जैव विविधता पर ध्यान

पर्यावरण मंत्री ने उचित ही कहा है कि इस सम्मेलन में निर्धारित होने वाले लक्ष्य एवं कार्यक्रम महत्वाकांक्षी अवश्य हों, किंतु वे व्यावहारिक और यथार्थ पर आधारित भी होने चाहिए.

कनाडा के मॉन्ट्रियल में आयोजित जैव-विविधता सम्मेलन (कॉप15) में भारत ने आशा व्यक्त की है कि इस बैठक में आम सहमति से ठोस निर्णय लिया जायेगा. संयुक्त राष्ट्र के इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि पारिस्थितिकी के नुकसान की भरपाई करना तथा वैश्विक स्तर पर हो रहे जैव विविधता के ह्रास को रोकना लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास और कल्याण के लिए आवश्यक है.

उन्होंने इस संबंध में भारत में हो रहे प्रयासों का उल्लेख भी किया. हमारा देश विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं, कीट-पतंगों, पक्षियों और पेड़-पौधों से समृद्ध है. धरती के संतुलन को बनाये रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, मानवीय विकास, प्रदूषण तथा देख-रेख के अभाव जैसे कारकों ने जैव-विविधता को संकट में ला दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण संरक्षण, नदियों के उद्धार, नदी तटों की पारिस्थितिकी, वन्य जीव संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार आदि से संबंधित कार्यक्रमों एवं नीतियों के माध्यम से जैव-विविधता को बेहतर करने को सरकार की प्राथमिकताओं में सम्मिलित किया है.

इस संबंध में सूचनाओं तथा तकनीकों के आदान-प्रदान के लिए भारत अन्य देशों से सहकार भी कर रहा है. जलवायु परिवर्तन को लेकर विकासशील देशों के प्रति जो रवैया विकसित राष्ट्रों का रहा है, वह जैव-विविधता के मामले में भी दिख रहा है. विकसित देश ऐतिहासिक रूप से जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता के ह्रास के लिए जिम्मेदार हैं, पर अब वे उसकी भरपाई में आगे बढ़कर योगदान देने की जगह विकासशील देशों से ऐसी अपेक्षाएं कर रहे हैं, जिनसे इन देशों की विकास गतिविधियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

भारतीय पर्यावरण मंत्री ने उचित ही कहा है कि इस सम्मेलन में निर्धारित होने वाले लक्ष्य एवं कार्यक्रम महत्वाकांक्षी अवश्य हों, किंतु वे व्यावहारिक और यथार्थ पर आधारित भी होने चाहिए. विकसित देश चाहते हैं कि भारत कृषि पर दिये जा रहे अनुदानों में बड़ी कटौती करे और उस धन को जैव-विविधता के संरक्षण में लगाये. देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा कृषि पर आश्रित है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे प्रमुख आधार है. ऐसे में कृषि अनुदानों में भारी तो क्या, मामूली कटौती भी हमारे आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं. खाद्य सुरक्षा बनाये रखना भी भारत जैसे देशों के लिए बहुत जरूरी है.

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