बढ़ती आर्थिक चिंताएं

पर्यटन, वाहन, संचार, दवा जैसे उद्योगों को उबारने के लिए विशेष नीति बनायी जानी चाहिए, क्योंकि ये सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं.

भारत समेत विश्व के अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं में इस वर्ष सुधार की उम्मीदें थीं, लेकिन कोरोना वायरस के व्यापक संक्रमण से अब ये उम्मीदें धुंधली पड़ रही हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आशंका जतायी है कि उनके देश की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जा सकती है. कोविड-19 के कारण चीन के निर्माण और निर्यात पर बहुत खराब असर पड़ा है. वस्तुओं और पूंजी के उत्पादन और उपलब्धता में इन देशों का महत्वपूर्ण योगदान है. अंतरराष्ट्रीय आर्थिकी का एक विशेष केंद्र यूरोप भी कोरोना की चपेट में है. भारत समेत एशिया और अफ्रीका के अनेक देश भी इस महामारी से जूझ रहे हैं. यात्राओं पर रोक, कार्यालयों के बंद होने तथा आयोजनों के रद्द होने से अनेक कारोबार घाटे में जा चुके हैं. इसका साफ असर दुनिया के अहम स्टॉक बाजारों पर देखा जा सकता है. तेल की कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है. आर्थिक गतिविधियों में कमी आने से इस गिरावट का पूरा फायदा नहीं उठाया जा सकता है.

हालांकि, यह बड़े संतोष की बात है कि हमारे देश में संक्रमित लोगों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है और अधिकतर संक्रमण यात्राओं से संबंधित हैं, लेकिन रोकथाम की कोशिशों से हमारी आर्थिकी पर भी नकारात्मक असर होना स्वाभाविक है. ऐसे में एक चुनौती संक्रमण पर काबू पाने की है, तो दूसरी मुश्किल अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाये रखने की. घनी आबादी, साफ-सफाई की कमी और कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं के मद्देनजर यह डर बेमतलब नहीं है कि अगर यह वायरस नियंत्रित नहीं हुआ, तो बड़ी तबाही हो सकती है. सरकार की ओर से तमाम कोशिशें हो रही हैं, पर अभी संकट के बारे में अंदाजा लगा पाना संभव नहीं है.

ऐसे में जहां महामारी को रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता है, वहीं निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था को मदद देने के लिए उपायों और पूंजी उपलब्ध रखने पर भी ध्यान देना जरूरी है. ध्यान रहे, बीते कई महीनों से वृद्धि दर लगातार घटी है और मांग में कमी आयी है. बैंकिंग सेक्टर भी समस्याओं से घिरा है. बेरोजगारी और ग्रामीण संकट भी बरकरार हैं. ऐसे में सरकार को स्वास्थ्य सेवा की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खर्च करना चाहिए. स्वच्छ खान-पान और साफ-सफाई पर ध्यान देने की जरूरत है. इन कोशिशों से कोरोना को रोकने में तो मदद मिलेगी ही, ये खर्च भविष्य के लिए मजबूत आधार बन सकते हैं.

पर्यटन, वाहन, संचार, दवा जैसे उद्योगों को उबारने के लिए विशेष नीति बनायी जानी चाहिए, क्योंकि ये सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं. वर्ष 2008 का वित्तीय संकट पूंजी व निवेश से जुड़ा था, लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण से पैदा हुई स्थितियों ने दुनिया को हर स्तर पर प्रभावित किया है. जानकारों की मानें, तो अब वैश्विक मंदी महज एक आशंका नहीं है, बल्कि उसकी आहटें साफ सुनी जा सकती हैं. ऐसे में इस आपात स्थिति से निबटने की कोशिशें भी आपात स्तर पर होनी चाहिए.

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Published by: संपादकीय

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