने के बावजूद हमें अपने बैंक की चिंता होती है. जमाखोरी (होर्डिंग) का यह युग हमारे लिए संकट पैदा कर रहा है. इतना ही नहीं, देशों के बीच युद्ध के जन्म लेने से हथियारों का युग भी आ चुका है और सच कहें, तो यही हमारे विनाश की शुरुआत भी है. दुनिया पहले भी कई बार समाप्त हो चुकी, पर तब प्रकृति अपने आपको साध रही थी. तब प्रकृति एक ऐसी प्रजाति को जन्म देना चाहती थी, जो आज होमो सेपियंस (मानव) कहलाती है. पर मनुष्य की इसी प्रजाति ने दुनिया को सुधारने और संभालने से ज्यादा उसे संकट में डाल दिया है.
आज किसी भी देश के पास अपने बेहतर आर्थिक तंत्र या जीवनशैली पर इतराने का समय नहीं बचा है, क्योंकि जहां-जहां की आर्थिकी बेहतर है, वे भी कहीं न कहीं संकट में घिर रहे हैं. अमेरिका में सबसे अधिक आपदाएं आती हैं और चीन तथा भारत को भी आपदाएं घेर रही हैं. हमें एक बात समझ लेनी चाहिए कि दुनिया में दो ही तंत्र ऐसे हैं जिन्हें पारिस्थितिकी का नियंत्रक माना जा सकता है- वे हैं दुनिया की बर्फीली चोटियां (जिनमें तीनों ध्रुव आते हैं) और समुद्र. इन दोनों के बीच में ही दुनिया पलती है. एक पर संकट आने का अर्थ है दूसरे पर भी असर होना. और इन्हीं तंत्रों को समझने में हम चूक गये. हमने समुद्र और हिमालय या समुद्र और ध्रुवों के बीच के रिश्ते को सही तरीके से साधा नहीं.
हिमालय या अन्य दुनिया की बर्फीली चोटियां पिघलेंगी, तो वह समुद्र को बर्बाद करेंगी. और समुद्र बढ़ेंगे, तो दुनिया को लील लेंगे. या समुद्र तपेंगे, तो हमेशा वर्षा जैसी स्थिति रहेगी, उमस बढ़ेगी. हिमालय या अन्य ध्रुव के पिघलने के पीछे भी ग्लोबल वार्मिंग कारण बनेगी, और उसका कारण है हमारी जीवनशैली. आज हम अपनी आवश्यकताओं से बहुत आगे निकल चुके हैं, जिसका बोझ प्रकृति और पृथ्वी पर पड़ा है. पर हमने नीतियों को बनाने में इस पहलू को समझा ही नहीं. आप यह मानकर चलिए कि सब कुछ डूब जायेगा. यदि हम अब भी नहीं समझे, तो नेपाल जैसी त्रासदियां दुनियाभर में होंगी. पर तब शायद हमारे लिए कोई जगह नहीं बचेगी, जहां हम शरण लेकर अपना अस्तित्व बचा सकें. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
