डॉ मयंक मुरारी
चिंतक और लेखक
बाहर की दुनिया में शोर है, भीतर कहीं एक धीमी धुन हमें पुकार रही है. एक कथा है. एक बच्चा अपनी मां से पूछता था, 'मां, कृष्ण की बांसुरी की आवाज कैसी होती थी?' मां ने कहा, 'जब तुम्हारा मन बहुत शोर से भर जाये और अचानक बिना किसी कारण तुम्हें भीतर शांति महसूस हो, तो समझना कि बांसुरी बज रही है.' बच्चा चुप हो गया. शायद पहली बार उसने बांसुरी को कानों से नहीं, हृदय से सुनने की कोशिश की. श्रीकृष्ण की बांसुरी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल एक वाद्य नहीं है. वह आह्वान है, उस अनदेखे संगीत का प्रतीक है, जो मनुष्य को बाहर की उपलब्धियों से भीतर की पूर्णता की ओर बुलाता है.
परमहंस योगानंद के शब्दों में, 'श्रीकृष्ण की बांसुरी भक्तों को समाधि के दिव्य एकत्व और ईश्वर के आनंदमय प्रेम की ओर बुलाती है.' पर प्रश्न है कि क्या हम उस बांसुरी को सुन पा रहे हैं? कृष्ण की बांसुरी की सबसे सुंदर बात संभवत: उसका संगीत नहीं, उसका खाली होना है. बांसुरी अपने भीतर कुछ नहीं रखती. वह खोखली है. इसीलिए कृष्ण उसमें से संगीत निकाल सकते हैं. मनुष्य भी जब तक अपने भीतर बहुत कुछ भरे रहेगा, तब तक भीतर संगीत के लिए जगह नहीं बचेगी. बांसुरी बनना है, तो भीतर से थोड़ा खाली होना होगा. आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन है, पर भीतर पहले से अधिक बेचैनी भी है.
हम हर जगह जुड़े हुए हैं, पर स्वयं से कटे हुए. हम हजारों लोगों को जानते हैं, पर अपने भीतर बैठे व्यक्ति से परिचित नहीं. हम लगातार कुछ सुन रहे हैं, पर उस एक धुन को नहीं सुन पा रहे, जो हमें हमारी वास्तविक प्रकृति की ओर बुलाती है. कृष्ण की बांसुरी कहती है, थोड़ा रुक जाओ, सब कुछ अभी करना आवश्यक नहीं है. हर प्रश्न का उत्तर अभी चाहिए, यह भी आवश्यक नहीं. हर इच्छा पूरी करना जीवन का उद्देश्य नहीं. कभी-कभी केवल बैठना भी साधना है. सांस को आते-जाते देखना भी ध्यान है. अपने भीतर उठती हुई एक शांत अनुभूति को सुन लेना भी प्रार्थना है. कुरुक्षेत्र बाहर नहीं, भीतर भी है. कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि से हटकर ध्यान करने को नहीं कहा. उन्होंने उसे वहीं खड़े होकर योग सीखने को कहा.
यही 'श्रीमद्भगवद्गीता' का अद्भुत संदेश है. 'जीवन की परिस्थितियां आदर्श होने की प्रतीक्षा मत करो, क्योंकि आदर्श परिस्थितियां शायद कभी नहीं आयेंगी. काम रहेगा, परिवार रहेगा, जिम्मेदारियां रहेंगी, मतभेद रहेंगे. असफलताएं आयेंगी. शरीर थकेगा. मन विचलित होगा. फिर भी योग संभव है. एक व्यक्ति ने साधु से कहा, 'मैं ध्यान नहीं कर सकता. घर में बहुत शोर है.' ध्यान शोर के समाप्त होने का नाम नहीं है. ध्यान है शोर के बीच भी भीतर की निस्तब्धता को पहचान लेना. यही कृष्ण का योग है. जीवन से भागना नहीं, जीवन में जागना. हम प्राय: सोचते हैं, 'जब परिस्थितियां ठीक हो जायेंगी, तब ध्यान करेंगे.' 'जब नौकरी का तनाव कम होगा, तब आध्यात्मिक जीवन शुरू करेंगे.' 'जब बच्चे बड़े हो जायेंगे, तब अपने लिए समय निकालेंगे.' 'जब सारी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी, तब शांति मिलेगी.' पर कृष्ण जैसे पूछते हैं, 'यदि शांति परिस्थितियों पर निर्भर है, तो वह शांति कैसी?'
