संजीव राय, नेपाल मामलों के जानकार
Nepal Government: बालेंद्र शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गये हैं. विगत आठ सितंबर से पहले उन्हें नेपाल से बाहर कम लोग जानते थे. वर्ष 2012 में अपने पहले म्यूजिक एलबम से चर्चा में आये बालेंद्र शाह ने दस साल में अपनी छवि राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध में आक्रोश को स्वर देने वाले रैप गायक की बनायी. उनके तेवर नेपाली स्वाभिमान जगाने वाले थे, जिसमें नेपाल को अंतरराष्ट्रीय दबाव से मुक्त कर एक सशक्त देश बनाने की आकांक्षा शामिल थी. यह सब तब हो रहा था, जब नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के लंबे संघर्ष के बाद नेपाल से 2008 में राजशाही विदा हो चुकी थी. आम जनता को उम्मीद थी कि 2015 के नये संविधान और प्रतिनिधि सभा के लिए चुनाव के रास्ते मुख्यधारा के राजनीतिक दल एक समृद्ध नेपाल बनाने के सपने को जमीन पर उतारने में सफल होंगे. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं.
वर्ष 2017 से 2025 के बीच गठबंधन सरकारों में सत्ता की अदला-बदली का खेल शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के बीच चलता रहा. ये तीनों पूर्व प्रधानमंत्री 2025 तक सत्तर की उम्र पार कर चुके थे और सत्ता के लोभ में इनके दलों की विचारधारा और सिद्धांत पीछे छूट रहे थे. अस्थायी सरकारों के उस दौर में नेपाल में बेरोजगारी, पलायन और आर्थिक असमानता बढ़ती गयी. नेताओं पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के गहरे आरोप लगे. इसी बीच 2022 में बालेंद्र शाह ने जब युवाओं का आह्वान करते हुए, स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में मुख्य राजनीतिक दलों को दरकिनार कर काठमांडू में मेयर का चुनाव जीता और राजधानी में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाये, तो उनका राजनीतिक कद बढ़ गया. उन्होंने खुद को पुरानी पीढ़ी के राजनेताओं के विकल्प के रूप में पेश किया.
वर्ष 2022 में ही लोकप्रिय टीवी एंकर रवि लामिछाने ने कुछ उच्च शिक्षित युवाओं के साथ आरएसपी यानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की और राजनीतिक चेहरे के रूप में उभरे. देश के युवा सोशल मीडिया पर भ्रष्ट राजनीतिक दलों और नेताओं के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार कर रहे थे. युवाओं के बढ़ते आक्रोश को रोकने के लिए सितंबर, 2025 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री केपीशर्मा ओली ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया, तो क्षुब्ध युवा सड़क पर उतर गये, सरकार को घुटने टेकने पड़े, प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और देश को आम चुनाव में जाना पड़ा. सोशल मीडिया ने ही बालेंद्र शाह और सौदान गुरुंग जैसे युवाओं को सत्ता तक पहुंचाया है. इस महीने हुए चुनाव में बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री पद तक भी सोशल मीडिया ने ही पहुंचाया है.
बालेंद्र शाह को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने के पीछे युवाओं के लिए रोजगार सृजन, देश की आर्थिक उन्नति और भ्रष्टाचार के खात्मे जैसे वादों की लंबी सूची है. चुनाव में आरएसपी की जीत और नेपाल की पारंपरिक पार्टियों की हार के बीच ‘माध्यम’, ‘सोच’ और ‘नेतृत्वकर्ता’ का फर्क साफ है. पर सरकार की आलोचना करने और सरकार चलाने में फर्क होता है. चुनाव में दो तिहाई बहुमत हासिल करने वाली नयी सरकार से उम्मीदें बहुत हैं और नेताओं पर अपने किये गये वादे पूरा करने का दबाव भी है. लाखों लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है, तो असंख्य लोग आर्थिक अवसर पाते ही देश में लौटना चाहते हैं. पर युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच क्या नेपाल आर्थिक उन्नति का कोई नया मॉडल दिखा सकता है?
आर्थिक समृद्धि के लिए दूसरे देशों के साथ नेपाल के रिश्तों और व्यापार की शर्तों की अहम भूमिका होगी. अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते बालेंद्र शाह की सरकार को अतिरिक्त संकट का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि नेपाल की बड़ी आबादी खाड़ी देशों में काम करती है और नेपाल की जीडीपी में खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस की हिस्सेदारी करीब तीस फीसदी है. अंतरराष्ट्रीय मंच पर उभार के साथ यह भी संभव है कि बालेंद्र शाह पड़ोसी देशों के साथ कुछ मुद्दों पर अब अलग स्टैंड लें. नेपाल के साथ ऐतिहासिक संबंधों के चलते भारत सरकार काठमांडू के साथ सहयोग के लिए सदैव तत्पर रहती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने पर बालेंद्र शाह को न सिर्फ बधाई दी है, बल्कि दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों की उम्मीद भी जताई है. भारत-नेपाल के बीच खुली सीमा के साथ नेपाल में एक मजबूत सरकार बनने से सीमा के आर-पार अपराध, तस्करी और अवैध कारोबार को रोकने में मदद मिलेगी. भारत और नेपाल बिजली उत्पादन, कृषि ,शिक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकते हैं.
अपने शपथ ग्रहण समारोह में बालंद्र शाह ने जिस तरह हिंदू और बौद्ध परंपरा के मंत्रोचार और शंखनाद को शामिल किया है, उससे स्पष्ट है कि वह नेपाल की मध्यमार्गी राजनीति के साथ अपना विस्तार करना चाहते हैं. प्रधानमंत्री के रूप में बालेंद्र शाह की भूमिका और पड़ोसी देशों के साथ उनकी सरकार के रिश्तों का मूल्यांकन तो आने वाला समय बतायेगा, लेकिन घरेलू राजनीति भी उनके लिए चुनौतियों से भरी है. आरएसपी के प्रमुख रवि लामिछाने के साथ तालमेल बिठाने के साथ उन पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने का दबाव भी उन पर होगा. जेन जी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट पर नयी सरकार क्या कार्रवाई करती है, यह देखना होगा, लेकिन सरकार गठन के अगले ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी से नयी सरकार पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं और विपक्षी राजनीतिक पार्टियां इसे बदले की भावना से की गयी कार्रवाई बता रही हैं. ऐसे में, सरकार के खिलाफ संसद से सड़क तक राजनीतिक आंदोलन होने की आशंका भी बढ़ गयी है.
ऐसे में, सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं को धैर्य के साथ देखना होगा कि पार्टी और सरकार के बीच तालमेल कैसे बैठता है तथा पार्टी कैसे एकजुट रहती है. नेपाल के सभी इलाकों के लोगों को सेना, पुलिस और अन्य रोजगार क्षेत्रों में समान अवसर मिले, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा. नेपाल के मीडिया को इस नये प्रयोग को उम्मीद से देखना होगा कि अगले बारह महीने तक इस सरकार का रुझान क्या रहता है. आने वाला समय बतायेगा कि क्या वास्तव में नेपाल में बिना भ्र्ष्टाचार के विकास का मार्ग प्रशस्त हो रहा है अथवा राजनीति की नयी पिच और प्रयोग भी कुछ नये अभिजनों के उभार तक सीमित रहते हैं? (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
