गांवों की समृद्धि ही दे सकेगी देश को आर्थिक मजबूती

भारत की असली पहचान उसके साढ़े छह लाख गाँव हैं. आज गाँवों की आर्थिकी को मजबूत करना देश की आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है. बिहार का मखाना ब्रांडिंग प्रयोग एक नया मॉडल पेश कर रहा है.

बीते करीब आठ दशकों में, भारत की स्वतंत्रता के बाद यदि कोई सबसे बड़ा पक्ष गांव और ग्राम व्यवस्था को मजबूत करने के लिए खड़ा हुआ, तो वह 72वां और 74वां संविधान संशोधन था, जिसके माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त करने का संकल्प लिया गया और जिसे सभी राज्यों के लिए अनिवार्य रूप से स्वीकार करना भी तय किया गया. सच यह है कि इस देश को केवल बीस हजार शहरों से नहीं नापा जा सकता, न ही एक लाख कस्बों से. बल्कि इस देश की वास्तविक पहचान इसके साढ़े छह लाख गांव हैं. यह भी स्वीकार करना होगा कि पूरी यात्रा में देश ने कई महत्वाकांक्षी योजनाओं के जरिये प्रगति की है, पर आज भी अनेक ऐसे विषय हैं जिनसे गांव अछूते रह गये हैं.

यदि हम पूरी व्यवस्था को आर्थिक दृष्टि से देखें, तो आज किसी भी बड़े बाजार, मेट्रो, राजनीतिक केंद्र, बड़े या छोटे शहरों में बिकने वाले लगभग 75 प्रतिशत उत्पादों का आधार गांव के उत्पाद ही हैं. इतना ही नहीं, यदि गांव के बाजारों को टटोला जाये, तो वहां उपलब्ध कई उत्पाद भी मूलतः गांव के ही होते हैं, पर शहरों में ले जाकर उनकी गुणवत्ता बढ़ायी जाती है और फिर वही उत्पाद वापस गांव के बाजारों में आकर उन्हें पूरी तरह घेर लेते हैं. इसे विडंबना ही कहेंगे कि गांव के उत्पाद का सीधा और बड़ा लाभ स्थानीय गांव को नहीं मिलता, और जब वही उत्पाद शहरों में जाकर मूल्य और गुणवत्ता प्राप्त करता है, तब फिर गांव में ही बिकने लौट आता है.

यह एक बड़ा प्रश्न है, जो पंचायती राज व्यवस्था को चुनौती देता है, जिसका दावा गांव को मजबूत करने का था. यह भी स्वीकार करना होगा कि यदि गांव कहीं मजबूत हुए हैं, तो वह राजनीति के संदर्भ में हुए हैं. जहां पहले एक प्रधान के चुनाव में पूरा गांव सर्वसम्मति से जुड़ता था, आज वहां कई प्रत्याशी खड़े होते हैं. राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने गांव की उस सामूहिक व्यवस्था को कहीं न कहीं चोट पहुंचायी है. पर जो सबसे बड़ा बल होना चाहिए था- गांव की आर्थिकी को मजबूत करने का-उस पर यदि हमने अगला कदम और गहराई से सोचा होता, तो वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता. क्योंकि यदि देश को विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है, तो वह राजनीति से अधिक आर्थिकी के स्तर पर है.

हमारा देश एक कोने से दूसरे कोने तक विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में फैला हुआ है, और उसी के अनुसार वहां के उत्पाद भी भिन्न हैं. यहां समझना होगा कि हम जो अक्सर एग्रो क्लाइमेटिक जोन की बात करते हैं, उसका आधार यही है कि किसी विशेष क्षेत्र में जो कुछ भी पैदा होता है, वही उसकी आर्थिक पहचान बनता है. हमें यह भी समझना चाहिए कि देश की आर्थिकी चाहे जितनी भी डगमगाये, उस समय यदि देश जीवित रहता है, तो वह गांव के कारण ही रहता है-कोविड काल इसका ताजा उदाहरण है. वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट को भी याद करें, जब दुनियाभर में आर्थिक अवसाद आया था.

उस समय भी बैलगाड़ियां सड़कों पर चल रही थीं और उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को ठहरने नहीं दिया. यह समाज आज हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. हम यह मानकर नहीं चल सकते कि दिल्ली, अहमदाबाद या मुंबई की चमक बढ़ने से देश की समृद्धि स्वतः सुनिश्चित हो जायेगी. आज गांव की ओर देखना अधिक आवश्यक है. गांव की देखरेख ही देश की आर्थिक मजबूती का आधार बन सकती है. यह बात भी स्पष्ट है कि आज हम प्रगति कर रहे हैं, पर गांव लगातार कमजोर होते जा रहे हैं. इस असंतुलन पर कहीं न कहीं रोक लगानी होगी. एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम देश की पारिस्थितिकी को उसके मूल आधार से नहीं समझ पा रहे हैं. हम केवल आर्थिक पक्ष पर केंद्रित हैं, जबकि पर्यावरणीय आधार गांवों से जुड़ा है. पानी, भोजन, हवा-ये सब जंगल और गांव की देन हैं. पटना से लेकर मुंबई तक के बाजारों में जंगल नहीं उग सकते. बिहार के पंचायती राज मंत्रालय ने इस दिशा में एक प्रयोग की शुरुआत की है.

इस पहल का मूल उद्देश्य है गांवों को केवल संसाधनों का स्रोत न मानकर, विज्ञान और तकनीक के माध्यम से उन्हीं संसाधनों से बेहतर अर्थव्यवस्था खड़ी करना और उन्हें एक ब्रांड के रूप में स्थापित करना. मखाना यदि किसी विशेष क्षेत्र में होता है, तो उसकी पहचान उसी क्षेत्र से होनी चाहिए. यदि मखाना पैदा करने वाले ही उसकी गुणवत्ता और मूल्यवर्धन करें, तो वास्तविक लाभ उन्हीं को मिलेगा.

इसके लिए संसाधन मैपिंग और पंचायत स्तर पर वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग आवश्यक है. यदि बिहार का यह प्रयोग सफल होता है, तो यह पूरे देश के लिए एक मॉडल बनेगा. यह प्रयोग न केवल राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि यह सरकार के लिए भी स्वयं को प्रमाणित करने का एक अवसर होगा कि वह गांव की जड़ों तक कितनी गहराई से पहुंच सकती है. क्योंकि जितनी ऊंची मंजिल होती है, उतनी ही गहरी नींव की आवश्यकता होती है. और इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस देश की नींव गांव हैं. यदि पंचायती राज मंत्रालय और उसकी टीम इस प्रयोग को सफलतापूर्वक स्थापित कर पाती है, तो यह प्रयोग देश-दुनिया में जाना जायेगा और यह संदेश देगा कि गांव ही देश की असली पहचान हैं-अपने संसाधनों, अपनी विशिष्टता और अपने ब्रांड के साथ. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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लेखक के बारे में

By डॉ अनिल प्रकाश जोशी

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