संविधान एवं सामाजिक न्याय के शिल्पकार थे डॉ आंबेडकर

Dr Ambedkar : डॉ आंबेडकर का योगदान केवल संविधान निर्माण या राष्ट्र निर्माण तक सीमित नहीं है, उनका काम उससे कहीं अधिक व्यापक है. उन्होंने समाज के सबसे वंचित और दबे-कुचले समूहों के रोजमर्रा के अपमान, भेदभाव और अलगाव के खिलाफ संघर्ष किया.

-पंकज कुमार-
(पीएचडी, जामिया मिलिया इस्लामिया
नयी दिल्ली)

हाल के वर्षों में, देश में डॉ भीमराव आंबेडकर की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है. सरकार और देश के सभी राजनीतिक दल भी उन्हें गर्व के साथ एक नायक, महान सुधारक और वंचितों के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करते हैं. हालांकि, यह भी सच है कि समाज और सरकार, दोनों अक्सर उनकी विरासत को बड़े आयोजनों, भव्य मूर्तियां बनाने या राष्ट्रीय स्मारक खड़े करने तक सीमित कर देते हैं. इस तरह का प्रतीकात्मक सम्मान डॉ आंबेडकर को एक जीवंत विचारक और सामाजिक क्रांतिकारी से कम कर केवल एक प्रतीक बना देता है.


डॉ आंबेडकर का योगदान केवल संविधान निर्माण या राष्ट्र निर्माण तक सीमित नहीं है, उनका काम उससे कहीं अधिक व्यापक है. उन्होंने समाज के सबसे वंचित और दबे-कुचले समूहों के रोजमर्रा के अपमान, भेदभाव और अलगाव के खिलाफ संघर्ष किया. अस्पृश्यता, शोषण और ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई उनके जीवन का मूल उद्देश्य थी. आज आवश्यकता इस बात की है कि आंबेडकर को केवल एक प्रतीक या औपचारिक नायक के रूप में याद न करके उन्हें उनके सामाजिक और संवैधानिक योगदानों के रूप में याद किया जाये. आजादी के बाद डॉ आंबेडकर का प्रभाव मुख्यतः महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में दलित-बहुजन समुदायों तक सीमित माना जाता था, लेकिन यह स्थिति 1980 के दशक के अंत में बदलनी शुरू हुई, जब उत्तर भारत में पिछड़ों की राजनीति और कांशीराम के आंदोलनों ने नया आकार लिया. आज आंबेडकर केवल दलित-पिछड़ा और आदिवासी मसीहा की सीमित पहचान तक बंधे नहीं रह गये हैं. उनके विचार-सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और संविधानवाद आदि- व्यापक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं.


एक संविधानिवद् के रूप में डॉ आंबेडकर ने भारत को एक आधुनिक, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में गढ़ने में राजनीतिक दृष्टि और दूरदर्शिता दिखाई. नागरिकता, आजादी, समानता और न्याय जैसे बुनियादी राजनीतिक सिद्धांतों को समझने में उनके विचार महत्वपूर्ण हैं. पर जब आंबेडकर को केवल राष्ट्रीय हीरो या वंचितों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब अक्सर यह उनके उन गहरे सामाजिक सरोकारों से ध्यान हटा देता है, जिनसे वे जीवनभर जुड़े रहे. डॉ आंबेडकर की पूरी वैचारिक और राजनीतिक परियोजना उस समाज को बदलने की थी, जिसमें जाति और छुआछूत जैसी अमानवीय संरचनाएं मौजूद थीं. वे एक ऐसी मानवीय दुनिया की कल्पना कर रहे थे, जहां गरिमा, समानता और न्याय वास्तविक सामाजिक अनुभव बन सकें. ऐसे में यदि हम जाति, छुआछूत, आत्मसम्मान और वंचितों के साथ होने वाली जातिगत हिंसा जैसे मूल प्रश्नों को नजरअंदाज कर देते हैं, तो यह उनके संघर्ष और योगदान के साथ अन्याय है. जाति आज भी भारत की सामाजिक और राजनीतिक जीवन का एक कठोर सच बनी हुई है. इस व्यवस्था में किसी व्यक्ति का सम्मान, प्रतिष्ठा या सामाजिक स्थान उसकी प्रतिभा, पेशेवर कौशल या आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर तय होता है. डॉ आंबेडकर ने इस जाति आधारित समाज की अंतर्निहित विषमताओं और अमानवीय पहलुओं को गहराई से पहचाना और इसके निजात के लिए उचित उपाय भी किये.


आंबेडकर आधुनिकता के भी प्रबल समर्थक थे. उनका मानना था कि औद्योगिक विकास, लोकतांत्रिक संस्थाएं और गणतांत्रिक मूल्य, ऐसे संस्थागत ढांचे तैयार करेंगे, जो व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को संभव बनायेंगे. इस प्रक्रिया के माध्यम से वंचित समुदाय आधुनिक नागरिक के रूप में उभरेंगे और बिना किसी सामाजिक भय या भेदभाव के उदार लोकतंत्र का लाभ उठायेंगे. किंतु, व्यावहारिकता में उनका यह सपना पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा है. देश में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद नयी असमानता ने जन्म लिया है. जहां वंचित समुदायों के भीतर एक सीमित व शिक्षित शहरी मध्य वर्ग ने अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार किया, जिससे उनकी राजनीतिक आवाज मुखर और प्रभावशाली हुई है, वहीं यह उन्नति व्यापक समुदाय का प्रतिनिधित्व अब तक नहीं कर सकी है. वंचित समूह आर्थिक विकास की मुख्यधारा के लाभों से लगातार बाहर होते गये हैं. इसमें सबसे अधिक मार उन समुदायों पर पड़ी है, जो अपनी जीविका कारीगरी, शिल्पकारी व बुनकरी जैसे कामों से चलाते थे. इसलिए डॉ आंबेडकर को केवल एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मानना और बराबरी व न्याय के लिए उनके संघर्षों को नजरअंदाज कर देना, न केवल आंबेडकर के साथ, बल्कि उन समुदायों के साथ भी अन्याय है, जिनके उत्थान के लिए उन्होंने पूरा जीवन समर्पित किया.
(ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)

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