खाद्य तेलों का कम उपयोग अर्थव्यवस्था के हित में

देश में उत्पादित खाद्य तेलों का 67.4 प्रतिशत विभिन्न प्राथमिक तिलहनों से, 5.1 फीसदी नारियल से, 2.2 फीसदी ताड़ से, 11.0 फीसदी कपास के बीजों से, 9.8 फीसदी चावल की भूसी से, 3.1 फीसदी तिलहनों के सॉल्वेंट निष्कर्षण से तथा 1.4 फीसदी वनों एवं वृक्षों से प्राप्त होता है. भारत के पारंपरिक खाद्य तेल स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं.

भारत के बारे में एक आम धारणा यह है कि यह भूख से पीड़ित देश है, लेकिन आज देश में बड़ी संख्या में लोग मोटापे की समस्या से पीड़ित हैं. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से खाद्य तेलों का इस्तेमाल कम-से-कम 10 फीसदी कम करने की अपील की है. उन्होंने चेतावनी दी है कि 2050 तक देश में 44 करोड़ लोग मोटापे की समस्या से पीड़ित होंगे, जो कई बीमारियों की जड़ है. विशेषज्ञों का कहना है कि टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, कैंसर और स्ट्रोक समेत कई बीमारियां मोटापे की वजह से होती हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में मोटापे से पीड़ित महिलाओं की संख्या 20.6 फीसदी से बढ़ कर 24 प्रतिशत, जबकि पुरुषों में यह 18.9 फीसदी से बढ़ कर 22.9 फीसदी हो गयी. यानी हमारी लगभग एक-चौथाई आबादी मोटापे से पीड़ित है.

मोटापे की समस्या आम तौर पर जीवनशैली से जुड़ी होती है. इसके कई कारण हैं, जैसे- शारीरिक श्रम की कमी, वसा (खाद्य तेल), चीनी और नमक का अधिक सेवन आदि. देश में खाद्य तेलों की प्रतिव्यक्ति खपत 1950 से 1960 के दशक में 2.9 किलोग्राम सालाना थी, जो अब अब बढ़कर 19.4 किलोग्राम प्रतिव्यक्ति वार्षिक हो गयी है. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रतिव्यक्ति 13 किलोग्राम की सालाना की अनुशंसित खपत और आइसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) की प्रतिव्यक्ति सालाना 12 किलोग्राम की सिफारिश से कहीं अधिक है.

गौरतलब है कि देश की जनसंख्या 1951 में 35.4 करोड़ से बढ़ कर 2023 तक अनुमानित 143.8 करोड़ हो गयी. और इस दौरान खाद्य तेलों की घरेलू उपलब्धता 13.8 लाख टन से बढ़ कर 114 लाख मीट्रिक टन हो गयी. वर्ष 1951 में देश में खाद्य तेलों का आयात नगण्य ही था, लेकिन 2022-23 तक यह 164.7 लाख टन तक पहुंच गया. घरेलू उत्पादन में आयात को जोड़ कर खाद्य तेलों की कुल उपलब्धता 2022-23 तक 278.7 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गयी. यदि खाद्य तेलों की खपत आइसीएमआर द्वारा अनुशंसित सीमा के भीतर हो, तो घरेलू उत्पादन मौजूदा स्तर पर बने रहने पर भी देश में खाद्य तेलों के आयात की जरूरत सिर्फ 56.64 लाख मीट्रिक टन की ही होगी. देश को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाने तथा आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार ने अक्तूबर, 2024 में खाद्य तेल मिशन शुरू किया, जिसमें प्राथमिक तिलहनों का उत्पादन 2022-23 के 390 लाख टन से बढ़ा कर अगले सात साल में 697 लाख टन करने का लक्ष्य रखा गया है. इससे आयात पर निर्भरता तो कम होगी ही, यदि प्रधानमंत्री की अपील कारगर रही, तो आयात और भी कम हो जाएगा.

इस समय देश में उत्पादित खाद्य तेलों का 67.4 प्रतिशत विभिन्न प्राथमिक तिलहनों से, 5.1 फीसदी नारियल से, 2.2 फीसदी ताड़ से, 11.0 फीसदी कपास के बीजों से, 9.8 फीसदी चावल की भूसी से, 3.1 फीसदी तिलहनों के सॉल्वेंट निष्कर्षण से तथा 1.4 फीसदी वनों एवं वृक्षों से प्राप्त होता है. भारत के पारंपरिक खाद्य तेल स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं. पर विदेशों पर हमारी निर्भरता के कारण बड़ी मात्रा में ऐसे तेल आयात और उपयोग होने लगे, जिन्हें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है. जीएम खाद्य तेलों का भी अवैध रूप से बड़ी मात्रा में आयात किया जा रहा है. आज देश में खाद्य तेलों की कुल खपत का 57 फीसदी आयात से पूरा होता है. खाद्य तेलों के अपर्याप्त उत्पादन, जनसंख्या वृद्धि तथा प्रतिव्यक्ति खपत में लगातार वृद्धि से हानिकारक पाम ऑयल का देश में बड़ी मात्रा में आयात होता है, जिससे हृदय रोग, मोटापा और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, पर सस्ता होने के कारण इसका आयात लगातार बढ़ रहा है. प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों को दी गयी खाद्य तेलों का उपयोग कम करने की सलाह जरूरी सलाह है, जो जन स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. वर्ष 2030 में 151 करोड़ की अपेक्षित आबादी के साथ यदि देश में खाद्य तेलों की प्रतिव्यक्ति वार्षिक खपत 10 फीसदी कम हो जाती है; वहीं खाद्य तेल मिशन के उद्देश्यों के अनुसार देश में खाद्य तेलों का उत्पादन 2022-23 में 114 टन से 78 फीसदी बढ़ कर 2030 तक 203 लाख टन हो जाता है, तो देश में खाद्य तेलों का आयात मौजूदा 164.7 लाख टन से घटकर मात्र 60.7 लाख टन रह जायेगा.

एक आकलन यह है कि 2030 तक देश में मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या मौजूदा आबादी की एक-चौथाई से बढ़कर 44 फीसदी हो सकती है, लेकिन खाद्य तेल की खपत कम होने से इस चिंता का भी कुछ हद तक समाधान हो जायेगा. इससे बीमारियां कम होंगी, बीमारियों पर होने वाला खर्च बचेगा, साथ ही, लोगों की कार्यक्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. यही नहीं, अभी देश के जो तिलहन उत्पादक सस्ते पाम ऑयल के आयात के कारण फिलहाल अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं पा पा रहे, उन्हें भी बेहतर मूल्य मिलने लगेगा, जिससे देश में तिलहन उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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