योग का अर्थ जीवन छोड़ना नहीं है. योग का अर्थ है जीवन के बीच स्वयं को न खोना. काम करो, पर काम में स्वयं को मत खोओ. प्रेम करो, पर अधिकार मत बनाओ. सफल हो, पर सफलता को अपनी पहचान मत बनने दो. असफल हो, पर असफलता को अपना सत्य मत समझो. यही अनासक्ति है. सबसे बड़ा विकर्षण बाहर नहीं, भीतर है. हम प्राय: कहते हैं, 'लोग मुझे परेशान करते हैं, परिस्थितियां मुझे परेशान करती हैं, दुनिया मुझे शांति नहीं देती.' पर थोड़ा भीतर देखें. कई बार समस्या परिस्थिति नहीं होती. समस्या उस परिस्थिति के प्रति हमारी पकड़ होती है. हमारी इच्छा के अनुसार होता है, तो हम प्रसन्न. कुछ विपरीत होता है, तो हम दुखी. हमारी शांति परिस्थितियों के हाथों में चली जाती है.
कृष्ण का संदेश है, 'कर्म करो, पर कर्मफल को अपनी चेतना का स्वामी मत बनने दो. तुम्हारा काम तुम्हारे हाथ में है. परिणाम हमेशा तुम्हारे हाथ में नहीं. फिर परिणाम के साथ अपनी आत्मा को क्यों बांधना?' समर्पण शब्द सुनते ही मनुष्य को लगता है कि शायद वह कमजोर हो जायेगा. पर आध्यात्मिक समर्पण कमजोरी नहीं है. यह उस तनाव का अंत है, जिसमें हम जीवन को लगातार अपनी इच्छा के अनुसार चलाना चाहते हैं. समर्पण का अर्थ है, 'मैं अपना सर्वोत्तम दूंगा, पर अंतिम नियंत्रण अपने हाथ में रखने की जिद नहीं करूंगा.' यह हार नहीं. यह भरोसा है. एक नदी पहाड़ से निकलती है. वह रास्ते में चट्टानों से लड़ती नहीं रहती. जहां रास्ता मिलता है, बहती है. जहां मोड़ आता है, मुड़ती है. जहां ढलान है, उतरती है. और अंततः समुद्र में पहुंच जाती है. उसका समर्पण ही उसकी यात्रा की पूर्णता है.
कृष्ण की बांसुरी कहां बजती है? वह मंदिर में बज सकती है, भजन में बज सकती है, ध्यान में सुनाई दे सकती है. पर शायद वह सबसे अधिक वहां बजती है, जहां तुम बिल्कुल अकेले होते हो. जब तुम अपने विचारों के साथ चुप बैठे होते हो. वहीं कहीं भीतर, एक बहुत धीमी धुन उठती है. वह कहती है, 'तुम वह नहीं हो जिसे दुनिया देख रही है. तुम उससे कहीं अधिक हो.' यदि थोड़ी देर के लिए भीतर शांति उतर आये, तो उसे पकड़ने की कोशिश मत कीजिए. बस सुनिए. शायद वही, कृष्ण की बांसुरी और उसकी धुन है. कृष्ण की बांसुरी बाहर से सुनाई देने वाली कोई पुरानी कथा नहीं. वह आज भी बज रही है. बस दुनिया बहुत शोर में है, और मन बहुत भरा हुआ. थोड़ा खाली हो जाइए, शांत हो जाइए, परिणाम छोड़ दीजिए, अपने भीतर लौट आइए. जिस बांसुरी की धुन के लिए आप दूर-दूर तक भटक रहे थे, वह बांसुरी बाहर कभी थी ही नहीं. वह आपके भीतर बज रही थी. बस, हमें सुनना सीखना था.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
