बढ़ती गर्मी और तपती रातों से बढ़ता स्वास्थ्य संकट

Heat wave : लगातार गर्मी के संपर्क में रहने से हृदय, फेफड़ों, किडनी और मस्तिष्क पर दबाव बढ़ता है. पसीने के कारण शरीर में पानी की कमी होती है और अत्यधिक तापमान निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) तथा इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन पैदा कर सकता है.

-डॉ राहुल शर्मा-
(पल्मोनोलॉजिस्ट, फोर्टिस अस्पताल, नोएडा dmrahulsharma@gmail.com)

Heat wave : भारत में गर्मियां लगातार अधिक कठोर होती जा रही हैं और देश के विभिन्न क्षेत्रों में तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है. अब केवल दिन ही नहीं, रातें भी राहत देने में असफल हो रही हैं. कई कस्बों और शहरों में गर्म हवाएं पूरे दिन बनी रहती हैं और तापमान रात के समय भी कम नहीं होता. दिन की झुलसा देने वाली गर्मी और रात की लगातार बनी रहने वाली गर्मी मिलकर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर रही हैं. अस्पतालों और क्लीनिकों के डॉक्टरों ने गर्मी से जुड़ी बीमारियों में तेज बढ़ोतरी की सूचना दी है. लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने से सभी आयु वर्ग के लोगों में शरीर में पानी और ऊर्जा की कमी, सांस लेने में परेशानी और नींद में बाधा जैसी समस्याएं आम हो रही हैं. यह स्थिति विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों, बाहर काम करने वाले लोगों और पहले से बीमार व्यक्तियों के लिए अधिक खतरनाक है.


मानव शरीर सामान्य रूप से अपने आंतरिक तापमान को संतुलित रखने की कोशिश करता है. रात के समय पसीना आना और शरीर का ठंडा होना दिन की गर्मी से हुई थकान को कम करने में मदद करता है. लेकिन जब रात में पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, तब शरीर को स्वयं को ठंडा करने और पुनः सामान्य होने में अधिक कठिनाई होती है. लगातार गर्मी के संपर्क में रहने से हृदय, फेफड़ों, किडनी और मस्तिष्क पर दबाव बढ़ता है. पसीने के कारण शरीर में पानी की कमी होती है और अत्यधिक तापमान निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) तथा इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन पैदा कर सकता है. इतना ही नहीं, अत्यधिक तापमान से रक्तचाप में बदलाव के साथ हृदय गति बढ़ जाती है और शरीर की ठंडा करने वाली प्रणाली पर दबाव पड़ता है. यदि समय रहते गर्मी से जुड़ी बीमारियों का उपचार न किया जाये, तो यह जानलेवा हो सकती है. अत: इसके लक्षणों की पहचान भी जरूरी है.


अस्पतालों में आने वाले मरीजों में जो सामान्य लक्षण इन दिनों देखे जा रहे हैं, उनमें अत्यधिक पसीना आना, कमजोरी और थकान, चक्कर आना या बेहोशी, सिरदर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, मतली और उल्टी, मुंह सूखना और निर्जलीकरण, सांस लेने में कठिनाई, दिल की धड़कन तेज होना, नींद में बाधा और चिड़चिड़ापन तथा पेशाब कम आना शामिल है. कुछ लोग लगातार थकान, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, बेचैनी और अधूरी नींद की समस्या से भी जूझ रहे हैं, क्योंकि रात में शरीर पूरी तरह ठंडा नहीं हो पा रहा. गंभीर मामलों में व्यक्ति हीट एग्जॉशन या हीट स्ट्रोक का शिकार भी हो सकता है.

हीट स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़कर अक्सर 104 डिग्री फॉरेनहाइट से ऊपर पहुंच जाता है. इससे भ्रम, बेहोशी, दौरे पड़ने और अंगों के फेल होने जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है. अधिकतर लोग दिन की गर्मी से परेशान होते हैं, पर रात का ऊंचा तापमान भी उतना ही नुकसानदायक हो सकता है. सामान्यतः ठंडी रातें शरीर का तापमान कम करती हैं और शरीर को पुनः स्वस्थ होने का अवसर देती हैं. लेकिन जब पूरी रात तापमान ऊंचा बना रहता है, तो यह तनाव शरीर के लिए लगातार बना रहता है, जिससे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं जन्म लेती हैं. बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों में पुरानी बीमारियां और अधिक गंभीर हो जाती हैं, विशेष रूप से हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, मधुमेह और स्लीप एपनिया जैसी समस्याएं. हीटवेव श्वसन संबंधी समस्याओं को भी बढ़ा सकती हैं.

गर्म और शुष्क हवा, धूल, प्रदूषण और निर्जलीकरण मिलकर श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं. अस्थमा, सीओपीडी, एलर्जी या अन्य फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित लोगों को सांस फूलने, सीटी जैसी आवाज के साथ सांस लेने, सीने में जकड़न, खांसी, शारीरिक गतिविधि सहन करने की क्षमता में कमी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. उच्च तापमान जमीन के पास ओजोन और प्रदूषण के स्तर को भी बढ़ाता है, जिससे सांस लेना और कठिन हो जाता है. अत्यधिक गर्मी के दौरान अस्थमा अटैक और श्वसन संकट के गंभीर मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं.


गर्म रातों के कारण बाधित होनेवाली नींद उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी जटिलताएं, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी, कार्यक्षमता में कमी और तनाव हार्मोन के बढ़ने जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है. गर्मी केवल शरीर को ही नहीं, मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है. इस कारण चिड़चिड़ापन, चिंता, निराशा व उदासी तथा एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं. बिना अधिक शारीरिक मेहनत किये भी लोग मानसिक रूप से थका हुआ महसूस कर सकते हैं. दैनिक कार्य करने में परेशानी होती है. बच्चे अधिक चिड़चिड़े हो सकते हैं, जबकि बुजुर्गों में भ्रम और असामान्य व्यवहार देखने को मिल सकता है. यदि लोग शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक रहें और कुछ सावधानियां बरतें, तो गर्मी से होने वाली बीमारियों से बच सकते हैं. अत्यधिक गर्मी अब केवल मौसमी असुविधा नहीं रह गयी है, यह एक गंभीर पर्यावरणीय और चिकित्सकीय खतरा बन चुकी है. यदि यह स्थिति आगे भी जारी रही, तो भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए लोगों को अपनी जीवनशैली में बदलाव और गर्मी से जुड़ी बीमारियों के प्रति अधिक जागरूकता अपनानी पड़ेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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