सोशल मीडिया से बच्चों को बचाने की कोशिश, पढ़ें उमेश चतुर्वेदी का लेख

यूरोप के कई देश किशोरों के बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इंडोनेशिया जैसे देशों के नियम और बच्चों पर इसके असर के बारे में जानें.

किशोरों और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यूरोप के कई देशों ने पंद्रह या सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी है. इसका अगुआ होने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया को है, जिसने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्मों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है. इसी तरह फ्रांस ऐसा कानून बनाने वाला यूरोप का पहला देश बन गया है.

वहां की संसद ने पंद्रह वर्ष तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने का कानून पारित कर दिया है. हालांकि, फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना है. वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अदालत के फैसले के बाद कहा है कि इस कानून को लागू करने के लिए अदालती फैसले के मद्देनजर जरूरी सुधार कर इसे फिर से संसद से पारित कराया जायेगा. जिस पश्चिमी दुनिया में सोशल मीडिया का आविष्कार हुआ, जिन्होंने कभी अरब देशों में क्रांति के लिए सोशल मीडिया की सराहना की थी, अब उन्हें ही यह माध्यम अपने बच्चों का दुश्मन लगने लगा है. इसकी वजह है वहां के बच्चों और किशोरों का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई का गिरता स्तर.

इस कारण अमेरिका तक में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ लोगों में नाराजगी दिख रही है. दुनियाभर में बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य में आ रही गिरावट और बढ़ते मानसिक तनाव को जिम्मेदार माना जा रहा है. कई शोधों से पता चला है कि लगातार स्क्रीन देखने और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बच्चे दूसरों की जीवनशैली से स्वयं की तुलना करने लगे हैं. इससे उनमें हीन भावना, तनाव और डिप्रेशन बढ़ रहा है. इस कारण उनकी नींद में कमी आ रही है. देर रात तक फोन चलाने के कारण बच्चों की सोने की आदत बिगड़ रही है और उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है.

जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया एप्स का एल्गोरिदम ऐसा है जिससे बच्चे ही नहीं, बड़े भी उसकी लत का शिकार हो रहे हैं. इसी एल्गोरिदम के कारण नकारात्मक, हिंसा प्रधान और सेक्स से जुड़ी खबरें तथा दृश्य जल्दी वायरल होते हैं. सोशल मीडिया ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का भी बड़ा और आसान माध्यम बन गया है. इसके चलते बच्चे मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं. इसीलिए कई देशों की सरकारें बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी में हैं. रोक लगाने वालों में इंडोनेशिया भी शामिल हो चुका है, जिसने मार्च, 2026 से इसके नियम लागू कर दिये हैं.

इनके अनुसार, 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और रोब्लॉक्स जैसे हाइ रिस्क प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी गयी है. मलेशिया ने भी 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगा रखी है. संयुक्त अरब अमीरात ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम उम्र 15 वर्ष तय की है. डेनमार्क में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ब्लॉक करने का कानून बन चुका है. इसी तरह ब्रिटेन की सरकार ने भी 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जो जनवरी, 2027 से प्रभावी होने जा रही है.

तुर्की में भी 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए कानून को मंजूरी मिल चुकी है, जिसे 2026 के अंत तक लागू किया जाना है. चीन में किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी तो नहीं है, पर उनके लिए सख्त 'माइनर मोड' लागू है. ब्राजील में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपने सोशल मीडिया खाते को माता-पिता या कानूनी अभिभावक से जोड़ना अनिवार्य है. जर्मनी में भी इसी तरह का नियम लागू हो चुका है. स्वीडन समेत कई अन्य देश भी ऐसी तैयारी में हैं.

अपने यहां कर्नाटक भी ऐसे कानून पर काम कर रहा है. जबकि नोएडा के जिला प्रशासन ने स्कूलों में ऑनलाइन के इस्तेमाल को सीमित करने का निर्देश दिया है. इसमें दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का उपयोग यदि सही तरीके से किया जाये, तो उसकी पहुंच और त्वरा समाज को कई तरह के लाभ दिला सकती है. व्यवस्था की खामियां उजागर करके उस पर दबाव बनाया जा सकता है. पर यह स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश में सोशल मीडिया अर्धनग्नता और अश्लीलता का वाहक बनता जा रहा है. सोशल मीडिया के लिए कोई सेंसर नीति न होने के चलते सबकी पहुंच किशोरों और बच्चों तक हो रही है. इसलिए जरूरी है कि पश्चिम की तरह अपने यहां भी इस पर ध्यान दिया जाये और महामारी बनने से पहले इस पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू हो.

दिसंबर, 2010 में ट्यूनीशिया से शुरू हुई लोकतंत्र समर्थक लहर सोशल मीडिया के इतिहास का निर्णायक बिंदु है. सोशल मीडिया के सहारे यह लहर काहिरा के तहरीर चौक से सीरिया और लीबिया होते हुए समूचे अरब जगत में फैल गयी. भारत की बात करें, तो लंबे यूरोपीय शासन और शिक्षा-दीक्षा के चलते भारतीय मानस अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से कहीं ज्यादा प्रभावित है. इसलिए यहां सोशल मीडिया पर ऑस्ट्रेलिया और दूसरे पश्चिमी देशों जैसे प्रश्न नहीं उठे. बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि हम भी पश्चिमी देशों से सबक लेंगे और अपने बच्चों को स्वस्थ रखने और बचाने की कोशिश करेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By उमेश चतुर्वेदी

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >