पुलिस के काम में हस्तक्षेप कम हो

राजनेताओं को पुलिस विभाग के आंतरिक कामकाज में दखल तभी देना चाहिए, जब किसी बड़ी गड़बड़ी को ठीक करना हो या व्यापक लोक कल्याण के लिए पुलिस को मार्गदर्शन देना हो.

महाराष्ट्र में केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा कुछ पुलिसकर्मियों और नेताओं के बीच चल रहे झगड़े की अब कानूनी तौर पर जांच की जा रही है. इसका आदेश बंबई सुप्रीम कोर्ट ने दिया है. यह विश्लेषण उस विशेष मुद्दे पर नहीं है, बल्कि इसमें आम जनता को प्रभावित करनेवाले पुलिस और राजनेताओं के संबंध के व्यापक विषय पर चर्चा की गयी है.

वर्ष 1979 में आयी धर्मवीर राष्ट्रीय पुलिस आयोग की दूसरी रिपोर्ट में रेखांकित किया गया था कि जिस प्रकार स्थानांतरण या निलंबन की धमकी देकर भारत में पुलिस के ऊपर राजनीतिक नियंत्रण को साधा जाता है, उससे भारी गड़बड़ियां होती हैं, जिससे कानून-व्यवस्था का ह्रास होता है तथा एक पेशेवर संगठन के तौर पर पुलिस की साख को नुकसान होता है.

इस आयोग ने सिफारिश दी थी कि राज्य सरकार का पुलिस पर अधीक्षण सीमित होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पुलिस व्यापक नीतियों के तहत और कानून के ठोस अनुपालन के अनुसार काम करे. इसमें यह भी कहा गया था कि कार्यक्षेत्र में वास्तविक कार्यवाही के संबंध में किसी तरह का निर्देश नहीं दिया जाना चाहिए. महाराष्ट्र की विभिन्न सरकारें इस नीति का कमोबेश पालन करती रही थीं.

इस राज्य के पुलिस विभाग में मैं 1976 तक कार्यरत था. मुझे 1974 का एक वाकया याद आता है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी नाइक पुलिस आयुक्त से एक पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ एक ताकतवर कांग्रेस विधायक की शिकायत पर चर्चा कर रहे थे. पुलिस इंस्पेक्टर मध्य मुंबई के एक अहम थाने में कार्यरत था. मैं वहां मौजूद था. तब मैं मुंबई विशेष शाखा का प्रमुख था और इस नाते मुझे रोज मुख्यमंत्री से मिलना होता था.

मुख्यमंत्री ने पुलिस आयुक्त को ‘सुझाव’ देते हुए कहा कि उक्त इंस्पेक्टर को स्थानांतरित किया जा सकता है. आयुक्त ने पहले ही विधायक की शिकायत पर जांच कर ली थी और उन्होंने पाया था कि शिकायतें सही नहीं हैं. उन्होंने स्थानांतरण का विरोध किया. मुख्यमंत्री ने इस मामले पर आगे कोई जोर नहीं दिया और उसका तबादला नहीं हुआ.

विभिन्न कारणों से इस स्थिति में एक दशक बाद भारी बदलाव आया. साल 1987 में महाराष्ट्र सरकार ने एक विधेयक लाकर 1951 के बंबई पुलिस कानून के प्रावधान संख्या चार को संशोधित कर दिया. इसके तहत पुलिस के नियंत्रण, निर्देश और निगरानी को सीधे राज्य के गृह विभाग के अधीन कर दिया गया. प्रावधान संख्या छह में उल्लिखित पुलिस प्रमुख के अधिकार को इतना कमजोर कर दिया गया कि वह सामान्य काम के लिए भी गृह विभाग पर निर्भर हो गया.

दूसरे शब्दों में, पुलिस महानिदेशक का पद नाममात्र भर रह गया. उदाहरण के लिए तमिलनाडु से इसकी तुलना दिलचस्प है. तमिलनाडु जिला पुलिस कानून के प्रावधान संख्या चार में पुलिस के अधीक्षण का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है, पर प्रावधान संख्या पांच में पुलिस के प्रशासन का अधिकार पुलिस महानिदेशक को दिया गया है.

बहरहाल, महाराष्ट्र के कानूनी बदलाव के बाद राज्य का गृह विभाग पुलिस इंस्पेक्टरों के पदस्थापन को भी नियंत्रित करने लगा, जिनकी संख्या हजारों में होती है. वहां अस्सी के दशक तक राज्य स्तर पर यह अधिकार महानिदेशक, क्षेत्र स्तर पर उप महानिरीक्षक तथा जिला स्तर पर अधीक्षक के पास होता था. महानिदेशक को केवल उपाधीक्षक को जिले के बाहर पदस्थापित करने के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी, क्योंकि इन्हें वरिष्ठ पद माना जाता था.

इसका नतीजा विभिन्न स्तरों पर पुलिस अधिकारियों की स्वतंत्रता के पूरी तरह कमजोर होने के रूप में सामने आया. ऐसा इसलिए हुआ कि अधिकारी वैसे नेताओं का मुंह देखने लगे, जो उन्हें अच्छी जगह पदस्थापित कराने में मददगार हो सकते थे. इस रवैये से भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी भी ग्रसित हुए, जिनमें से कुछ किसी ग्रामीण या आदिवासी जिले में काम किये बिना लगातार आरामदायक शहरी पदों पर बने रहे. इसका नतीजा पुलिस बल में अनुशासन के पतन के रूप में सामने आया, जिसका असर जनता के प्रति पुलिस की जवाबदेही पर हुआ.

साल 2008-09 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा नियुक्त दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति का मैं सदस्य था, जिसे मुंबई आतंकी हमले में पुलिस कार्रवाई की जांच करनी थी. हमने पाया कि अपनी राजनीतिक पहुंच की वजह से इंस्पेक्टर स्तर के कुछ अधिकारी अपने वरिष्ठों से सलाह किये बिना फैसले ले रहे थे. अधिकारियों को ऐसे फैसलों की जानकारी बाद में मिलती थी. इस कारण पुलिस की क्षमता प्रभावित हुई थी.

इन सब चीजों के सबसे बड़े पीड़ित आम लोग हैं. शहरी क्षेत्रों में इंस्पेक्टर स्तर के कुछ थाना प्रभारियों का घमंड असीम है. कुछ साल पहले मेरी एक रिश्तेदार को पासपोर्ट के सत्यापन के लिए पुलिस की मदद की जरूरत थी. उनके साथ निचले स्तर के कर्मियों का व्यवहार अच्छा था और उन्होंने अपना काम भी जल्दी कर दिया.

जब उन्होंने उन कर्मियों की प्रशंसा की, तो उन लोगों ने इसका उल्लेख थाना प्रभारी से करने का अनुरोध किया. वह महिला प्रभारी का दरवाजा खटखटा कर अंदर चली गयीं. फिर तो जो हुआ, वह अपेक्षित ही नहीं था. थाना प्रभारी ने कमरे में आने के लिए उन्हें डांटा और तुरंत बाहर निकल जाने को कहा.

साल 2011 में महाराष्ट्र के एक पूर्व गृहमंत्री ने मुंबई के आपराधिक मामलों के दस्तावेज खुद देखने का चलन शुरू किया था. सचिवालय में हर रोज 13 क्षेत्रीय उपायुक्तों और उनके जांच अधिकारियों को घंटों खड़ा रहना पड़ता था और मंत्री द्वारा उनके काम की समीक्षा के लिए इंतजार करना पड़ता था.

इस तरह जनता के लिए उपलब्ध रहने के उनके कई घंटे बर्बाद हो जाते थे. यह बुनियादी गड़बड़ी है, जिससे न केवल महाराष्ट्र, बल्कि अन्य राज्यों की पुलिस भी प्रभावित है. पुलिस बल को अपना काम करने की समुचित स्वतंत्रता दिये बिना समस्या का समाधान संभव नहीं है.

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